POSDCORB लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
POSDCORB लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 25 मई 2021

स्कूल नियोजन में प्रधानाचार्य की भूमिका तथा प्रबन्धीय कार्य Duties and Responsibilities/Role of Head-Master

प्रधानाध्यापक के कर्तव्य एवं उत्तरदायित्त्व 
Duties and Responsibilities/Role of Head-Master



    प्रधानाध्यापक विद्यालय का केन्द्र बिंदू होता है। विद्यालय के समस्त कार्यक्रम उसी के द्वारा संचालित होते है- विद्यालय कार्यक्रम का नियोजन कार्य का विभाजन, प्रवृतियों का समायोजन आदि समस्त कार्यो पर उसी की छाप दृष्टिगोचर होती है। वह विद्यालय के प्रत्येक कार्यक्रम में दृष्टिगोचर प्रधानाध्यापक को निम्नकिंत कार्य करता है। अतः एक विद्यालय के लूथर गुलिक प्रधानाध्यापक के सात कार्य बताए है ये संक्षिप्त में अपने POSDCORB (पोस्डकोरब) के रूप में व्यक्त किया है 
1. योजना निर्माण (Planning)-प्रधानाध्यापक का सबसे पहला कार्य योजना बनाना है। सत्र प्रांरभ होने से पूर्व ही उसे विद्यालय की वार्षिक योजना, मासिक योजना, दैनिक योजना आदि का निर्माण करना पडता है ताकि सत्रारम्भ के प्रथम दिवस से ही विद्यालय नियमित रूप से कार्य प्रारम्भ कर सकें। योजना निर्माण प्रधानाध्यापक सफलता की प्रथम कड़ी है।
2. संगठन (organization)-प्रधानाध्यापक का दूसरा कार्य शालीय संगठन है जिसे मुख्यतः तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है - (1) मानवीय (2) आर्थिक (3) शैक्षणिक।
(1) मानवीय संगठन की दृष्टि से शिक्षक, कार्यालय कर्मचारी, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आदि की नियुक्तियाँ उच्चधिकारियों से कराना ताकि विद्यार्थियों की शिक्षा में व्यवधान उत्पन्न न हो।
(2) आर्थिक संगठन के अंतर्गत शालीय बजट प्राप्त करना, विद्यालय भवन में आवश्यकतानुसार नवीन कक्ष निर्माण एवं साज-सज्जा, शालीय उपवन यदि हो आदि के रखरखाव हेतु सरकार एवं जनसंम्पर्क के माध्यम से धन प्राप्त कर विद्यालय को आदर्श विद्यालय बनाने से है।
(3) शैक्षिक संगठन की दृष्टि से विषयाध्यापकों के लिए उनकी योग्यतानुसार समय - विभाग चक्र का निर्माण तथा शाला में छात्रों के प्रवेश कार्य आदि को समय पर पूर्ण कराने से है।
3. निरीक्षण (पर्यवेक्षण)(supervision)-सम्पूर्ण विद्यालय की शैक्षिक सहशैक्षिक एवं अन्य गतिविधयों का प्रधानाध्यापक निरीक्षण करता है। दूसरे शब्दों, वह स्वयं विद्यालय का निरीक्षक होता है और स्वयं ही बनाई योजना का निरीक्षण कर उसकी सफलता एवं असफलता का मूल्याकंन करता है।
4. निर्देशन(Direction)- प्रधानाध्यापक अपने सहयागी शिक्षकों, छात्रों, नय कार्यरत कर्मचारियों और अभिभावकों को समय समय पर आवश्यक निर्देश कार्य मौखिक एवं लिखित दोनों ही रूपों में होता है। निर्देश शाला को खुशहाली, अध्यापकों का मार्गदर्शन तथा छात्रों की शैक्षिक प्रगति पर आधारित होते है।
5. समन्वय(co-ordiation)-आर्थिक, भौतिक और मानवीय संसाधनो के अधिकतम उपयोग के समन्वय का कार्य भी प्रधानाध्यापक को ही करना पडता है। वह प्रतिष्ठित व्यक्तियों को उत्सव एवं पर्वो पर आमंत्रित करता है। शिक्षकों से भी सक्रिय सहयोग प्राप्ति हेतु सम्पर्क बनाए रखता है।
6. प्रतिवेदन (Reporting)-प्रधानाध्यापक को विद्यालय संबंधी प्रकरणों का प्रतिवेदन भी तैयार कर उच्चधिकारियों को प्रेषित करना पड़ता है। ये अतिमहत्वपूर्ण होते है और इन पर विद्यालय की भावी प्रगति आधारित होती है।
