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गुरुवार, 10 नवंबर 2022

SYLLABUS, Paper-IV Basics in Education and Communication

 

Paper-IV Basics in Education and Communication

 शिक्षा और सम्प्रेषण के मूलआधार

Unit-1  Education, Nature & Purpose-

शिक्षा, प्रकृति उद्देश्य

1. Education: Meaning, Nature and purpose of Education according to

2. Vivekanand, Tagore, Gandhi, Aurobindo, Rousseau & John Dewey.

3. Important National documents: Kothari Commission, National Education Policy 1986, Revised National Policy 1992 and NCF 2005.

4. Education as a Social Process.

1. शिक्षाः अर्थ, अर्थ, प्रकृति और शिक्षा के उद्देश्य के अनुसार

2. विवेकानंद, टैगोर, गांधी, अरबिंदो, रूसो और जॉन डेवी।

3. महत्वपूर्ण राष्ट्रीय दस्तावेजः कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986, संशोधित राष्ट्रीय नीति 1992 और एनसीएफ 2005।

4. एक सामाजिक प्रक्रिया के रूप में शिक्षा।

Unit- 2 Evolution and Management of Education

शिक्षा का विकास और प्रबंधन

1. Ancient Indian Education System: Vedic Era, Buddhist Era, Muslim Era & British Era - An Overview with specific reference to Teacher, Student, Methods and Contents.

2. Educational Management: Meaning, Concept, Principles.

3. Managerial Role of the Head of Institution: - Meaning, Importance and qualities, Managerial activities - Planning, Decision-making, Co-ordination, Supervision and Financing in the schools.

1. प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणालीः वैदिक युग, बौद्ध युग, मुस्लिम युग और ब्रिटिश युग - शिक्षक, छात्र, तरीके और सामग्री के विशिष्ट संदर्भ के साथ एक अवलोकन।

2. शैक्षणिक प्रबंधनः अर्थ, अवधारणा, सिद्धांत।

3. संस्थान के प्रमुख की प्रबंधकीय भूमिकाः - अर्थ, महत्व और गुण, प्रबंधकीय गतिविधियां - स्कूलों में योजना, निर्णय लेने, समन्वय, पर्यवेक्षण और वित्त पोषण।

Unit-3. Educational Guidance & Counselling.

शैक्षिक निर्देशन और परामर्श

1. Meaning, Concept, Need and Importance of Guidance & counselling in Educational Institutions.

2. Group and individual techniques of Guidance.

3. Need of Guidance & counselling for children with special needs.

4. Minimum essential Guidance programme for an Indian Secondary Schools.

1. शैक्षिक संस्थानों में निर्देशन और परामर्श का अर्थ, अवधारणा, आवश्यकता और महत्व।

2. समूह और व्यक्तिगत निर्देशन की तकनीकें।

3. विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए निर्देशन और परामर्श की आवश्यकता।

4. भारतीय माध्यमिक विद्यालयों के लिए न्यूनतम आवश्यक निर्देशन कार्यक्रम।

 Unit-4  Values Education and Peace Education

मूल्य शिक्षा और शांति शिक्षा

1. Values: Meaning, Types: Aesthetic, Spiritual, Universal, Moral and ethical etc. Role of Education in Transformation of Values in Society.

2. Value Education: Recommendations of Committees, Commissions and Policy Directives.

3. Major issues related to value Education, Methods of Value Orientation and Evaluation of value learning.

4. Peace Education - Meaning, Concept and need.

(a) Issues of National and International conflicts, social injustice, Communal conflict.

(b)Individual alienation: A Critical understanding.

(c) Role of School, Social organisations (UNESCO) and Individuals in promoting peace.

1. मूल्यः अर्थ, प्रकारः सौंदर्य, आध्यात्मिक, सार्वभौमिक, नैतिक और नैतिक आदि। समाज में मूल्यों के परिवर्तन में शिक्षा की भूमिका।

2. मूल्य शिक्षाः समितियों, आयोगों और नीति निर्देशों की सिफारिशें।

3. मूल्य शिक्षा से संबंधित प्रमुख मुद्दे, मूल्य अभिविन्यास के तरीके और मूल्य सीखने का मूल्यांकन।

4. शांति शिक्षा - मतलब, अवधारणा और आवश्यकता।

(ए) राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष, सामाजिक अन्याय, सांप्रदायिक संघर्ष के मुद्दे।

(बी) व्यक्तिगत अलगावः एक गंभीर समझ।

(सी) स्कूल, सामाजिक संगठनों (यूनेस्को) और शांति को बढ़ावा देने में व्यक्तियों की भूमिका।

 Unit-5  Communication Skills for the Teachers.

