शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

भारतीय वैज्ञानिक - डाॅ. प्रफुल्ल चन्द्र राॅय (Dr. PRAFULLA CHANDRA RAY)

 

डाॅ. प्रफुल्ल चन्द्र राॅय

Dr. PRAFULLA CHANDRA RAY 




    डाॅ. प्रफुल्ल चन्द्र राॅय भारत के महान् रसायन शास्त्री थे। डाॅ. राॅय केवल वैज्ञानिक ही नहीं थे अपितु उन्हें शिक्षा उद्योग, समाज-सुधार, वैज्ञानिक आर्थिक और राजनीति पुरूत्थान देवोत्थान में भी रूचि थी। वे महान् वैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री थे। इतिहास और साहित्य से डाॅ. राॅय को विशेष प्रेम था। 

डाॅ. राॅय को आधुनिक भारतीय ‘रसायन विज्ञान का जन्मदाता‘ माना जाता है।

जन्म - डाॅ. राॅय का जन्म 2 अगस्त 1861 ई. को पूर्वी बंगाल (अब बंगला देश) के रड़ौली गांव के समृद्ध जमींदार हरिशचन्द्र राय के घर पर हुआ था। रड़ौली गांव भारत - प्रसिद्ध गांव रहा है। इस क्षेत्र के राजा प्रताप द्वितीय और राजा सीताराम राय ने दिल्ली के सुल्तानों और उनके नवाबो की सत्ता कभी नहीं मानी। बंगाल के प्रसिद्ध महाकवि मधुसूदन दत्त इसी रड़ौली गांव के नाती थे। बंगाल के प्रसिद्ध नाटककार दीनबंधु मित्र भी इसी क्षेत्र के रहने वाले थे। 

परिवार - प्रफुल्लचन्द्र के पिता हरिशचन्द्र राॅय पुराने किस्म के रूढ़िवादी व्यक्ति नहीं थे। वे पाश्चात्य शिक्षा के प्रति उदार थे। वे अग्रेंजी, फारसी तथा बंगाल आदि भाषाओं के अच्छे ज्ञात थे। उनका अपने समय के लगभग सभी समाज सुधारकों से परिचय था। जतीन्द्र मोहन टैगोर, दिगम्बर मित्र, कृष्टोदास पाल और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, ये सभी उनके मित्र थे। उन्होंने अपने गांव में प्राथमिक विद्यालय भी स्थापित किया था। 

बचपन - बालक प्रफुल्ल ‘अकडू‘ लड़कों से सदा अलग रहता और पढ़ने लिखने में मन लगाता। प्रफुल्ल को अपने पिता के पुस्तकों के भण्डार मे जीवन - चरित्रों की एक पुस्तक मिल गई, जिसमें न्यूटन, गैलीलियों, बेजामिन फ्रेकलिन के जीवन चरित्र थे। इनके जीवन चरित्रों को पढ़कर बालक प्रफुल्ल बड़ा प्रभावित हुआ। उसे सबसे खास बात यह लगी कि वे सब साधारण घरों में पैदा हुए थे तथा अपनी लगन और मेहनत से इतने महान् बन गए थे। 

प्रेरणा - बेजामिन फ्रेकलिन के जीवन चरित्र ने प्रफुल्ल को सबसे अधिक प्रभावित किया, जो दस वर्ष की आयु में जीवनयापन की चिंता में फस गया था तथा एक पुस्तक विक्रेता से पुस्तके मांगकर रातभर पढ़ता और सुबह वापस कर देता था तथा जिसने बाद में बिजली का अविष्कार किया बालक प्रफुल्ल ने भी उन जैसा वैज्ञानिक बनने और बड़े - बड़े काम करने का निश्चय किया। 

बीमारी -इस अवधि में सन् 1874 में प्रफुल्ल को पेचिश के रोग ने आ घेरा, जिसने उसके हृष्ट-पुष्ट शरीर को बुरी तरह दुर्बल कर दिया। एड़िसन, सर वाल्टर एकाॅट, रविन्द्रनाथ टैगोर, लार्ड बायरन कर्लाइल, हर्बट स्पेन्सर आदि के जीवन चरित्रों को पढ़कर बालक प्रफुल्ल ने अपने स्वास्थ्य को सुधारने के लिए नियमों का पालन करना और प्रतिदिन थोड़ा व्यायाम करना भी शुरू कया 

वह सात महीने तक बीमार रहे। अपनी बीमारी के सात महीनों में बालक प्रफुल्ल ने एक-एक दिन अपना ज्ञान बढ़ाने में लगाया। 

प्रारंभिक शिक्षा - प्रफुल्लचन्द्र राॅय की प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय में ही हुई, जिसे 9 वर्ष की आयु में उत्र्तीण कर उन्होंने सन् 1870 में कोलकत्ता के हेयर स्कुल में प्रवेश लिया, जहाँ से उन्होंने सन् 1871 में कोलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा उत्र्तीण की। गांव से आने पर शहरी कपड़े पहने हुए जब सन् 1870 में उन्होंने इस विद्यालय में प्रवेश लिया था तो शहरी लड़कों ने उनकी ग्रामीण चाल-ढ़ाल को देखकर ‘अरे ओ देहाती‘ कहकर मजाक उड़ाया था। 

उच्च शिक्षा - प्रवेश परीक्षा उत्र्तीण करने के बाद प्रफुल्ल ने ईश्वरचंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट (अब विद्यासागर काॅलेज) में एफ.ए. में अपना नाम लिखाया तथा रसायन विज्ञान विषय अध्ययन के लिए चुना। 

बालक प्रफुल्ल को कक्षा में पढ़ाई जाने वाली बातों से संतोष नही हुआ, फलतः उन्होंने ‘बाहरी छात्र‘ के रूप में प्रेसीडेंसी काॅलेज में भौतिकशास्त्र और रसायनशास्त्र के व्याख्यान सुनने जाना शुरू कर दिया। इतना ही नही, रसायन विज्ञान की जो भी पुसतक उनके हाथ जाती, वे उसे पढ़ ड़ालते। पिता के कोलकत्ता से गांव चले जाने पर प्रफुल्ल ने छात्रावास में रहना शुरू कर दिया। जहाँ वह अपने कमरे में एक छोटी प्रयोगशाला कायम कर प्रयोग करते रहते थें। वैज्ञानिक अध्ययन के साथ-साथ वे संस्कृत भाषा का ज्ञान भी बढ़ा रहे थे तथा उन्होंने कालिदास के रघुवंश कुमारसंभव तथा मट्टीकाव्यम् का अध्ययन भी किया। 

प्रतियोगिताएँ -

1. सन् 1882 में प्रफुल्ल ने अपने मित्रों और संबंधियों को बताए बिना ‘‘अखिल भारतीय गिल क्राइस्ट स्काॅलरशिप‘‘ प्रतियोगिता के लिए तैयारी की तथा मुंबई के एक पारसी बालक बहादुर जी के साथ सफलता प्राप्त की। 

2. सन् 1885 में एडिनबरा विश्वविद्यालय की स्नातक कक्षा के छात्र के रूप में उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक निबंध प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर मिला। निबन्ध का विषय था- ‘‘गदर के पहले और बाद का भारत‘‘। प्रफुल्ल द्वारा लिखा गया निबन्ध प्रतियोगिता में पुरस्कृत नहीं हो सका, क्योंकि इस निबन्ध मे भारत की दयनीय, सामाजिक एवं आर्थिक दशा का मुद्दा उठाकर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार पर व्यंग्यात्मक शैली में तीव्र प्रहार किये गये थे, परन्तु स्तरीय साहित्यिक भाषा में लिखा जाने के कारण प्राचार्य सर विलियम मूर अंग्रेज होने के उपरान्त भी निबन्ध की प्रशंसा किए बिना न रह सका। 

यूरोप यात्रा -‘‘अखिल भारतीय गिल क्राइस्ट स्काॅलरशिप प्रतियोगिता‘‘ की सफलता ने प्रफुल्ल को उच्च शिक्षा के लिए यूरोप जाने का अवसर दिया। इस सफलता की सूचना प्रफुल्ल ने स्टैट्समैन नामक अखबार की खबर काटकर अपने पिता को गांव भेजी और माता-पिता से इग्लैण्ड जाने की आज्ञा मांगी। जब प्रफुल्ल विदा लेने और आशीर्वाद ग्रहण करने मां के सामने पहुँचे तो मां के ऑसू देखकर खुद भी रो पड़े। प्रफुल्ल ने मां को ढ़ाढ़स बंधाते हुए कहा - ‘‘मां आशीर्वाद दो कि मैं सफल होकर लौटू और विश्वास रखो, जब मै. लौटकर आऊंगा तो सबसे पहले काम यह करूॅगा कि बिकी हुई जमीन खरीद लूंगा और गिरता हुआ मकान फिर बनवा दूंगा।‘‘ 