7. बजट बनाना (Budgeting)-वित्तीय एवं आर्थिक संसाधनों एवं उनके उपयोग हेतु बजट पडता है। बजट बनाना और उसे प्राप्त करना विद्यालय की अनिवार्य आवश्यकता है।
    लूथर गुलिक ने सात कार्याे का वर्णन किया है। फिर भी इन कार्यो के अलावा प्रधानाध्यापक को कुछ अन्य कार्य भी करने पडते है जो अद्योलिखित है-
1. अध्यापन कार्य- प्रधानाध्यापक एक योग्य एवं दक्ष अध्यापक होता है तत्पश्चात् प्रशासक। उसका स्वयं का शिक्षण कार्य अध्यापकों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए वह एक सफल शिक्षक होने के बाद ही शिक्षकों का नेतृत्त्व कर सकता है और मार्गदर्शन दे सकता है। उसका आने विषय पर पूर्णाधिकार होना चाहिए।
2. समय-विभाग चक्र बनाना- शिक्षण कार्य का प्रभावी रूप से चलाने हेतु समय-सारिणी अथवा समय विभाग चक्र बनाना नितान्त आवश्यक है। इसमें विद्यालय का समस्त शैक्षिक एवं सहशैशिक कार्यक्रम प्रतिबिम्बित होता है। विभिन्न प्रकार के समय-विभाग चक्र बनाए जाते है।
3. कक्षाव्यवस्था करना - प्रत्येक कक्षा में बैठने के लिए जहाँ तक संभव हो सके प्रत्येंक - प्रत्येक कक्ष की व्यवस्था की जावें। 
4. कक्षा कक्ष में फर्नीचर आदि की व्यवस्था - प्रत्येक कक्षा - कक्ष में छात्रों के नामांकन के अनुसार फर्नीचर की व्यवस्था, कक्षा में शिक्षक हेतु एक मेज एवं कुर्सी की भी व्यवस्था प्रधानाध्यापक ही करता है। 
5. सहशैक्षिक क्रियाओं की व्यवस्था - शैक्षिक व्यवस्था के साथ - साथ छात्रों चतुर्मुखी विकास हेतु सहशैक्षिक क्रियाओं की भी व्यवस्था की जानी चाहिए। 
6. विद्यालय भवन की साज सज्जा एवं सफाई - छात्रों के स्वास्थ्य को दृष्टिगत रखते हुए विद्यालय भवन की पूताई, फर्नीचर आदि पर वार्षिक कराना तथा विद्यालय को सुसज्जित कराना भी प्रधानाध्यापक का प्रमुख कार्य है। 
7. परीक्षा सचालन एवं परीक्षा परिणाम - विभागीय पंचागनुसार मासिक जाँच, अर्द्धवार्षिक परीक्षा एवं वार्षिक परीक्षा का संचालन करना भी प्रधानाध्यापक का मुख्य कार्य है। 
8. शिक्षक और छात्रों की समस्याओं का निराकरण करना - एक सफल प्रधानाध्यापक अपनी शाला के शिक्षकों और छात्रों की व्यक्तिगत तथा शालीय समस्याओं का भी निराकरण करता है। एक दक्ष व योग्य प्रधानाध्यापक उनकी समस्याओं को अपनी समस्या मानकर उनका निराकरण एवं समाधान करता है। 
9. सम्पर्क स्थापित करना - एक प्रधानाध्यापक को अपने उच्चाधिकारियों से भी निकटतम संबंध बनाए रखना पड़ता है, जिससे कि विद्यालय उन्नति में उनका सहयोग प्राप्त किया जा सके। 
10. पाठ्य - पुस्तकों का चयन - निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार प्राथमिक से माध्यमिक कक्षाओं के लिए पुस्तकें नियतो निश्चित होती है, परन्तु उच्च माध्यमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक के लिए कई वैकल्पिक पुस्तकें स्वीकृत रहती है। 
11. प्रशिक्षक कार्य - शिक्षण की नवीन विद्याओं, नवचारों का साथी शिक्षकों का ज्ञान कराना, साथी शिक्षकों के ज्ञानार्जन में सहायक है। 
12. छात्रों का प्रवेश एवं वर्गीकरण - प्रधानाध्यापक को विभिन्न कक्षाओं में छात्रों को प्रवेश देने का कार्य करना पड़ता है। 
13. अनुशासन व्यवस्था - विद्यालय में अनुशासन की व्यवस्था करना प्रधानाध्यक का प्रमुख कत्र्तव्य है। 
14. कार्यालय का कार्य - किसी विद्यालय का कार्यालय ही उसकी धुरी होता है। यहीं पर महत्वपूर्ण अभिलेख सुरक्षित रखे जाते है। 