शिक्षकों के लिए सम्प्रेषण कौशल

1. Communication: Meaning, Concept, Elements and Process, 7 C's of Communication, Audio-Visual-Communication. Importance of Non verbal Communication in Teaching.

2. Listening & Speaking Skills, Barriers to Listening & speaking, Effective Presentation.

3. Written Communication for Teachers: Circulars, Notices, Orders, Report, and Minutes.

 1. सम्प्रेषण: अर्थ, अवधारणा, तत्व और प्रक्रिया, 7 सी सम्प्रेषण, ऑडियो-विजुअल- सम्प्रेषण। शिक्षण में गैर मौखिक सम्प्रेषण का महत्व।

2. सुनना और बोलना कौशल, सुनने और बोलने के लिए बाधाएं, प्रभावी प्रस्तुतिकरण।

3. शिक्षकों के लिए लिखित सम्प्रेषण: परिपत्र, नोटिस, आदेश, रिपोर्ट, और मिनट।

 Practicum/Field Work (Any one from the following)

प्रैक्टिकम/फील्ड वर्क (निम्नलिखित में से कोई भी एक)

 1. Interview a less educated or uneducated person about a social issue & conclude the findings in present context.

2. "Are Modern Educational ways Effective in comparison to traditional ways of teaching" Organise a debate for or against and report the outcomes.

3. How students choose their career. Discuss with the Headmaster/Principal, Parents/Students & prepare a report on it.

4. Write a small reflective note on how you found yourself under a value conflict situation in recent past

            Or

Analyse the contribution of any National or International personality in establishing peace.

5. Speak some fifty words & tell students to recall them back and note down who counts maximum.

            Or

Draft two notices for the conduction of some activity in school.

1. एक सामाजिक मुद्दे के बारे में एक कम शिक्षित या अशिक्षित व्यक्ति से मुलाकात करें और वर्तमान संदर्भ में निष्कर्ष निकालें।

2. ‘‘आधुनिक शैक्षणिक तरीके शिक्षण के पारंपरिक तरीकों की तुलना में प्रभावी हैं‘‘ परिणामों के लिए या उसके खिलाफ बहस आयोजित करें और रिपोर्ट करें।

3. छात्र अपने कैरियर का चयन कैसे करते हैं। हेडमास्टर /प्रिंसिपल, माता-पिता व छात्र से चर्चा करें और उस पर एक रिपोर्ट तैयार करें।

4. हाल ही में एक मूल्य संघर्ष स्थिति के तहत आप खुद को कैसे प्राप्त करते हैं, इस पर एक छोटा प्रतिबिंबित नोट लिखें

या

शांति स्थापित करने में किसी भी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व के योगदान का विश्लेषण करें।

5. कुछ पचास शब्दों को बोलें और छात्रों को उन्हें वापस याद करने के लिए कहें और ध्यान दें कि अधिकतम गणना कौन करता है।

या

स्कूल में कुछ गतिविधि के संचालन के लिए दो नोटिस ड्राफ्ट करें।

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                Dr. D R BHATNAGAR   

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

श्रव्य-दृश्य सम्प्रेषण (Audio-visual Communication)

श्रव्य-दृश्य सम्प्रेषण 
Audio-visual Communication

    श्रव्य-दृश्य सम्प्रेषण Audio visual  सम्प्रेषण मे श्रव्य-दृश्य साधनों से सम्प्रेषण किया जाता है। कक्षा-कक्ष में Audio visual साधनों द्वारा किया गया सम्प्रेषण अधिक प्रभावी होता है। 

A Picture is worth a thousand words, (English idiom) 

जटिल सामग्री को अगर हम दृश्य-श्रव्य साधनों जैसे slide presentation, Videos, electronic white board पर picture, grapes, charts दिखाकर short films बना कर समझाते है। तो इस प्रकार से सम्प्रेषित की गई सुचनाएं, तथ्य, ज्ञान बच्चों के मस्तिष्क में स्थाई होता है तो इस प्रकार से कक्षा-कक्ष में शाब्दिक सम्प्रेषण के बजाए Audio visual साधनों से सम्प्रेषण में सहायता ली जाए तो अधिगम जल्दी, सुगमता से व स्थायी होता है। बच्चें जल्दी भूलते नही है। कक्षा-कक्ष में सम्प्रेषण मुख्यतः लिखित या मौखिक होता है। लेकिन जहाँ पर लिखित या मौखिक सम्प्रेषण काफी न ये वहाँ दृश्य-श्रव्य सम्प्रेषण द्वारा शिक्षण कार्य किया जा सकता है। 