इंग्लैण्ड यात्रा -सन् 1882 में प्रफुल्ल इग्लैण्ड आये और एड़िनबरा विश्वविद्यालय में विज्ञान संकाय में प्रवेश प्राप्त किया। यहाँ वे प्रसिद्ध रसायन वैज्ञानिक अलैक्जैण्ड़र क्रम ब्राऊन के प्रभाव में आये तथा रसायन शास्त्र की प्रति उनकी रूचि और भी बढ़ गई। यहाँ उनका सर्वप्रथम परिचय ह्मूम मार्शल, अलैक्जेण्ड़र स्मिथ, डाॅ. डाॅर्बिन तथा जेम्स वाॅकर आदि से हुआ। कुछ ही दिनों में जर्मन भाषा सीखकर वे जर्मन वैज्ञानिकों की पुस्तकों से भी लाभ उठाने लगे। इग्लैण्ड प्रवासकाल में उनकी मित्रता लंदन में अध्ययनरत सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस से हो गई। प्रफुल्ल इग्लैण्ड में राजा राममोहन राय की तरह चोगा और चपकन पहना करते थे। इस भारतीय पोशाक में उन्हें गौरव अनुभव होता था। 

लेख प्रकाशित -युवक प्रफुल्ल ने ‘लन्दन टाइम्स‘ सहित इग्लैण्ड की प्रतिष्ठित पत्रों में जाॅन ब्राइट की सिफारिश के साथ अपना लेख प्रकाशनार्थ प्रेषित कर दिया और एक दिन इग्लैण्ड वासियों को इस लेख के माध्यम से पढ़ने को मिला कि अंग्रेजो ने भारत को कितनी बेरहमी से लूटा है, भारत के लोगों के साथ कितना अन्याय किया। लेख के साथ लेखक का नाम भी छपा ‘‘प्रफुल्लचन्द्र रे‘‘। 

कई वर्षो के अध्ययन के पश्चात् उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘हिन्दु रसायन शास्त्र का इतिहास‘‘ सन् 1902 में प्रकाशित हुई, जिसे विश्व के सभी वैज्ञानिकों द्वारा सराहा गया। उसका दूसरा खण्ड सन् 1908 में प्रकशित हुआ जो 15 वर्ष से अधिक दीर्घ और श्रमपूर्ण शोधकार्य का परिणाम था। यह ग्रन्थ रसायन के क्षेत्र में प्राचीन कालीन हिन्दुओं की उपलब्धियों पर प्रकाश डालता है विद्वान आलोचकों और पाठकों द्वारा इसे विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण देन माना गया है। 

शोध-कार्य -

1. B.Sc. की परीक्षा में उन्होंने शानदार सफलता प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने ‘कच्ची धातु का विश्लेषण‘ विषय पर शोधकार्य किया। 

2. सन् 1896 उनके जीवन का महत्वपूर्ण समय था। उस समय उन्होंने एक महान् कार्य किया। उन्होंने मरक्युरस नाइट्रेट नामक अस्थायी पदार्थ प्रयोगशाला में तैयार कर दिखाया। उनकी इस महान् खोज से विश्व के रसायनशास्त्री आश्चर्यकित होगा।  

3. उन्होंने अपने घर पर पशुओं की हड्डियों को जलाकर दिमागी ताकत बढ़ाने वाला रासायनिक तत्व ‘‘फास्फेट ऑफ कैल्सियम‘‘ का निर्माण किया। 

4. डाॅ. राॅय ने मरक्यूरस नाइट्रेट के अलावा अमोनिया नाइट्रेट यौगिकों तथा उनके व्युत्पादो पर मौलिक अनुसंधान किए। रसायनशास्त्र में निम्नलिखित महत्वपूर्ण देन है -

1. पारे के नाइट्रेट तथा उनके व्युत्पन्न।

2. नाइट्राइप्स की चालकता निकालना।

3. मरक्यूरली के नाइट्रस। 

उपाधि, सम्मान और ख्याति - 
  • सन् 1888 में ड़ी.एस.सी. की उपाधि अकार्बनिक रसायन विषय पर प्राप्त की तथा एड़िनबरा विश्वविद्यालय में कई छात्रवृतियों को प्राप्त करने वाले हो गए। 
  • एड़िनबरा विश्वविद्यालय में वे एकमात्र छात्र थे जिन्होंने सन् 1888 में ड़ी.एस.सी. की उपाधि प्राप्त की। अतः उनका सम्मान सभी जगह बढ़ गया। 
  • एड़िनबरा विश्वविद्यालय की रसायन सोसाइटी ने 1887-88 के सत्र् में उन्हें अपना उपाध्यक्ष भी चुन लिया था। इससे उनकी प्रतिभा की धाक का पता चलता है। 
  • सन् 1911 में उन्हें ‘नाइट‘ की उपाधि से सम्मानित किया गया। सन् 1934 में वे लंदन रसायन सोसाइटी के सम्मानित सदस्य चुने गए। 
  • ड़रहय विश्वविद्यालय में उन्हें डी.एस.सी की सम्मानित उपाधि प्रदान की। कोलकत्ता ढ़ाका और बनारस विश्वविद्यालयों ने भी उन्हें अनेक उपाधियों से सम्मानित किया।
  • सन् 1912 में ब्रिटिश विश्वविद्यालयों के सम्मेलन से वापस आने पर प्रिसीडे़सी काॅलेज में उनके सम्मान में एक भोज आयोजित किया, जिसमें पिं्रसिपल जेम्स ने उनकी विशेषताओं का गुणगान किया था। 
  • सन् 1920 में वे भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए।
  • सन् 1917 में वे भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन, कोलकत्ता के अध्यक्ष बने।
  • सन् 1901 में उनकी मित्रता प्रोफेसर गोपालकृष्ण गोखले और महात्मा गांधी से हुई। कोलकत्ता में 19 जनवरी 1902 को गांधीजी की पहली सभा करने डाॅ. राॅय को ही है। डाॅ. राॅय रूढ़िवादिता में विश्वास नहीं रखते है। 

अध्यापन कार्य -सन् 1888 में भारत लौटने पर वे सन् 1889 में प्रेसीडेंसी काॅलेज कोलकत्ता में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए, जहाँ सन् 1911 में अपनी सेवा निवृति से कुछ वर्ष पूर्व वे वरिष्ठ प्रोफेसर बने। एक कुशल अध्यापक के रूप में वे अपने छात्रों से सदैव कहा करते थे- ‘‘विज्ञान का अध्ययन एक सच्चे भारतीय की तरह अपनी अपनी ही मातृभाषा में करो। देखी रूसी वैज्ञानिक दिमित्री मैडिंलीफ ने अपना विश्व-प्रसिद्ध अनुसंधान-कार्य ‘तत्त्वों की आवृत सारणी‘ से संबंधित पत्र रूसी भाषा में प्रकाशित कराया है, अंग्रेजी नहीं।‘‘ 

सन् 1916 में वे राजकीय सेवा से निवृत हो गए। उसके बाद उन्होंने महान शिक्षाशास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी के निवेदन पर नवसृजित विश्वविद्यालय विज्ञान महाविद्यालय, कोलकत्ता मे रसायनशास्त्र के पालित प्रोफेसर के पद का भार ग्रहण किया। उनके शोध छात्रों की संख्या निरन्तर बढ़ती रही। 

उद्योग धंधो की स्थापना -डाॅ. राॅय को केवल वैज्ञानिक कहना उचित न होगा। वे इस बात से भी बड़े दुखी हुए कि भारत के लोग आवश्यक औषधियों के लिए भी विदेशी-देशों विशेषक इग्लैण्ड पर आश्रित है। उन्होंने देखा कि फल-कारखानों, उद्योग-धंधों से रसायन-विद्या का गहरा संबंध है। यह देखकर भी उन्हे बड़ी पीड़ा होती थी कि बंगाली नवयुवक विश्वविद्यालय की डिग्रिया लेकर नौकरी की तलाश में दर-दर भटकते फिरते है। व्यापार और उद्योग-धंधों की तरफ उनका ध्यान बिल्कुल नहीं जाता। वे औद्योगिक प्रतिष्ठानों और कारखानों की स्थापना एवं विकास के लिए भी बराबर उत्साही एवं प्रयत्नशील रहे। उन्होंने ऐसी रासायनिक चीजे बनाने का दृढ़ निश्चय किया जो दवाओं के काम आ सके। अतः उन्होंने औषध-निर्माण का कार्य हाथ में लिया और उन्होंने अपनी मासिक आय का अधिकांश भाग इसके निहित होम कर दिया। उन्होंने अपने घर पर पशुओं की हड्डियां जलाकर दिमागी ताकत बढ़ाने वाला रासायनिक तत्व ‘फास्फेट आॅफ कैल्शियम‘ का निर्माण किया। उन्होंने अपने घर पर जो कारखाना बनाया था, वह धीरे-धीरे प्रगति करने लगा तथा सन् 1900 लगभग एक बड़ा भारी कारखाना बन गया, जो बंगाल कैमिकल्स एण्ड फार्मास्यूटिकल वक्र्स के नाम से आज भी प्रसिद्ध है, उन्होंने उसे सन् 1902 में एक लिमिटेड संस्थान में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने एक ट्रस्ट मण्डल का गठन अपने जन्म स्थान खुलना जिले में एक विद्यालय का संचालन करने के लिए तथा अन्य लोक-कल्याणकारी कार्यो के लिए किया। 

स्वदेशी धंधो को प्राथमिकता -डाॅ. राॅय ‘स्वदेशी उद्योग धंधो‘ के संस्थापक थे। सौदेपुर में गंधक के तेजाब का कारखाना, सन् 1901 में स्थापित कोलकत्ता पाॅट्री वक्र्स नामक चीनी-मिट्टी के बर्तन बनाने का कारखाना सन् 1921 में स्थापित बंगाल एनेमल वक्र्स नामक तामचीनी की चीजे बनाने का कारखाना और सन् 1905 में स्थापित बंगीय स्टीम नैविगेशन कंपनी नामक जहाजरानी कंपनी आदि की स्थापना और संचालन में डाॅ. राॅय की भूमिकाएं अविस्मरणीय रहेगी। 