15. लिखित कार्य की जाँच - प्रधानाध्यापक स्वयं अपने विषय में लिखित कार्य की जाँच उसी प्रकार करें जैसा कि वह अपने साथी शिक्षकों से चाहता है। 
16. व्यावसायिक समुन्नयन - विद्यालय में विषय - विशेषज्ञों द्वारा वार्ताओं का आयोजन, विचार - गोष्ठियों - सम्मेलनों का आयोजन, वाद-विवाद, पत्र-वाचन, अध्ययन-वृत्त आदि आयोजित कर शिक्षकों का व्यावसायिक समुन्नयन किया जा सकता है। 
प्रधानाध्यापक में गुण अंग्रेजी के शब्द HEADMASTER में इस प्रकार निहित है - 
H – Honest(ईमानदार)
E – Earnest(उत्सुक)
A – Accountable(जवाबदेह)
D – Dignastic (नैदानिक)
M – Marager (प्रबन्धक)
A – Affective (प्रभावात्मक)
S – Sincere (सत्यनिष्ठ)
T – Tactful (नीति-निपूण)
E – Effecint(योग्य)
R – Resaurceful (साधन - निपुण)
प्रधानाचार्य के कार्य (Functions of Principle) 
1. शैक्षिक क्रियाओं सम्बन्धी कार्य- शिक्षण क्रियाओं के रूप में प्रधानाचार्य द्वारा पाठ्यक्रम का चयन करना, शिक्षण विधियों व सहायक सामग्री की व्यवस्था करना, मूल्यांकन करना, निर्देशन देना आदि कार्य किए जाते हैं, ताकि विद्यालय का चहुँमुखी विकास किया जा सके।
2. शिक्षकों सम्बन्धी कार्य- विद्यालय के समस्त कार्यक्रमों का सफलता तथा असफलता उसके राक्षका पर निर्भर होती है। शिक्षक ही केवल वह एक साधन है जो स्कूल को गतिशील बनाए रखता है। इसक बिना विद्यालय शन्य बना रहता है। अतः प्रधानाचार्य द्वारा शिक्षकों को मार्ग-दर्शन व परामर्श देना, उन्नति के अवसर प्रदान करना. कार्यभार सन्तुलित करना, सभी सुविधाएँ देना तथा कार्य का मूल्यांकन करना आदि कार्य किए जा सकते है।
3. छात्र वर्ग सम्बन्धी कार्य - आज के युग में विद्यालय, प्रशासन का यह प्रमुख कार्य है कि प्रत्येक एसछात्र को ऐसे उत्तरदायी,स्वःअनुशासित, उत्साही तथा एक सशक्त कार्यकर्ता के रूप में तैयार करे जो अपने परिवार, समाज राजनीति प्रणा जीवन के हर क्षेत्र में प्रभावी रूप से कार्य कर सके। इस प्रकार प्रधानाचार्य छात्रा को उचित निर्देशन एवं परामर्श देना उनकी संख्या निश्चित करके कक्षा तथा विषय आदि में दर्ज  करना, प्रगति सम्बन्धी रिकार्ड तैयार करना, परीक्षा व उपयुक्त मूल्याकन का व्यवस्था, समचित अनुशासन की व्यवस्था करना छात्र वर्गीकरण के लिए नीतियाँ बनाना, पिछड़े छात्रों के लिए अलग सेशिक्षा की व्यवस्था करना एवं वित्तीय सहायता देना आदि कार्य किए जाते हैं।
4. विद्यालय प्रबन्धन सम्बन्धी कार्य - हेनरी स्विलिन महोदय के अनुसार ‘‘विद्यालय प्रबन्धन का मजतवपूर्ण कार्य शिक्षकों, छात्रों तथा अन्य कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग स्थापित करना है‘‘ अतः विद्यालय प्रबन्धन का मार्गदर्शन उत्तम शिक्षक छात्र सहयोग पर ही आधारित होता है।  इन्हे ही प्रशासन का उत्तम साधन माना गया है। इस प्रकार प्रधानाचार्य द्वारा विद्यालय प्रबन्धकों को उचित निर्देश प्रदान करना, प्रबन्ध सम्बन्धी नीतियों को निश्चित करना, शिक्षक संघ का गठन करना, विकास समितियों का गठन करना, उपलब्धि की जाने हेतु एक संयोजक की नियुक्ति करना आदि कार्यो में किया जाता है।
5. वित्त सम्बन्धी कार्य - मारेफेट(Morphet) के अनुसार, ‘‘शिक्षा के क्षेत्र में केवल लेखा-जोग रखना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस धन से अधिकतम शैक्षिक उपलब्धियाँ प्राप्त करनी है।‘‘ यह केवल उचित प्रशासन द्वारा ही सम्भव है। इस प्रकार प्रधानाचार्य द्वारा विद्यालय वित्तीय योजना का निर्माण करना आय-व्यय का बजट बनाना, लेखा-जोखा का विवरण रखना सभी कर्मचारियों के वेतन की व्यवस्था करना, आय-व्यय का मूल्यांकन करना, प्रबन्धन समिति के सभी मदों का विवरण रखना, वित्तीय विभाग व शिक्षा विभाग से सम्बन्ध रखना तथा वित्त के अनुसार कार्यों की व्यवस्था करना आदि विशेष कार्य किए जाते हैं।