चार्ट- विद्यार्थियो को शिक्षा चार्ट के माध्यम से भी दी जाती है इसका प्रयोग तथ्यात्मक एंव सैदन्तिक संकल्पनाओं को प्रभावी ढ़ग से प्रदर्शन करने में किया जाता है। चार्ट अधिकतर तालिका, चार्ट, समय, तालिका, चार्ट, चित्र चार्ट, आलेख चार्ट, वृक्ष चार्ट, संगठन चार्ट आदि।

ओवर हैड़ प्रोजेक्टर- इस उपकरण के द्वारा किसी भी शिक्षण सामग्री को बड़े पर्दे पर लिया जा सकता है। जिसके माध्यम से सहायक सामग्री व शिक्षण बिन्दु  को सम्मिलित रूप से प्रभावित तरिके से प्रस्तुत किया जाता है।

कम्प्यूटर- यह आधुनिकता मशीन है। जिसका प्रयोग अनुदेशन हेतु भी लिया जाता है शिक्षण के क्षेत्र में कम्प्यूटर अनुदेशन शोध एंव परिक्षा के कार्य में उपयोगी सिद्ध होतो है सही व गलत अनुक्रियाओं को ज्ञान कम्प्यूटर द्वारा किया जाता है इससे पुनर्बलन मिलता है गलत अनुक्रिया होने पर भी विद्यार्थी सीखते है।

रेडियों और ट्रांजिस्टर- ये दोनों ही शिक्षण के श्रव्य साधन है आजकल रेडियों प्रसारण सुनना प्रत्येक व्यक्ति की रूचि बन गया है। शिक्षण हेतु भी रेडियों प्रयोग बढ़ता जा रहा है। कई बार रेडियों अथवा टेलीविजन के प्रसारण बड़े व्यक्तियों के भाषण अथवा इस प्रकार के कुछ प्रसारित द्वारा कक्ष़्ाा शिक्षण के लिए उपयोगी होता है। इससे बालक के सामान्य ज्ञान में वृद्धि होती है। यह एक शिक्षा प्रसारित करने की अनौपचारिक शिक्षण प्रक्रिया है।

दूरर्दशन- दूरदर्शन संचार माध्यम साधन की शिक्षा की अनौपचारिक प्रक्रिया है। इयये साक्षरता सम्बन्धी विषयों का कार्यक्रम आयोजन किया जाता है। जिससे ग्रहणी असाक्षर, वृद्ध, बालक, युवक मे सभी साक्षर होते है। नेटवर्क कार्यक्रम के अन्तर्गत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा विभिन्न सूचनाओं का सम्प्रसारण किया जाता है। जो विद्यार्थीयो के लिए उपयोगी है इसके माध्यम से विद्यार्थी चित्र को देखने के साथ-साथ सुनकर भी ज्ञान प्राप्त करते है। जिससे विद्यार्थी को जल्दी समझ में आ गया है। दूरर्दशन क माध्यम से शिक्षा को बढ़ावा मिल जाता है। शिक्षण कार्य क साथ-साथ अध्यापक द्वारा तैयार किये गये कौशलों को भी सीखता है जिससे बालक प्रभावित होता है। दूरदर्शन का प्रयोग पहले दिल्ली में 1956 में किया गया अब इसका उपयोग सारे विश्व में हो जाता है।

 

विडियो कैसेट- शिक्षक द्व़ारा किए गए शिक्षण की वीडियों कैसेट करके एक साथ हजारों बालको को शिक्षण द्वारा प्रदान किया जा रहा है। बालको का ध्यान केन्द्रित होता है। विभिन्न दृश्य-श्रव्य सामग्रीयों का प्रयोग करके कक्षा शिक्षण में सुधार लाया जा सकता है। विद्यार्थी को प्रभावित करने तथा अधिक अधिगम हेतु वीडीयों कैसेट महत्वपूर्ण है जिससे उसे अपनी कमजोरी का पता चलता है। और वह सुधारने का प्रयास करता है। जिससे कक्षा में प्रभावी शिक्षण कराने में सफलता मिलती है।

 




 

सुनने तथा बोलने का कौशल(Listening & Speaking Skills)

सुनने तथा बोलने का कौशल
Listening & Speaking Skills



    सम्प्रेषण में श्रवण एवं वाचन की अति- महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। श्रवण प्रभावी सम्प्रेषण की कुंजी (Key) है श्रोता (Student) सम्प्रेषित सुचनाओं का किस तरह से अर्थ लगाते है निहितार्थ समझते है यह ही सम्प्रेषण को सफलता को बताता है। सम्प्रेषण एक द्विध्रुवीय प्रक्रिया होती है। जिसमें वक्ता का वाचन कौशल में निपुण होना आवश्यक है वह किस तरह से सुचनाओं का आदान-प्रदान करता है कि कक्षा कक्ष में शिक्षण अधिक से अधिक प्रभावी हो सके।