सम्मेलन व भाषण -सन् 1921 से 1931 तक उन्होंने देश के कोने-कोने का भ्रमण किया और राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना करके बद्दर और छुआछुम उन्मूलन पर भाषण देकर नवयुवकों में नई चेतना फूकी। सभी राजनीतिक नेताओं के जेल में डाल देने पर उन्होंने खुलना, दिजानपुर, कटक आदि अनेक स्थानों पर राजनीतिक सम्मेलनों का सभापतित्व भी किया। असहयोग आन्दोलन के जोर पकड़ने पर उन्होंने कहा था - ‘विज्ञान प्रतीक्षा कर सकता है स्वराज्य नहीं।‘ 

देश प्रेम की भावना -डाॅ. राॅय वैज्ञानिक होने से पहले एक भारतीय थे और सच्चे भारतीय होने के कारण वे सच्चे लोक - सेवक थे। जब कभी और जहाँ कहीं बाढ़ो से भारी नुकसान और विनाश होता था। डाॅ. राॅय प्राकृतिक आपदा से पीड़ित लोगों की राहत के लिए समर्पित भाव से जुट जाते थे। 

सन् 1922 के भयानक अकाल में वे सब शोधकार्य छोड़कर दीन-दुःखियों और पीड़ितों की सहायता के लिए कूद पड़े। उनके मार्गदर्शन में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारम्भिक दिनों में सन् 1922 में उत्तरी बंगाल के बाढ़-पीड़ितों के लिए सहायता-शिविरों का आयोजन किया था। सितम्बर सन् 1931 में उत्तरी और पूर्वी बंगाल में पुनः बाढ़ का प्रकोप हुआ। ‘संकट निवारण समिति‘ ने डाॅ. राॅय को ही इसके निवारण हेतु चुना। सहायता कार्य से बंगाल के युवको, पढ़े-लिखे नौजवनों को बहुत प्रेरणा मिली। वे गांव-गांव गए। अपने देशवासियों की दुर्दशा अपनी आँखो से देखी तथा अपनी एकतामूलक संस्कृति के दर्शन किए। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि की सेवा में समर्पित कर दिया। प्राचीन संतो की भांति उन्होंने विद्वता को चरित्र से मिलाया। उनका उदाहरण वर्तमान और भावी दोनों पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। 

व्यवहार- कुशलता -वे आधुनिक भारत के शिल्पकारों में मूर्धन्य थे, किन्तु वे शक्ति, पद धन और सम्मान के अभिमानी लोगों से बचते थें। वे प्रत्येक से, चाहे वह अनपढ़ अथवा धनी हो, बड़े ही प्रेम से मिलते थे। उन्हें सांमतवादी पृथकतावाद से घृणा थी। 

वे केवल बुद्धि जीवियों, प्रबुद्ध वर्ग और छात्रों के ही मित्र दार्शनिक और मार्गदर्शक नहीं थे, बल्कि सामान्य युवा वर्ग के भी अखण्ड़ प्रेरणा स्त्रोत थे। वे युवकों को यह बताने में अपना अपना कर्तव्य मानते थे कि जीवन में सफलता का रहस्य उद्योगों में निहित है, न कि क्लर्क का कार्य करने में। सन् 1929 में वे तन-मन से असहयोग के आर्थिक रचनात्मक कार्यक्रम में जुट गए। उन्होंने कताई और बुनाई का भरपुर प्रचार किया और जीवन पर्यन्त खादी का उपयोग किया। वे कोई राजनीतिक प्रचारक नहीं थे। परन्तु प्रबुद्ध वर्ग और कार्यो में महान् थे। वे सादगी और सदाचार की प्रतिमूर्ति थे। धर्म और संस्कृति के प्रबल समर्थक इस वैज्ञानिक के रहन-सहन आचार-विचार एवं व्यवहार को देखकर उन्हें महान् भारतीय वैज्ञानिक संत कहते थे। 

उद्घाटन तथा दान राशि -उन्होंने सन् 1924 में भारतीय रसायन सोसाइटी का उद्घाटन किया जिसके वे 2 वर्ष तक संस्थापक अध्यक्ष रहे। उनके द्वारा दिए गए 12 हजार रूपयों की राशि से ही इस सोसाइटी का प्रारम्भ हुआ था। सन् 1936 में वे पालित प्रोफेसर के पद से सेवा निवृत हुए और जीवन पर्यन्त एमेरिटर प्रोफेसर बने रहे। इससे बहुत पूर्व सन् 1921 में अपने जीवन के 60 वर्ष पूरे करने पर उन्होंने अपने मासिक वेतन के स्वतंत्र दान का निवेदन विश्वविद्यालय अधिकारियों से किया। यह राशि विश्वविद्यालय विज्ञान और तकनीकी महाविद्यालय के विकास के लिए निर्धारित की गई। इसी 1,30,200 रू. की राशि के ब्याज से दो प्रफुल्लचन्द्र राॅय छात्रवृत्तियां श्रेष्ठ छात्रों को प्रदान की जाती है। सन् 1922 में उन्होंने पुनः 12,000 रूपयों का दान नागार्जुन पुरस्कार तथा दूसरा सन् 1936 में 11000 रू. का दान जन्तुविज्ञान और जीव-विज्ञान में सर आशुतोष मुखर्जी पुरस्कार के लिए दिया। 

अन्य रूचियाँ -इतिहास और साहित्य से डाॅ. राॅय को विशेष प्रेम था। रविन्द्रनाथ टैगोर, मधुसूदन दत्त और शेक्सपियर उनके प्रिय कवि थे। सन् 1932 में उन्होंने अपनी आत्मकथा - ‘‘एक बंगाली रसायनवेत्ता का जीवन और अनुभव‘‘ पूरी की। 

रसायनशास्त्री होते हुए भी वे प्रयोगशाला की चारदीवारी तक सीमित नहीं थे। विज्ञान के प्रति प्रगाढ़ प्रेम होते हुए उनकी रूचियाँ विविध और आश्चर्यजनक थी, जैसे- शिक्षा, उद्योग, समाज-सुधार, वैज्ञानिक, आर्थिक और राजनीतिक पुनरूत्थान देशोत्थान इन सब ने उन्हें काफी प्रभावित किया।

अंग्रेजी कवि और नाटककार शेक्सपियर के नाटक, इतिहास और जीवन-चरित्र की पुस्तके पढ़ना का भी प्रफुल्ल को बहुत शौक था। उसके पिता उसकी जिज्ञासा को शांत कर उसका ज्ञानवर्धन करते थे। प्रफुल्ल को ब्रह्मसमाज के विद्वानों के भाषण सुनने जाते थे और उनके उदार विचारों का मनन करता था। 

मृत्यु -शुक्रवार 14 जून 1944 को सायं 6 बजकर 27 मिनट पर कोलकत्ता विश्वविद्यालय विज्ञान और तकनीकी काॅलेज में डाॅ. राॅय का कुछ क्षणों की बीमारी के बाद निधन हो गया। जो उनके जीवन के पिछले 30 वर्षो से उनका घर था। देश डाॅ. राॅय के अविस्मरणीय कार्यो का हमेशा कृतज्ञ रहेगा। 

डाॅ. राॅय ने ‘कच्ची धातु का विश्लेषण‘ विषय पर शोधकार्य किया। इन्होंने दिमागी ताकत बढ़ाने वाले ‘‘फास्फेट आॅफ कैल्शियम‘‘ का निर्माण किया वे स्वदेशी धंधो को प्राथमिकता देते थे तथा उन्होंने कई उद्योग-धंधो की स्थापना की। 

डाॅ. राॅय को केवल वैज्ञानिक कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि उन्हे विज्ञान के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी रूचि थी। व्यवहार कुशल होने के साथ ही स्वदेश प्रेमी भी थे। उनको अनेक उपाधि, सम्मान और ख्याति दी गई। 

ब्लॉग को like और subscribe जरूर करे । 

comment box मैं अपने शहर या गांव का नाम अवश्य लिखे। 

Dr. D R BHATNAGAR 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

भारतीय वैज्ञानिक - जगदीश चन्द्र बोस

 भारतीय वैज्ञानिक - जगदीश चन्द्र बोस 

 JAGADISH CHANDRA BOSE


    जगदीश चन्द्र बोस भारत के महान वैज्ञानिकों में से एक है। उन्हें महाभारत के कर्ण से बहुत प्रेरणा मिली जिसके आधार पर उन्होंने जीवन में संघर्ष करते रहना सीखा, जगदीश चन्द्र बोस हार से ही विजय का जन्म होना मानते थे। 

सभी देश के विद्वान वैज्ञानिकों ने श्री बोस को आदर्श वैज्ञानिक माना है। 

जन्म- जगदीश चन्द्र बोस का जन्म 30 नवम्बर 1858 को भारत के मैमन सिंह जिले में हुआ जो वर्तमान में बांग्लादेश में है। यहाँ इनके पिता डिप्टी मजिस्ट्रेट थे। 