6. विद्यालय कार्यालय सम्बन्धी कार्य- कार्यालय द्वारा विद्यालयों की समस्त गतिविधियों को विकसित किया जाता है। इसका सम्बन्ध सभी क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं से रहता है। अतः उत्तम कार्यालय ही उत्तम विद्यालय का निर्माण करता है। इसी के द्वारा विद्यालय की प्रगति को आँका जाता है। इस प्रकार प्रधानाचार्य द्वारा कार्यालय का निरन्तर आडिट (।नकपज) कराना, सभी वित्तीय रिकार्डों की जाँच करना, वार्षिक व अर्धवार्षिक सहायता प्रतिवेदनों का निरीक्षण कराना, वित्त सम्बन्धी उचित परामर्श प्रदान करना, आय-व्यय सम्बन्धी रूपरेखा तैयार करके देना आदि कार्य किए जाने चाहिए। वार्षिक बजट भी प्राचार्य ही तैयार करता है
प्रधानाचार्य के प्रबन्धकीय कार्य (Functions of Principal in Management) 
। . नियोजन कार्य (Planning as Functions)
    विद्यालय के खुलने से पूर्व -इस स्तर पर प्राचार्य को निम्नलिखित कार्यों का नियोजन करना होता है 
    ग्रीष्मकालीन अवकाश के पश्चात् विद्यालय खुलने की तिथि की घोषणा की जाती है। विद्यालय में प्रवेश की अन्तिम तिथि, एक आवेदन-पत्र प्राप्त किए जा सकेंगे। कुछ कक्षाओं के लिए प्रवेश परीक्षा का भी आयोजन किया जाएगा। परीक्षा की तिथियाँ तथा परीक्षा की व्यवस्था भी की जाएगी। विद्यालय के नोटिस बोर्ड पर सभी सूचनाओं को अंकित किया जाता है। यदि सम्भव हो सके तो समाचार-पत्र में भी विज्ञापन दे दिया जाता है।
    प्रवेश के नियमों तथा प्रक्रिया को तैयार किया जाता है। इसके लिए एक प्रवेश समिति का गठन किया जाता है, जिसका उत्तरदायित्व प्रवेश प्रक्रिया का सम्पादन करना तथा पूरा करना होता है। कक्षा में छात्रों की संख्या भी सुनिश्चित की जाती है। प्रवेश सम्बन्धी समस्याओं का प्रवेश समिति ही समाधान करती है।
प्रधानाचार्य के प्रबन्धकीय कार्य (Functions of Principal in Management) 
नियोजन कार्य (Planning as Functions)
  • प्राचार्य के विद्यालय के फर्नीचर तथा साज-सज्जा की भी व्यवस्था करनी होती है।संसाधन, उपकरण तथा पुस्तकों का भी पुस्तकालय में आयोजन करना होता है। टूटे हुये फर्नीचर को ठीक करना होता।  प्रधानाचार्य इन कार्यों का उत्तरदायित्व वरिष्ठ अध्यापकों को भी सौप देता है और अधिकार भी देता है।
  • विद्यालय में आवश्यक सामग्री उपस्थित रजिस्टर, डायरी, चाक, डस्टर, श्यामपट्ट आदि की व्यवस्था करता है। 
  • प्राचार्य विद्यालय शिक्षा सत्र का कलेण्डर भी तैयार करता है जिसमें पूरेसत्र क्रिया, अन्य मों तथा अवकाश की तिथियों का विवरण दिया जाता है।
  • आवश्यकतानुसार शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्तियाँ भी करता है। कार्यालय साबन्धी रजिस्टारों की व्यवस्था की जाती है।
  • प्रधानाचार्य विद्यालय भवन की पुताई तथा टूट-फूट को ठीक कराता है। फर्नीचर की पॉलिश भी कराता है।। जिससे नए सत्र में विद्यालय भवन नया-सा दिखाई दे। विद्यालय का भौतिक छात्रों के लिए आकर्षक लगना चाहिए। 
ब्लॉग पर टिप्पणी और फ़ॉलो  जरूर करे । 
आप कौन सा टॉपिक चाहते हैं? 
कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। 
हमारी पूरी कोशिश रहेगी कि आपको NEXT day टॉपिक available करवाया जाए। 