पारिवारिक स्थिति -जगदीश चन्द्र बोस का परिवार एक सुशिक्षित एवं धार्मिक विचारों वाला परिवार था, जिसमें रामायण और महाभारत पढ़े जाते थे। उनके पिता का नाम भगवान चन्द्र बोस तथा माता का नाम वामा सुन्दरी बोस था इनके पिता बड़े ही उदारता पूर्ण व्यवहार के धनी थे। 

शैक्षिक पृष्ठभूमि -जगदीश चन्द्र बोस के पिता ने उन्हें अंग्रेजी माध्यम के बजाय हिन्दी की जानकारी रखने पर बल दिया। उन्होंने बोस को हिन्दी स्कूल में दाखिल कराया क्योंकि उनका कहना था कि पहले मातृभाषा का ज्ञान होना जरूरी है, बाद में अन्य भाषाओं का। प्रारम्भिक अध्ययन के उपरान्त बोस ने अपनी नौ वर्ष की अल्पायु में कोलकत्ता के हेयर स्कूल तथा सेंट जेवियर स्कूल में यूरोपीय तथा भारत में रह रहे अंग्रेज छात्र पढ़ते थे। उनके साथ बोस का मन उदास रहने लगा लेकिन फिर भी उन्होंने उनसे मित्रता रखी। खाली समय में वे विज्ञान की चीजों के बारे में भी मशगूल हो जाते। 


बोस सन् 1880 में उच्च शिक्षा के लिए इग्लैण्ड गए। वहाँ उन्होंने चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन शुरू किया ही था कि उनका स्वास्थ्य अचानक बिगड़ गया और पढ़ाई छूट गई। फिर वे कैम्ब्रिज में क्राइस्ट चर्च काॅलेज में प्रकृति विज्ञान के अध्ययन में जुट गए। यहाँ के दो अध्यापकों ने उनका मार्गदर्शन किा। ये अध्यापक प्रकृति विज्ञानी प्रोफेसर सिडनी विनिस और भौतिक विज्ञानी लाॅर्ड रैले थे। 

अध्यापन कार्य -जगदीश चन्द्र बोस सन् 1885 में शिक्षा पूरी कर भारत लौट आए उन्होंने कोलकत्ता के प्रेसीडेंसी काॅलेज में भौतिकी का प्राध्यापक नियुक्त कर दिया गया। 

बोस का विवाह -उनका विवाह सन् 18  के जनवरी माह में अबलादास के साथ हुआ था। वे प्रसिद्ध वकील दुर्गा मोहनदास की पुत्री थी। उनके भाई देशबंधु चितरंजनदास थे। वे विवाह के समय मद्रास मेडिकल काॅलेज में चिकित्सा शास्त्र का प्रशिक्षण ले रही थी किन्तु इनकी जीवन संगिनी बनने के लिए उन्होंने पढाई बीच में ही छोड़ दी। विवाह के पश्चात् उन्होंने इनके सुख-दुःख में बराबर का साथ दिया। 

शोध कार्य -जगदीश चन्द्र बोस ने राॅयल सोसायटी के शरीर क्रिया विज्ञानियों से भी संघर्ष किया, जिसमें उनकी ही विजय हुई। इसके लिए जगदीश चन्द्र बोस ने दो वर्ष कड़ी मेहनत करके ‘रिसपान्स इन द लिविंग एण्ड नाॅन लिविंग‘ नामक मोनोग्राफ छपवाया जिसे देखकर आलोचक विज्ञानी हत प्रत्र रह गये। शेष अप्रकाशित भाषण बाद में प्रकाशित करके सभी देशों में भेजा गया, उन्हें राॅयल सोसायटी ने अपना सदस्य बना लिया। यह घटना सन् 1920 की है। 

विद्युत तंरग पर शोध -विद्युत चुम्बकीय तरंगों पर इंग्लैण्ड में ओलिवियर लाॅज तथा जर्मनी में हिनरिच हट्र्ज नामक वैज्ञानिकों ने भी शोध किए थे। बाद में उन तंरगों का नाम ‘हर्ट्जयन तंरगें‘ रख दिया गया। बोस ने इसके पश्चात् शाॅर्ट रेडियों तंरगों की खोज की। उन्होंने तंरगो पर मापन मि.मी. स्तर पर नापा, जबकि लाॅज में सेन्टीमीटर तथा हट्र्ज ने डेसीमीटर पर कार्य शुरू किया था। 

बोस ने पटसन के सुक्ष्म रेशों जैसी सुक्ष्म सामग्री से विद्युत तंरगो के धु्रवण को ग्रहण करने वाले उपकरण बनाने में भी सफलता प्राप्त की। उनकी सहायता से विद्युत उपकरण रिसीवर तैयार किया गया था, जो ‘कोहेरर‘ कहा जाता था। इस यन्त्र से व्यापारियों को काफी लाभ पहुँचा। ये रिसीवर समुन्द्री जहाजों पर भी कार्य सिद्ध हुए थे। 

बोस के समय मार्कोनी ने भी अंग्रेजी और यूरोपीय वैज्ञानिकों के सहयोग से लम्बी दूरी तक रेडियों तंरगे भेजने वाला यंत्र बना लिया था। 

बोस का बतौर का यह अविष्कार सन् 1885 में कोलकत्ता ‘नगर भवन‘ में पुष्टिपूर्ण शोधकार्य मान लिया गया। उन्होंने यह कार्य अपने स्वनिधि उपकरण से विद्युत तंरगों को दो कमरों की दीवार पार करके तीसरे कमरे में पहुँचकर एक तो एक पिस्तौल चला कर बारूद के ढेर में विस्फोट करके दिखाया। 

उन्होंने सन् 1886 में विद्युत तंरगो का आकार (द्धेध्र्य) निकालने के लिए एक पृष्ट लिया जिस पर बारीक तीन रेखायें खीची गई, फिर पृष्ट से विवर्तन जाली से दैध्र्य निकालने के लिए प्रकाश किरणों का परावर्तन कराकर प्रतिबिम्ब प्रदर्शित किया गया। उन्होंने इस परीक्षण में पूर्ण सफलता प्राप्त कर ली। फिर वे विज्ञान के अन्य शोध कार्य करने लगें। उन्होंने शाॅर्ट वे व विकिरण क्षेत्र में अध्ययन आंरम्भ कर दिया। उनके सैद्धान्तिक शोधों की लंदन विश्वविद्यालय में काफी चर्चा हुई। उन्होंने अपना एक शोधलेख तैयार किया। जिसे राॅयल सोसायटी को प्रकाशनार्थ दे दिया। उन्होंने पौधो के अध्ययन पर अनेक उपकरण बनाये थे उन्होंने जीव-विज्ञान के अलावा भौतिक-विज्ञान पर भी शोधकार्य किये। 

उपलब्धियाँ व पुरस्कार -

यूरोप में सम्मान -सन् 1896 में बोस यूरोप वैज्ञानिकों के निमन्त्रण पर इंग्लैण्ड गये। उनके शोधपूर्ण भाषण और कार्यो की प्रशंसा करते हुए ‘फ्रेंच अकादमी आॅफ साइंस‘ के अध्यक्ष प्रोफेसर ए.कोर्नू ने कहा कि - ‘करने का प्रयास करना चाहिए, जो विज्ञान और कला की मशाल थी। फ्रांस में हमस ब आपकी प्रशंसा करते है और उत्तरोत्तर उन्नति करते रहने की कामना भी।‘

बोस कोहेररों (रिसीवरों) के शोध कार्य में जुट गए, उन्हें इस कार्य में अपनी विद्युत तंरगो में कुछ शिथिलता महसूस हुई। उन्हें लगा इससे उस प्रवाह में कमी होकर उनकी संवेदन शीलता नष्ट हो सकती है। यह शिथिलता जीवों में भी मांसपेशियों जैसी है। इस परीक्षण के लिए उन्होंने एक उपकरण ‘ कृत्रिम रेटिना‘ अर्थात् कृत्रिम दृष्टि पटल तैयार किया। उन्होंने जब यह सारा प्रयोग किया तो उनकी दृष्टि अपने ग्राफ पर डाॅक्टर वालर की तरह प्राप्त हुई वक्ररेखा पर पड़ी। उन्होंने निर्जीव वस्तुओं पर रासायनिक क्रिया करके प्रयोग की संपुष्टि की। अतः उन्होंने स्पष्ट किया कि संजीव पदार्थो एवं निर्जीव वस्तुओं में कोई अधिक अंतर नहीं है। 

सन् 1900 के जुलाई माह में पेरिस के इटंरनेशनल कांग्रेस ऑफ फिजिक्स में वैज्ञानिकी के समक्ष अपना प्रयोग सिद्ध करने के बाद उनकी इच्छा हुई कि कृत्रिम रेटिना को बेतार संचार में व्यवसायिक प्रयोग के लिए पेटेंट कराया जाये परन्तु कुछ वैज्ञानिकों के विरोध के कारण यह प्रस्ताव माना नहीं गया। इस समय इस सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द भी मौजुद थे, इन्होंने बोस को भारत का महान सपूत कहकर सम्मानित किया था।        

10 मई 1901 को लंदन में राॅयल सोसायटी ऑफ साइंस हाल में बोस अपना पेड़ पौधों की संवेदन शीलता का प्रयोग दिखा रहे थे पौधों की जडे़ ब्रोमाइड अम्ल में डुबी थी उपकरण पौधे से जुड़ा था कि प्रतिक्रिया होते ही स्क्रीन पर हल्के धब्बे दिखने लगे जिनसे पौधे की संवेदनशीलता जाहिर हो रही थी, पौधे की नब्ज की धड़कन जिसे वह बिन्दू पहले घड़ी के पेण्डुलम की नियमितता से आगे पीछे अंकित कर रहा था, धीरे-धीरे अनियमित और असन्तुलित होती चली गई। और वह धब्बा तीव्रता से हिलने लगा फिर अचानक ही थोड़े समय बाद उसकी सभी प्रक्रियाएँ शून्य हो गई तथा वह पौधा मर गया यह प्रयोग देखकर सभी वैज्ञानिक और दर्शक आश्चर्य में डुब गये वे बोस के शोधपूर्ण विवेचन कार्य की प्रशंसा कर उठे। भौतिक विज्ञानी सर राॅबर्ट आस्टिन ने कहा मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि धातुओं में भी जीवन होता है, मुझे यह ज्ञान नहीं था। 

जीव-जन्तुओं एवं पौधों के हृदय की क्रिया के जानने के लिए उन्होंने अनेक सहायता स्वचालित रिकार्डरों के अविष्कार किये। 

 सम्मान एवं निधन -जगदीश चन्द्र बोस को डाक्टरेट की अनेक उपाधिया मिली उन्हें अनेक देशों के विज्ञान संस्थानों का सदस्य बनाया गया उनकी 23 नवम्बर 1937 को मधुमेह एवम् रक्त चाप की बीमारियों से पीड़ित होने के कारण मृत्यु हो गई उस समय वे 79 वर्ष के थे। 

जगदीश चन्द्र बोस हमारे देश के महान वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि एक अमर राष्ट्र चेतना थी, जो कि उन्होंने अपने कार्यो से सिद्ध कर दिया। 

उन्होंने घोषणा की हमें पश्चिमी देशों को छोड़कर अपना मूल तथ्य नहीं गवांना चाहिए। देश के नए आविष्कार ही भविष्य की पूंजी है। मैं इसको जीवित रखने के लिए राष्ट्र की मान्यताओं को ही बल व स्थान दूंगा। इसके लिए में चाहता हूँ कि समस्त वैज्ञानिकों द्वारा इस संस्थान को सहयोग दिया जाये व इसे विकसित किया जाए ताकि उन्हें अपने शोध कार्य में नया संबल मिले, नए अनुसंधान कार्यो की जानकारी मिले। 

ब्लॉग को like और subscribe जरूर करे । 

comment box मैं अपने शहर या गांव का नाम अवश्य लिखे। 

Dr. D R BHATNAGAR 

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

श्यामपट्ट लेखन कौशल (BLACK BOARD WRITING SKILL)

 

श्यामपट्ट लेखन कौशल 

BLACK BOARD WRITING SKILL

    शिक्षण प्रक्रिया मे श्यामपट्ट शिक्षक का सच्चा सहयोगी होता है। उसका घनिष्ठतम मित्र होता है। जब कोई तथ्य बालक मौखिक रूप से नही शिक्षक श्यामपट्ट पर ही उसे चित्रित करके बालक को समझाता है।

    श्यामपट्ट की सहायता से शिक्षक अपने शिक्षण को सशक्त बनाता है। शिक्षण प्रक्रिया में कई विषय तो ऐसे है, जिनका शिक्षक के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। जैसे- गणित, विज्ञान। इन विषयों में श्यामपट्ट की बहुत आवश्यकता पड़ती है। शिक्षक रेखाचित्र बनाकर किसी वस्तु का चित्र बनाकर अपने अध्ययन प्रकरण का अधिक प्रभावशाली बनाता है। इसके माध्यम से ही वह छात्रों को निर्देश देता है, गृहकार्य देता है। इस प्रकार यह दृश्य शिक्षण सहायक सामग्रीयों में सबसे सस्ती तथा सरल सामग्री है। इसका उपयोग सभी शिक्षक करते है। अपने शिक्षण में उद्देश्यों की प्राप्ति हेतू शिक्षक को श्यामपट्ट लेखन कौशल में सिद्धहस्त होना चाहिये।

कक्षा - शिक्षण में श्यामपट्ट का उपयोग

1. श्यामपट्ट कक्षा में तल से दो फुट के लगभग ऊचा होना चाहिये।

2. श्यामपट्ट पर लिखते समय 45 डिग्री के कोण पर खड़े होना चाहिये।

3. श्यामपट्ट पर किसी रोशनदान का सीधा प्रकाश ना पड़े । जिससे अक्षर ना दिखे।

4. श्यामपट्ट बहुत चिकना ना हो, इसके लिये उस पर समय-समय पर पाॅलिश करवाई जानी चाहिये।

5. श्यामपट्ट पर लिखते समय चाॅक आवाज ना करे, इसके लिये चाॅक की नाॅक आगे से तोड़ लेनी चाहिये।

6. कक्षा में श्यामपट्ट उपयोग के बाद चाॅक तुरन्त यथा स्थान पर रख देना चाहियें।

7. श्यामपट्ट का प्रयोग यदि आवश्यक हो तो ही करना चाहिये।

8. श्यामपट्ट पर लिखते समय सुन्दर लेख होना चाहिये।

9. अक्षरों को एक के बाद एक नियोजित ढ़ंग से लिखना चाहिये।

10. अक्षरों का आकार न तो अधिक बड़ा और न ही अधिक छोटा होना चाहिये।

11. लिखी जाने वाली पंक्ति सीधी रेखा में होनी चाहिये । यह प्रयोग अध्यापकों के लिये बहुत ही सावधानी का है।

12. एक ही तथ्य को बार-बार नहीं लिखना चाहिये।

13. श्यामपट्ट पर लिखने से पहले अच्छी प्रकार से उसे साफ कर लेना चाहिये क्योंकि बच्चे पुराने अक्षरों की मात्रा समझ कर गलत शब्द उतार लेते हैं या पढ़ लेते है।

14. अनावश्यक तथ्यों के लिये श्यामपट्ट का बचाना चाहिये । अन्याथा छात्र उसे भी विषय -वस्तु में सम्मिलित कर लेंगे।

15. कक्षा में प्रवेश करते हीे कक्षा, दिनांक, विषय,प्रकरण, कालाशं आदि अंकित कर देना चाहिये।

16. छात्रों को दिया जाने वाला गृहकार्य श्यामपट्ट पर लिखना चाहिये।

17. कालाशं समाप्त होने पर स्वयं श्यामपट्ट साफ करे । छात्रों से न कराये।

18. प्रकरण के विकास के साथ मुख्य बिन्दु अंकित करते रहना चाहिये।

19. लिखते समय साथ-साथ बोलते भी रहना चाहिये। इससे बालक सक्रिय रहेंगे।

20. लिखते समय कक्षा में अवश्य ध्यान देना चाहिये।

21. शिक्षक के पास चाॅक पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिये।

22. झाड़न अच्छा होना चाहिए, साफ करते समय आवाज नहीं आनी चाहिये व श्यामपट्ट पर खरोंच न आये।

23. श्यामपट्ट पर लिखते समय अध्यापक का शरीर छात्रों के श्यामपट्ट पढ़ने में बाधक नहीं होना चाहियंे।

श्यामपट्ट का महत्व/उपयोगिता

1. श्यामपट्ट विषय की प्रारम्भिक सूचनाएँ देने में सहायक होता है।

2. इससे बालकों को व्याख्या करके समझा सकते हैं।

3. श्यामपट्ट के द्वारा बालक शारीरिक और मानसिक रूप से क्रियाशील बना रहता है।

4. यह सहायक सामग्री की पूर्ति करता है।

5. सम्बन्धित प्रकरण को चित्र-रेखाचित्र आदि की सहायता से समझाने में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान हैै।

6. कठिन शब्दों के अर्थ विभिन्न विधियों से समझाये जा सकते है।

7. इस पर अंकित शिक्षण सामग्री छात्र के मानस पटल पर अंकित हो जाती है।

8. प्रकरण-कालांश-विषय आदि का बोध भी समय-समय पर होता रहता है।

9. शिक्षक के लेखन कौशल को सुदृढ़ बनाता है और छात्र के लेखन कौशल को भी विकसित करने में सहायक होता है।

10. छात्रों का ध्यान विकेन्द्रीकृत नहीं हो पाता। 

11. इससे सम्पूर्ण कक्षा एक साथ लाभान्वित हो सकती है।

12. यह गृहकार्य प्रदान करने में सहायक है।

13. गणित, विज्ञान,चित्रकला आदि विषयों में यह महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

14. कविता शिक्षण मे इसकी उपयोगिता है। अध्यापक सम्बन्धित पद्य को इस पर लिखकर शिक्षण कराने में सफल होता है।

15. अवकाश आदि की घोषणा के लिये भी श्यामपट्ट उपयोगी है।

16. श्यामपट्ट पर अनमोल वचन लिखकर छात्रों को दिखा सकते है।

17. श्यामपट्ट का प्रयोग करने से बालक की झिझक दूर होती है।

श्यामपट्ट लेखन कौशल के घटक

1. सुपाठ्य व सुलेखन- एक लेखने सुपाठ्य एवं अच्छे स्तर का तब माना जाता है, जबकि उसे आसानी से पढ़ा जा सके ।इसके लिये यह आवश्यक है कि अक्षरों की बनावट श्यामपट्ट पर ऐसी हो कि कक्षा का प्रत्येक बालक उसे अच्छी तरह से पढ़ सके।