FOR M.ED. 1 YEAR SYLLABUS LINK 
FOR M.ED. 2 YEAR SYLLABUS LINK 
FOR UGC NET 1 PAPER SYLLABUS LINK 


शनिवार, 15 मई 2021

शैक्षिक प्रबन्धन

शैक्षिक प्रबन्धन
Educational Management


प्र्बन्धन की अवधारण
 
    प्रबन्धन के द्वारा समस्त मानवीय एवं भौतिक संसाधनों की व्यवस्था तथा उनकी अधिकतम उपयोग किया जाता है। इससे कार्य प्रणाली में गति आ जाती हैं, साधनों का मितव्ययता पूर्ण उपयोग होता हैं। तथा उद्देश्यों की पूर्ति सहजता के साथ हो जाती है। प्रबन्धन ही वह तत्त्व हैं जिसके द्वारा हम पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को कम से कम समय तथा परिश्रम के साथ प्राप्त कर सकते हैं। वर्तमान में हमारे चारों ओर अनेक औपचारिक, अनौपचारिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक संगठन फैले हुए है। ऐसे संगठनों कों निर्देशित, समान्वित तथा एकीकृत करने हेतु प्रबन्धन की आवश्यकता पड़ती हैं।
 
    औद्योगिक जगत में प्रबन्ध का स्थान एवं महत्त्व निरन्तर बढ़ता गया तथा उसका एक पृथ्क शास्त्र का विकास हुआ। आज विश्व में प्रबन्ध का महत्त्वपूर्ण स्थान हैं। प्रबन्धन के द्वारा नियोजन का कार्य किया जाता हैं। नियोजन के कारण हम शिक्षण मेें अनिश्चितता तथा को दूर कर अपनें कार्योे  तथा उद्देश्यों में स्पष्टता तथा सोदेश्यता लाते हैं। प्रबन्धन से नेता की कार्य-दक्षता  में वृद्धि होती हैं ’’प्रबन्धन मंें केवल अधिकारत्व भी शामिल नही हैं अपितु इसमें वैज्ञानिक चिन्तन व्यवस्थापन, दिशा-निर्देशन तथा नियंत्रण आदि भी शामिल होते है।’’ इस प्रकार कार्य को व्यवस्थित ढंग से सम्पन्न कराने को प्रबन्धन कहा जाता है। 
 
प्रबन्धन का अर्थ 
 
प्रबन्धन एक व्यापक अवधारणा है। प्रबन्ध की विचारधारा इतनी जटिल हैं कि विद्वान इसे अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं और उद्देश्य कों ध्यान में रखकर समझाने की कोशिश करते है। कार्य को व्यवस्थित ढंग से करानें की कला, परन्तु इस अर्थ का प्रयोग प्रत्येक क्षेत्र में नही किया जाता चूंकि प्रबन्ध मानवीय संगठन में किसी न किसी रूप में पाया जाता हैं, चाहे विद्यालय, सरकार, संगठना, सेना, परिवार।
 
प्रबन्धन की परिभाषा 
 
एफ. डब्ल्यू टेलर के अनुसार’’ प्रबन्धन यह जानने की कला हैं कि आप व्यक्तियो से वास्तव में क्या काम लेना चाहते हैं? तथा यह देखना कि वे उसकों मितव्ययी तथा उत्तम ढंग से पूरा करते हैं।’’
         “Management is an art of knowing exacty what you want man to do and then seeing they do it in the best and economical way.”
 
जैक डंकन के अनुसार ’’प्रबन्धन में उन सभी संगठनात्मक क्रियाओ को सम्मिलित किया जाता हैं जो उद्देश्यपूर्ति तथा प्राप्ति कार्य-मूल्याकंन तथा उस कार्यात्मक दर्शन के विकास से सम्बन्धिन हैं, जों सामाजिक प्रणाली में संगठन के  अस्तित्व कों सुनिश्चित करती है।’’
 
सी. डब्लयू. विलसन के अनुसार ’’प्रबन्ध एक निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मानवीय शक्तियों के प्रयोग एवं निर्देशन की प्रकिया हैं।’’
“Management is a process of relasing and directing human energies towards attaining a definite goal.”
 