2. व्याकरणिक शुद्धता- अध्यापक का प्रत्येक व्यवहार विद्यार्थी के लिये एक आदर्श व्यवहार होता है। यदि वह किसी शब्द को त्रुटिपूर्ण रूप में लिखता है, तो बालक भी उसे ही आदर्श मानकर लिखना प्रारम्भ कर देते हैं। अतः ध्यान रहे कि श्यामपट्ट पर जो भी लिखा जाये शुद्ध ही लिखें।

3. व्यवस्थित लेखन- व्यवस्थित लेखन से अभिप्रायःश्यामपट्ट पर लिखे शब्दों या वाक्यों  को एक विशेष क्रम में जमाना है और पंक्तियों का सीधी लाईन में ही लिखे। पाॅइन्टों में या आवश्यक हो तो सारणी में लिखना चाहिये तथा शब्दों एवं पंक्तियों के मध्य समान दूरी होनी चाहिये।

4. संक्षिप्तता- श्यामपट्ट का कक्षा में प्रयोग न करना तथा आवश्यकता से अधिक उपयोग करना दोनों ही स्थितियाँ उचित नही है। श्यामपट्ट का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिये कि पाठ्यवस्तु के प्रमुख बिन्दु का वर्णन उसमें आ जायें।

5. महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को रेखांकित करना- अध्यापक को श्यामपट्ट पर  महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं  को अवश्य रेखांकित करना चाहिये या रंगीन चाॅक का प्रयोग करना चाहिये। जिससे छात्रों का ध्यान केन्द्रित हो सके।

6. उपयुक्तता- श्यामपट्ट का उपयोग उचित तरीके या विधि से होना चाहिये। यानि छात्रों के लिये शिक्षक गतिरोध भी नही होना चाहिये। श्यामपट्ट साफ करने का तरीका उचित होना चाहिये। लिखते समय शब्दों को बोल-बोल कर लिखना चाहिये व सरल शब्दों में उपयोग होना चाहिये। लिखते समय 45 डिग्री कोण पर खडे़ होना चाहिये। बीच-बीच में कक्षा की तरफ भी ध्यान देना चाहिये व साफ करने से पहले बच्चों की सहमति अवश्य लेनी चाहिये।

श्यामपट्ट शिक्षण सहायक सामग्रीयों में से सस्ती सामग्री है। शिक्षण में इसकी आवश्यकता प्रारम्भ से अन्त तक है। इसके द्वारा शिक्षण कराने से ज्ञान स्थाई रहता हैै। श्यामपट्ट पर लिखें शब्द, छात्रों पर बहुत प्रभाव डालते है, इससे छात्रों में शुद्ध व सुन्दर लेख के प्रति जागृति बढ़ती है। सुव्यवस्थित श्यामपट्ट कौशल का उपयोग छात्रों मे श्यामपट्ट पर विभिन्न सारणियां, चित्र व आंकडों के द्वारा शिक्षण को प्रभावशाली बनाया जाता है।





ब्लॉग को like और subscribe जरूर करे । 

comment box मैं अपने yes अवश्य लिखे। 

Dr. D R BHATNAGAR 

सोमवार, 23 जनवरी 2023

उद्दीपन परिवर्तन कौशल (STIMULUS VARIATION SKILL)

उद्दीपन भिन्नता या उद्दीपन परिवर्तन कौशल

(STIMULUS VARIATION SKILL)

    शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक अपने शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिये वह अनेक क्रियाएँ करता है जिससे की छात्रों का ध्यान शिक्षण की और केन्द्रिक रख सकें। स्वभाविक क्रिया है कि ध्यान केन्द्रित रहेगा तो कुछ न कुछ अधिगम भी होगा। 

उद्दीपन का अर्थ

    उद्दीपन का अर्थ व्यक्ति के वातावरण में परिवर्तन से है। इस परिवर्तन के फलस्वरूप व्यक्ति अनुक्रिया या व्यवहार करने लगता है। उद्दीपन को व्यवहार परिवर्तन में सहायक माना जाता है तथा व्यवहार परिवर्तन का अधिगम माना गया है। जैसे बच्चे को अचानक पिन चुब जाती है तो अनुभव करेगा व पुनः पिन के हाथ नहीं लगायेगा।

उद्दीपन की परिभाषा 

    टेबर, ग्लेसर और शेफर के अनुसार, “काई परिस्थिति घटना अथवा वातावरण में परिवर्तन से यदि विद्यार्थियों के  व्यवहार में परिवर्तन होता है तो उसे उद्दीपन कहते हैं।“ 

उद्दीपन परिवर्तन कौशल का अर्थ

    शिक्षण की सफलता हेतु अध्यापक कक्षा में विद्यार्थियों का ध्यान पाठ्यवस्तु पर केन्द्रित करने हेतु कोई प्रकार के उद्दीपन प्रस्तुत करके विद्यार्थियों को अभिप्रेरित करता है। शरीर संचालन, हावभाव या भाव मुद्रा, आवाज में उतार-चढ़ाव, भाव केन्द्रीकरण, शिक्षक विद्यार्थी में अन्तःक्रिया का स्वरूप परिवर्तन, विराम प्रयोग तथा दृश्य-श्रव्य के क्रम में परिवर्तन करके  शिक्षक विद्यार्थियों को अपनी और आकर्षित कर सकता है । उद्दीपनों को कुशलतापूर्वक परिवर्तन करने के कौशल को ही "उद्दीपन परिवर्तन कौशल" कहते है।

उद्दीपन परिवर्तन कौशल के तत्व (घटक)

1.शरीर संचालन- कक्षा में शिक्षक की आवश्यकता से अधिक शारीरिक क्रियाएँ अवांछनीय होती है और शारीरिक क्रिया रहित शिक्षण भी कक्षा में एक अरूचिकर पत्थर की मूर्ति के समान होता है। अतः अध्यापक को आवश्यकतानुसार अपनी स्थिती बदलते रहना चाहिये।

2.हाव-भाव या भान मुद्रा- हाव-भाव या भाव-मुद्रा उसके अन्तर्गत मुख मुद्रा(हंसना, मुस्कुराना, भौहे चढ़ाना, संवेग, क्रोध, स्वीकृति,स्नेह आदि) सिर हिलाना, हाथ से संकेत करना (रूकने का संकेत, चुप रहने का संकेत ) आदि शामिल हैं।

3.आवाज में उतार-चढा़व लाना- एक ही सुर में निरन्तर बोलने से विद्यार्थी ऊब जाते हैं और उनका ध्यान पाठ से हट जाता है। शिक्षक हो चाहिये कि वह अपनी आवाज में उतार-चढ़ाव लाता रहे। महत्त्वपूर्ण वाले शब्दों को ऊंची आवाज में बोलने चाहिये व सामान्य को धीमी आवाज में बोलना चाहिये।

4.भाव-केन्द्रिकरण- इस भाव केन्द्रिकरण की प्रक्रिया में शाब्दिक केन्द्रिकरण मुद्रात्मक, केन्द्रिकरण तथा मुद्रात्मक-शाब्दिक केन्द्रिकरण शामिल है। शाब्दिक केन्द्रिकरण में शब्दों का प्रयोग करके तथा उन्हें बार-बार दोहराकर ध्यान का केन्द्रिकरण किया जाता है। मुद्राकरण केन्द्रीकरण में केवल भाव मुद्राओं के सहारे ही अर्थात मुद्रात्मक शाब्दिक केन्द्रिकरण में शब्दों के साथ संकेतों का भी प्रयोग किया जाता है।

5.अन्तःक्रिया में परिवर्तन- कक्षा में शिक्षक और के बीच अन्तःक्रिया के बिना कक्षा का वातावरण नीरस और उबाऊ बनकर रह जायेगा। परन्तु कक्षा में इन अन्तःक्रियाओं का प्रारूप निरन्तर बदलते रहना चाहिये। जैसे- छात्र-अध्यापक के मध्य, अध्यापक और सम्पूर्ण कक्षा के मध्य और छात्र-छात्रों के मध्य।

6.दृश्य-श्रव्य क्रम परिवर्तन- शिक्षण के समय कक्षा में प्रयोग की जाने वाली सहायक सामग्री के क्रम में निरान्तर परिवर्तन रहने से विद्यार्थियों का ध्यान (शिक्षक) शिक्षण की ओर केन्द्रित रहता है। अतः इनके क्रम में परिवर्तन करते रहना चाहिये।

7.विराम प्रयोग- कक्षा में अपनी व्याख्या-प्रक्रिया में आवश्यकतानुसार विराम का भी प्रयोंग करना चाहिये। जिससें छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन हो सके ।

 


ब्लॉग को like और subscribe जरूर करे । 

comment box मैं अपने शहर या गांव का नाम अवश्य लिखे। 

Dr. D R BHATNAGAR  


गुरुवार, 19 जनवरी 2023

उदाहरण सहित दृष्टान्त कौशल (ILLUSTRATING WITH EXAMPLES SKILL)

उदाहरण सहित दृष्टान्त कौशल 

ILLUSTRATING WITH EXAMPLES SKILL 

    शिक्षण कौशलों में उदाहरण सहित दृष्टान्त कौशल का अपना विशिष्ट स्थान है। इसके अन्तर्गत शिक्षण कराते  समय शिक्षक प्रकरण से सम्बन्धित अनेक कहानी, किस्से , घटना, श्लोक, दोहा, कविता, लोकोक्ति, मुहावरे आदि छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करता है। जैसे - आम के आम गुठलियों के दाम, बोये पेड़ बबूल का आम कहां से हाये आदि। इससे विषय वस्तु सरल, सरल, सरस, रोचक, प्रवाहमयी, बोधगम्य बन सकेगी जिसको बालक शीघ्र की हृदयंग कर सकेंगे। प्रदर्शन का भी इसमें विशेष महत्व है। अतः उदाहरण और दृष्टान्त पाठ्यवस्तु को रोचक सरल, बनाने के साथ ही उसे स्थायित्व भी प्रदान करते हैं ।

    शिक्षक किसी विशेष परिस्थिति में ही उदाहरण दृष्टान्त आदि का प्रयोग करता है। उदाहरण कौशल किसी विशेष सिद्धान्तों में ही प्रंयुक्त किया जा सकता है। कक्षा में  भिन्न - भिन्न प्रकृति बुद्धि विचारों  के छात्र होते हैं। अतः सभी को एक विधि से सन्तुष्ट नहीं किया जा सकता है। तीव्रबुद्धि छात्र मौखिक रूप से कराये गये शिक्षण का हृदयंग कर लेता है किन्तु उसी के साथ बैठा मन्द बुद्धि छात्र उससें लाभान्वित नहीं होता है। इस प्रकार के छात्रों के लिये उदाहरण सहित दृष्टान्त कौशल बहुपयोगी है। मनोवैज्ञानिक तथा शिक्षा शास्त्री लेण्डन ने इस विषय में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उदाहरण मात्र ज्ञान की व्याख्या अथवा स्पष्टीकरण ही नहीं करते, अपितु ये प्राप्त किये ज्ञान को चिर स्थायी बनाने में भी बहुत योगदान प्रदान करते है। अतः उदाहरण सहित दृष्टान्त कौशल पाठ्यवस्तु को सुग्राही बनाने में सहायक है। यह विशिष्ट शिक्षण कौशल है। 

    कक्षा में शिक्षण कराते समय अध्यापक अनेक प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत करता हैं। जैसे कविता, श्लोक, कहानी, घटना आदि कई ऐसे उदाहरण भी प्रस्तुत करने पड़ते है। कुछ उदाहरण प्रदर्शन करके दिखाया जाते है। अतः प्रमुख रूप से दो प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते है।

उदाहरणों के प्रकार

उदाहरणों दो प्रकार के होते हैं-

1. मौखिक रूप से दिये जाने वाले ।

2. प्रदर्शनात्मक रूप से दिये जाने वाले।

मौखिक उदाहरण - मौखिक रूप से दिये जाने वाले उदाहरणों  में सुक्ति, कहानी, कथा, मुहावरें  लोकोक्ति आदि को सम्मिलित करते है। यें प्रकरण के अनुसार प्रसंगवश दिये जा सकते है। अतः ये प्रासांगिक उदाहरण कहलाते है। जैसे - अध्यापक पढ़ रहा है कि ’जाको राखे साईया मार सके  ना कोय। ’ इसका भाव स्पष्ट करने के लिये वह कोई भी घटना या कहानी बालकों को सुना सकता है। भक्त प्रहलाद, मीराबाई आदि अनेक उदाहरण दे सकता है।

    कई बार किसी तथ्य को स्पष्ट करने हेतु किसी अन्य तथ्य से तुलना करके  समझाया जाता है। इन्हें तुलनात्मक उदाहरण कहते हैं इनका  प्रयोग प्रमुखतया भाषा सम्बन्धी विषयों में ही अधिक किया जाता है। विज्ञान में जलीय आवासीय जन्तु से तुलना की जा सकती है। अतः मौखिक उदाहरणांे में शाब्दिक क्रियायें ही प्रभावशाली होती है।

1. प्रदर्शनात्मक उदाहरण - छात्रों को पढ़ाते समय कभी-कभी ऐसी स्थिति आ जाती हैं कि शाब्दिक क्रिया बालक को समझाने में पर्याप्त नहीं रहतीं। ऐसे मे शिक्षक किसी स्थूल वस्तु का प्रदर्शन करता हैं। बालकों के समक्ष तत्काल (प्रकरण से सम्बद्ध) उस वस्तु को दिखाया जाने से बालक उसके बारे में जितना पढ़कर ज्ञात नहीं कर सके उससें कहीं ज्यादा उसे देखकर सीखते हैं। प्रदर्शन के लिये विज्ञान तथा गणित महत्त्वपूर्ण विषय हैं । विज्ञान के शिक्षण में जैसे - आॅक्सीजन गैस बनाने की विधि का पर्याप्त आकार का चित्र प्रस्तुत कर दिया जाये अथवा शिक्षक श्यामपट्ट पर उस सम्पूर्ण प्रक्रिया को  चित्र के रूप में अंकित कर दे तो सरलता से उसका अधिगम कर सकते है। इससे छात्र तथ्य/वस्तु के प्रत्येक अंग से परिचित होंगे  और उसे लम्बे समय तक नहीं भूलत। 

    कई विषय ऐसे हैं जिनका बोध कराने के लिये बालकों को विद्यालय से बाहर भी ले जाया जा सकता है। विज्ञान शिक्षण में ’’मरूस्थलीय पादप’’ पढ़ाते समय हमें हमारे प्रदेश के मरूस्थलीय भागों के पादपों के बारे में जानकारी देना तथा इस हेतु बाड़मेर व जैसलमेर तथा यहां स्थित फासिल बुड पार्क का भ्रमण करा कर जानकारी देने से छात्र पढ़े हुये ज्ञान का आत्मसात् करेंगे और प्रसन्नचित होकर और अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहेंगे।

 महत्वपूर्ण बिन्दू

    उपर्युक्त दोनों प्रकार के उदाहरण तथा दृष्टान्तों  को बालक के समक्ष प्रस्तुत करते समय शिक्षक को अपनी कुशलता का परिचय देना होता है। निम्नलिखित बिन्दुओं का ध्यान में रखना चाहिए-

1. उदाहरण,दृष्टान्त विषय से सम्बद्ध हो।

2. उदाहरण या दृष्टान्त का प्रयोग तत्काल करना चाहिये। यह नहीं हो कि प्रसंग तो प्रारम्भ में आया था और स्पष्टीकरण (उदाहरण) पाठ के अन्त में किया जा रहा है। ऐसे मे बालकों का मात्र मनोंरजन ही हो सकता है।

3. उदाहरण बालकों  के ज्ञानात्मक स्तर के अनुरूप ही हो।

4. उदाहरण दृष्टांत इस प्रकार की कथन शैली में दिया जाये कि बालक सरलता से उसका बोध कर ले। यदि जटिल शैली अपना ली तो बालक अधिक ग्रहण तो दूर की बात है, पहले पढ़ा था उसे भी भूल जायेगा।

5. उदाहरण/दृष्टान्त के उदाहरण/दृष्टान्त ही रहने दें, उन्हें विषय वस्तु न बना लें।

6. उदाहरणों में सत्यता,सार्थकता, सामाजिकता का समावेश अपेक्षित है।

7. उदाहरणों में किसी प्रकार की नैतिक शिक्षा भी हो। जिसके  असर बालक के व्यवहार पर पड़ सके ।

8. काल्पनिक जगत के उदाहरणों का सहयोंग नहीं लेना चाहिये।

9. असमय/अप्रासंगिक उदाहरणों का सहयोग नहीं लेना चाहिये।

10. भ्रमण के समय संकलित स्थलों का ही अवलोकन किया जाना चाहिये। अन्यथा समय का सदुपयोग नहीं हों सकेगा। छात्रों का विशेष ध्यान रखना चाहिये। सम्बन्धित स्थानों की जानकारी शिक्षक या गाइडर अच्छी तरह से दें।

उदाहरण सहित दृष्टान्त कौशल का महत्त्व

1. यह पाठ्यवस्तु का सरल, सरस तथा सुबोधगम्य बनाने में सहायक है।

2. पढे़ (सीखे) हुये ज्ञान को चिरस्थायी रख सकते है।

3. यह पूर्णतया मनोंवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित होने से व्यक्तिगत भिन्नता का ध्यान रखने में सहायक है।

4. इससे प्रकरण में आये कठिन तथ्य उदाहरण से परिपुष्ट होते है।

5. दृष्टान्त कौशल से बालक सूक्ष्म ज्ञान को भी समझ सकते है।

6. उदाहरण सहित दृष्टान्त कौशल बालकों की तर्कशक्ति प्रदान करता है।

7. इससें कल्पना शक्ति का विकास किया जा सकता है।

8. इसमें छात्र समीपता से गहन अध्ययन करने में सक्षम होते है।।

9. छात्रों को सक्रिय बनाये रखने तथा स्थायी अनुभव प्रदान करने में यह अत्यन्त सहायक है।

10. इसे छात्र ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक तीनों पक्षों से लाभान्वित हो सकते है।




ब्लॉग को like और subscribe जरूर करे । 

comment box मैं अपने शहर या गांव का नाम अवश्य लिखे। 

Dr. D R BHATNAGAR 


 