शैक्षिक प्रबन्ध की अवधारणा
 
    शैक्षिक प्रबन्धन के क्षेत्र में वंछित शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए की जाने वाली प्रक्रिया हैं जिससे शिक्षण एवं अधिकतम की प्रक्रिया को ध्यान में रखा जाता हैं। लोककल्याणी राज्य में शिक्षा की व्यवस्था व्यापक रूप से सामनें आई इस बढती विधार्थियों की संख्या एवं उदेश्यों की विस्तृता के कारण  शैक्षिक प्रबन्ध आवश्यक हो गया। शैक्षिक प्रबन्ध से तात्पर्य शिक्षा से सम्बन्धित सारी व्यवस्थाओं में कार्य करने की कला व्यवस्था एवं प्रबन्ध से हैं।
 
    विधालय में इस प्रकार का प्रबन्ध हो कि उसे उचित संरक्षण एवं शिक्षा भली भाॅति प्राप्त करने के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। सम्पूर्ण प्रक्रिया प्रबन्धन की ओर संकेत करती हैं क्योंकि शैक्षिक प्रबन्धन के अभाव से छात्रों को सर्वांगीण विकास के अवसर विधालय में उपलब्ध नहीं हो सकते हैं।

शैक्षिक प्रबन्ध का अर्थ एवं परिभाषाए
 
    शैक्षिक प्रबन्ध दो शब्दों का सयुक्त है - शैक्षिक (शिक्षा) एक प्रबन्ध (व्यवस्था) अतः शैक्षिक प्रबन्ध का अर्थ हुआ शिक्षा प्रक्रिया की व्यवस्था (प्रबन्ध) करना। विद्यालय में इस प्रकार का प्रबन्ध हो कि उसे उचित संरक्षण एवं शिक्षा भली-भाति प्राप्त करने के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करायी जानी चाहिए। सम्पूर्ण प्रक्रिया शैक्षिक प्रबन्धन की और संकेत करती है क्योकि शैक्षिक प्रबन्धन के अभाव से छात्रों को सर्वागीण विकास के अवसर विद्यालय में उपलब्ध नही हो सकते है।
 
    शिक्षा प्रबन्धन का आशय सामान्या बांलचाल की भाषा में इस प्रकार निकलते है। कि मनुष्य अन्तनिर्हित शक्तियों का विकास किस माध्यम से कर सकता है। उन माध्यमों को व्यवस्थित क्रमबद्ध एवं एकीकृत करना। यह शिक्षा प्रबन्धन की नवीनतम अवधारणा है। जिसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का संतुलित विकास एवं समाज में समायोजित करने का अधिकतम अवसर प्रदान करना। तथा शिक्षा को जीवन से धनिष्ठ रूप से जोडने की आवश्यकता को ध्यान में रखकर शिक्षा के उद्धेश्यों को ध्यान में रखा गया।
 
    विद्यालयी प्रबन्ध में मानव (शिक्षक व छात्र), मशीन (विद्यालय), साधन (उपकरण), माल (शैक्षिक प्रक्रिया), निष्पति, मुद्रा बाजार (शुल्क) अर्थव्यवस्था तथा मानव शक्ति नियोजक तथा संगठन (प्रबन्धक, प्रधानाचार्य शिक्षक, छात्र, कर्मचारी, अभिभावक) इन सबको गतिशील बनाए रखता है अर्थात् शिक्षण एक व्यवसाय है। इसमें शिक्षक अपने ज्ञान तथा कौशल की सेवाएॅ धन के बदले छात्रों को देता है। इस प्रक्रिया की सफलता उत्तम प्रबन्ध पर निर्भर करती है।
 
शिक्षण-अधिगम के प्रबन्धन का कार्य प्रमुख रूप से अध्यापक का होता है। इस हेतु शिक्षक ही प्रबन्ध कर्ता की भूमिका अदा करता है। शिक्षण अधिगम के प्रबन्धन के लिए वह योजना बनाता है। व्यवस्था करता है। अग्रेषित करता है। तथा नियंत्रण करता है। अध्यापक इन विभिन्न प्रकार के शेैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार की शैक्षिक क्रियाएँ करते है। 

“ प्रबन्ध यह जानने की कला है कि क्या करना है। तथा इसे करने का सर्वोतम तरीका क्या है।“ -एफ. डब्ल्यू. टेलर। 
 
शैक्षिक प्रबन्ध शिक्षा के क्षेत्र मेे वांछित शासकीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए की जाने वाली प्रक्रिया है। इसका सम्बन्ध शिक्षा संस्थाओं से हैं जिसमें शिक्षण एवं अधिगम की प्रक्रिया एवं उसके परिणामों को ध्यान में रखा जाता र्है। और आज शैक्षिक प्रबन्ध ने एक विस्तृत एवं गतिशील अवधारणा का रूप ले लिया और उसके कार्यक्षेत्र का भी विस्तार हुआ।

 POSDCORB

लूथर-गुलिक ने शैक्षिक प्रबन्ध के कार्य को “POSDCORB” के प्रबन्ध सूत्र मे पिरोया है। 



परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्ष -

  1. शैक्षिक प्रबन्ध अमुर्त होता है। 
  2. शैक्षिक प्रबन्ध अनवरत चलनें वाली प्रक्रिया है। 
  3. शैक्षिक प्रबन्ध सामूहिक योगदान पर सफल होता है। 
  4. शैक्षिक प्रबन्ध उपलब्ध साधनों का अधिकतम प्रयोग करता है। 
  5. समन्वित दृष्टिकोण होता है। 
  6. शैक्षिक प्रबन्ध एक व्यवसाय के रूप में धंसा जा रहा हैं ।
  7. शैक्षिक प्रबन्ध एक  उद्देश्य पूर्ण क्रिया है।
  8. शैक्षिक प्रबन्ध एक सामाजिक क्रिया है। 
  9. प्रबन्ध का दायित्व काम करवाना है। 
  10. शैक्षिक प्रबन्ध कला और विज्ञान दोनों है। 
  11. शैक्षिक प्रबन्ध एक समूह संज्ञा है। 
  12. शैक्षिक प्रबन्ध में नियोजित एवं क्रमबद्ध रूप में कार्य होते है। 
  13. शैक्षिक प्रबन्ध में सहयोग की भावना निहित होती है। 

शैक्षिक प्रबन्ध की विशेषताए 

 CHARACTERISTICS OF EDUCATIONAL MANAGEMENT

1. नियोजित व्यवस्था - शैक्षिक प्रबन्ध  की महत्त्वपूर्ण व्यवस्था नियोजन से सम्बन्धित है। विद्यालय मे सम्पूर्ण व्यवस्था पूर्ण नियोजन होती हैं । सम्पूर्ण शैक्षिक कार्यों को कमबद्ध तरीके से किया जाता हैं ं। यह प्रबन्ध के क्षेत्र की सबसे आधारभूत विशेषता मानी जाती है। 

2. शैक्षिक प्रबन्ध  एक समन्वयकारी संसाधन है- शैक्षिक प्रबन्ध  के माध्यम से शिक्षा के विभिन्न साधनों में समन्वय स्थापित करता है। प्रबन्ध एक जटिल अर्थ वाली प्रक्रिया है, इसका सम्बन्ध अधिकारियों से है। यह एकीकरण की प्रक्रिया द्वारा वह शिक्षा की प्रक्रिया को सफल बनाता है।

3. अनवरत चलने वाली प्रक्रिया-शैक्षिक प्रबन्ध अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। इसमेें योजना बनाने, निर्णय करने, संगठन करने, निर्देशन, समन्वय आदि के बारे में निरन्तर कार्य किए जाते है। इसका सम्बन्ध प्रबन्धक की नीतियों को क्रियान्वित करने से है।

4. सामूहिकता- शैक्षिक प्रबन्ध में प्रधानाध्यापक, अध्यापक, विधार्थी अभिभावक सभी में सामूहिक उतरदायित्व की भावना पर बल दिया जाता है। इसीलिए विद्यालयों मेे अध्यापक-अभिभावक परिषद् बनाई जाती है। और समय पर अभिभावको से सम्पर्क किया जाता है। सभी के सामूहिक योगदान पर ही शैक्षिक प्रबन्ध सफल हो सकता  है।

5. उद्धेश्यपूर्ण- प्रबन्ध के प्रत्येक क्षेत्र में प्रबन्ध का उद्धेश्यपूर्ण होना चाहिए शैक्षिक उद्धेश्य की प्राप्ति ही शैक्षिक प्रबन्ध का मुख्य उद्धेश्य हैं । शैक्षिक प्रबन्ध का मुख्य विधार्थियों का सर्वागीण विकास करना है। तथा शिक्षा से जुडे सम्बन्धित महत्वपूर्ण अधिकारियों के सूझावों को भी स्थान दिया गया है। 