बुधवार, 18 जनवरी 2023

पुनर्बलन कौशल (REINFORCEMENT SKILL)

 पुनर्बलन कौशल 

reinforcement skill

छात्र के उत्साहवर्धन के लिये अध्यापक उसकी प्रशंसा करता है तथा अनुशासनहीनता या सही अनुक्रिया नहीं करने पर उसे दण्डित करता है। दोनों ही रूपों में पुनर्बलन दिया जाता है। पुनर्बलन कौशल छात्र के लिये एक तरह से अतिरिक्त शक्ति का कार्य करता है। अधिगम प्रक्रिया बिना पुनबर्लन के प्रभावशाली नहीं बन सकती है। वैसे देखा जाये तो मानव प्रत्येक दिन किसी न किसी से उत्प्रेरणा प्राप्त कर अधिगम करता है। बिना किसी अभिप्रेरणा के किसी कार्य को करने का विचार आ ही नही सकता । अत- पुनबर्लन प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में मिलता रहता है।

’’शिक्षक कक्षा में होने वाले वातावरण का सृजन करने वाला होता है। अतः वह दण्ड़ तथा पुरस्कार का विधान करता है। वह दण्ड और पुरस्कार को इस प्रकार प्रमुख करता है जिससे अधिकाधिक अधिगम हो तथा वह प्रभावशाली हो।’’

पुनर्बलन का अर्थ

शिक्षक का यह दायित्व बनता है कि बालक ने जो क्रिया की है उसके तत्कालबाद उसकी प्रतिपुष्टि करें। जिससे वह उस क्रिया में और अधिक तल्लीन हो जाता है और इससे शिक्षण में प्रभावकता आयेगी। अतः पुनर्बलन के अर्थ के लिये यह कहना उचित होगा कि शिक्षक द्वारा की गई वह प्रतिक्रिया जिससे छात्र उत्तेजित हो जाये और उत्तेजना स्वरूप वह किसी कार्य को पूर्ण तन्मयता के साथ करने में जुट जाए, अभिप्ररेणा रूपी वही प्रतिक्रिया पुनर्बलन कहलाती है। दण्ड की अपेक्षा प्रशंसा या पुरस्कार देना ही प्रभावशाली पुर्नबलन हो सकता है।

परिभाषाएँ

स्किनर के अनुसार, ’’पुनबर्लन वह स्थिति है जो बालक की अनुक्रिया में वृद्धि करती है।’’

ओलिवर के अनुसार, ’’अध्यापक द्वारा की गई प्रशंसात्मक मौखिक प्रतिक्रिया पुनबर्लन है।’’

हल के अनुसार, ’’पुनबर्लन वह प्रतिक्रिया है जिसके माध्यम से छात्र उत्पन्न चालक की सन्तुष्टि होती है।’’

    इस प्रकार अध्यापक द्वारा दी गई सकारात्मक तथा नकारात्मक अभिप्रेरणा पुनबर्लन को प्रभावित करती है।

पुनबर्लन के भेद

पुनबर्लन को दों भागों मे विभाजित किया जा सकता हैं -

1. सकारात्मक पुनबर्लन

2. नकारात्मक पुनबर्लन

1 सकारात्मक पुनबर्लन- शिक्षक के द्वारा अथवा किसी घटना, क्रिया-प्रतिक्रिया द्वारा की गई प्रतिपुष्टि से यदि और अधिक अच्छी अनुक्रिया होती है तो यह सकारात्मक पुनबर्लन कहलाता है।

अ. शाब्दिक सकारात्मक पुनबर्लन - इसके अन्तर्गत अध्यापक का वह व्यवहार आता है जिससे बालक में अभिप्रेरणा जागृति होती है। जैसे-ठीक है, हां समझ गये, बहुत अच्छा, शाबाश , बहुत अच्छा आदि कर के उसका मनोबल बढ़ाता है। इससे छात्र अपने आपको गौरान्वित महसूस करता है तथा सिखने की प्रक्रिया तीव्रं कर देता हैं।

ब. अशाब्दिक सकारात्मक पुनबर्लन - अशाब्दिक पुनबर्लन में शिक्षक शब्दों के स्थान पर संकेतों का प्रयोग करता है जो कि प्रभावशाली होता है, जैसे- सही उत्तर का श्यामपट्ट पर लिखना आदि से बालक का उत्साहित करता हैं।

2. नकारात्मक पुनबर्लन - कई बार छात्र या तो गलत उत्तर देता है या बताता ही नही है ऐसे मे उसे नकारात्मक पुनबर्लन से प्रोसाहित किया जाता है। इसे भी दो भागों मे विभाजित करते है।

अ. नकारात्मक शाब्दिक पुनबर्लन - इस पुनर्बलन प्रक्रिया में अध्यापक छात्र को गलतियों के लिए, नही ठीक नहीं हैं, सोचकर बताओं, अहूं, नहीं नहीं बैठेगा आदि शब्दों से उसे सही प्रतिक्रिया करने को प्रोत्साहित करता हैं तथा अनुचित क्रिया के लिये हतोत्साहित करता हैं।

ब. नकारात्मक अशाब्दिक पुनबर्लन- इस प्रकार के पुनबर्लन में अध्यापक शब्द का प्रयोग नहीं करता है। संकेत शिक्षक-सिर हिलाकर, क्रोधी मुद्रा में छात्र को देखकर, आखें दिखाकर अपनी अस्वीकृति का संकेत करता है

पुनबर्लन कौशल के घटक 

1. स्वीकारात्मक कथनों का अधिक प्रयोग

2. छात्रों का उत्साहवर्धन

3. विद्यार्थी के साथ सहानुभूति

4. विद्यार्थी की भावना को समझना

5. आंगिक तथा शाब्दिक दोनों का प्रयोग

6. नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करना।

7. नकारात्मक शाब्दिक और अशाब्दिक शब्दों का प्रयोग 

8. सभी का समान पुनबर्लन।

9. एक ‘शब्द‘ का बार-बार नहीं दोहराना।

10. विद्यार्थी की क्रिया के अनुरूप ही पुनबर्लन प्रदान करना।

11. सही उत्तरों का श्यामपट्ट पर लिखना।

पुनबर्लन कौशल में महत्वपूर्ण तथ्य

1. पुनबर्लन कौशल छात्र की अतिरिक्त शक्ति होती हैं। अतः सभी को दिया जाना चाहिये।

2. जहां तक हो सके सकारात्मक पुनबर्लन ही प्रदान करें।

3. छात्र की आवश्यकता के अनुरूप ही पुनबर्लन दे।

4. विशेष परिस्थिति मे दण्डात्मक पुनबर्लन भी अपेक्षित हैं अतः उसका भी यथासम्भव प्रयोग करें।

5. एक ही प्रकार का पुनबर्लन नहीं दे। शाब्दिक-अशाब्दिक विधि से छात्र को उत्साहित करें।

6. एक शब्द को बार-बार कहने से यह अध्यापक का उपनाम बन जाता है।अतः इसमें प्रत्येक छात्र के लिये भिन्न शब्द का प्रयोग करें।

7. जन-बूझकर पुनबर्लन देने से छात्र इसे विपरीत भाव में लेते हैं अतः शिक्षक को स्वाभाविक पुनबर्लन की देना चाहिये।

8. पुनबर्लन प्रदान करते समय अध्यापक विनम्र मुद्रा में ही रहें तो उपयुक्त रहता है।

9. पुनबर्लन मे नियमितता आवश्यक है। प्रत्येक उत्तर के लिये यह प्रक्रिया नहीं अपनानी चाहिये। इससे बालक की उत्तेजना नष्ट हो जाती है। 

10. अल्प विकसित छात्र का सकारात्मक पुनबर्लन नहीं दे। अन्य छात्रों के बीच उसकी अधूरी अनुक्रिया का भी पुनबर्लन करें।

11. पुनबर्लन में छात्र को नाम से पुकारे तो अच्छा रहता है।

12. छात्र का स्वास्थ्य को भी में रखे। कई बार स्वास्थ खराब होने की वजह से छात्र सही अनुक्रिया नहीं करता है। परिणामस्वरूप् शिक्षक उसे दण्ड देता है। सर्वथा अनुचित है।

13. प्रतिभाशाली छात्र के लिये अन्य छात्रों से भिन्न शाब्दिक पुनबर्लन न हो। इससे वह उत्तेजित होेंगे क्योंकि ‘शाबाश‘ आदि शब्द उसके लिये प्रभावी नहीं होते है।

14. छात्रों के मनोंभावों को भी समझें।

15. यदा-कदा सकारात्मक पुनबर्लन में पुरस्कार आदि की भी व्यवस्था करें।

16. छात्र को अन्योक्ति से बचायें । इससे इनका मनोबल टूट जाता है। 

17. अनुचित व्यवहार, अनुशासनहीनता करने पर दण्ड का ही प्रयोग करें, इससे पहले छात्र के विचार जानना आवश्यक है।




ब्लॉग को like और subscribe जरूर करे । 

comment box मैं अपने शहर या गांव का नाम अवश्य लिखे। 

Dr. D R BHATNAGAR 

सम्मेलन / कॉन्फ़्रेंस (Conference)

  सम्मेलन / कॉन्फ़्रेंस ( Conference) 1. परिभाषा ( Definition):      कॉन्फ़्रेंस एक औपचारिक और संगठित सभा होती है , जिसमें किसी विशेष वि...