6. प्रबन्ध एक सामाजिक क्रिया हैं- मनुष्य के समाजीकरण में जो स्थान समाज को प्राप्त  है। वही स्थान शिक्षा के क्षेत्र में प्रबन्ध का हैं 

7. उपलब्ध साधनों का उपयोग- शैक्षिक प्रबन्ध में उपलब्ध साधनों का अधिाकतम उपयोग किया जाता हैै आज हमारे विद्यालय में सीमित मात्रा मे साधन उपलब्ध है। और शैक्षिक प्रबन्ध के द्वारा इन उपलब्ध साधनों का उपयोग अधिकतम लाभ के लिए किया जाता है। 

8. प्रबन्ध एक सार्वभौमिक क्रिया है।- शैक्षिक प्रबन्ध के द्वारा पूर्व निर्धारित शैक्षिक लक्ष्योे को आसानी से पूरा किया जा सकता है। क्योकि यह एक सार्वभौमिक प्रक्रिया होने से किसी भी शैक्षिक लक्ष्य तक पहुचने के लिए समुचित दिशा मिल जाती हैं नियोजन, संगठन, नियंत्रण तथा निर्दंेशन आदि सभी सार्वभौमिक प्रकृति के कार्य है।

9. कला एवं विज्ञान- शैक्षिक प्रबन्ध को कला एवं विज्ञान दोनों ही माना गया है। शैक्षिक प्रबन्ध को कला मानवीय सम्बन्धों पर आधारित होने के कारण आधारित होने के कारण तथा इसमें वैज्ञानिक की तरह निष्पक्ष रहकर अध्ययन किया जाता है। अतः यह विज्ञान एवं कला दोनोे की श्रेणी मे आता है।

10. व्यवसाय के रूप में -वर्तमान मेे वैज्ञानिको द्वारा औधोगिक क्षेत्रों मंे नमी जान देने से प्रबन्ध का दबदबा प्रत्येक क्षेत्र मेे बढ गया है। इस प्रकार आज के समय में शैक्षिक क्षेत्र बहुत विस्तृत एवं जटिल होता जा रहा हैं इसलिए शैक्षिक प्रबन्ध भी एक व्यवसाय के रूप में प्रतिष्ठित होता जा रहा है।

11. समन्वित-दृष्टिकोण- शिक्षण संस्थानों की प्रगति मानवीय एवं समन्वित दृष्टिकोण पर निर्भर करती हैं, इसके द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति भली-भाॅति सम्भव हैं। शेैक्षिक प्रबन्ध से छात्र-छात्राएं, शिक्षको आदि से सम्बधिंत व्यवस्थाएं होती है। प्रबन्ध के अन्य क्षेत्रों की तुुलना में इस शैक्षिक प्रबन्ध के ज्यादा समन्वित माना गया है। 

12. अमूर्त- शैक्षिक प्रबन्ध में हमारें कार्यो की सफलता का ज्ञान बहुुत समय बाद लगता है। शैक्षिक प्रबन्ध में बालकों को इतनी सफलता मिली, इसका ज्ञान काफी समय बाद चला पाता हैं, अतः शैक्षिक प्रबन्ध अमूर्त माना जाता है। 

13. वैज्ञानिक दृष्टिकोण- वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तात्पर्य यही है कि हम सभी निर्णय पूर्व धारणाओं  से दूर रहकर करें। पूर्व धारणाओं या परम्परागत अवधारणाओं  के  आधार पर किए गए निर्णय सही नही होते हैं इसलिए विज्ञान में कार्य- कारण सम्बन्धों  पर आधारिक ज्ञान को स्थान दिया जाता है जिसमें किसी भी तरह का सन्देह नही किया जाता हैं। इस प्रकार शैक्षिक प्रबन्ध के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यक हैं।

14. प्रबन्ध एक जन्मजात प्रतिभा- व्यक्ति के वंशानुगत प्रभाव उनकी कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं यही प्रबन्ध व्यक्ति को नेतृत्व प्रदान करता हैं जिसका प्रभाव आनें वाली भावी पीढियों पर भी पड़ता है। 














सम्मेलन / कॉन्फ़्रेंस (Conference)

  सम्मेलन / कॉन्फ़्रेंस ( Conference) 1. परिभाषा ( Definition):      कॉन्फ़्रेंस एक औपचारिक और संगठित सभा होती है , जिसमें किसी विशेष वि...