सम्प्रेषण को सफल बनाने में शिक्षक का श्रवण एवं वाचन कौशल में अच्छा होना आवश्यक होता है।

श्रवण में (1) सुनना, (2) समझना तथा (3) विचार या तथ्य के निहितार्थ को समझना जो कि प्रेषक सम्प्रेषित करना चाहता है।

सुनने तथा बोलने की बाधाएँ
Barriers to Listening & speaking

ऐसे कारण जो सम्प्रेषण को सफल बनाने में रूकावटें डालते है जिससे सम्प्रेषण प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो पाती है। संप्रेषित तथ्यों सुचनाओं को शिक्षक संप्रेषित करता है परन्तु किन्ही कारणवश वह विद्यार्थियों द्वारा ग्रहण नही कर पाते है ये सम्प्रेेषण में आनें वाली बाधाएँ कई हो सकती है।

(1) शारीरिक अक्षमताएँ- वाचन दोष, दृष्टि दोष, श्रवण दोष।

(2) भाषायी बाधाएँ- भाषायी विभिन्नता या भाषा का बोधगम्य न होना संप्रेषण को प्रभावित करता है।

(3) मनोवैज्ञानिक बाधाएँ- बालक का पिछड़ा होना, या मंदबुद्धि होना।

(4) पर्यावरणीय बाधाएँ- कक्षा- कक्ष का भौतिक वातावरण सुविधायुक्त न होना।

(5) अभिवृत्तियात्मक बाधाएँ- विद्याार्थियों की रूचि ना होना संप्रेषित विषय वस्तु में।

(6) संवेगात्मक बाधाएँ- क्रोध, ग्लानि व अन्य संवेगों की अधिकता होने पर विद्यार्थि कक्षा-कक्ष में पूर्ण ध्यान केन्द्रित नही कर पाता और संप्रेषण में बाधा आती है।

7) सम्प्रेषण माध्यम की गुणवत्ता में कमी- सम्प्रेषण माध्यम वह मार्ग है जिसमें संदेश भौतिक रूप से प्रेषित होता है जैसे रेड़ियों, टेलिविजन, कम्प्यूटर अगर इन माध्यमों की गुणवत्ता में कमी होती है। यह भी सम्प्रेषण में बाधा उत्पन्न करता है।

(8) सम्प्रेषण से संबंधित स्तर की बाधाएँ- सम्प्रेषित कि जाने वाली विषय- वस्तु संग्राहक के मानसिक स्तर के अनुरूप होनी चाहिए।

(9) संदेश की विकृतिया- संपे्रषित संदेश मे ही अगर विकृतिया हो जैसे अस्पष्ट होना, अपूर्ण संदेश होने पर यें संदेश की विकृतिया कहलाती है और ये सम्प्रेषण में बाधा पहुँचाती है।


मंगलवार, 25 मई 2021

संस्था प्रमुख की प्रबंधकीय भूमिका Managerial Role of the Head of Institution


संस्था प्रमुख की प्रबंधकीय भूमिका
Managerial Role of the Head of Institution



 
    संस्था प्रमुख प्रबंधकों को तर्कसंगत निर्णय लेने के लिए आवश्यक जानकारी प्रदान करते हैं। अपने स्वयं के अनुभवजन्य अध्ययन और निर्णायक विश्लेषण से। प्रबंधक कई अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं और ये भूमिकाएँ तीन व्यापक श्रेणियों में आती हैं - 
1. पारस्परिक, 
2. सूचनात्मक और 
3. निर्णायक।
प्रबंधक की नौकरी में निहित तीन पारस्परिक भूमिकाएं हैं
1. सबसे पहले, प्रबंधक को अक्सर एक व्यक्ति के रूप में कार्य करने के लिए कहा जाता है। उदाहरण के लिए, वह आगंतुकों को रात्रिभोज पर ले जाने वाला है। 
2. उन्हें रिबन काटने वाले समारोहों में भाग लेने के लिए भी कहा जाता है। 
3. उन्हें एक नेता के रूप में कार्य करने के लिए भी कहा जाता है। 
    इस संदर्भ में, उनका कर्तव्य कर्मचारियों को नियुक्त करना, प्रशिक्षित करना और प्रेरित करना है।
    इस भूमिका में, औपचारिक रूप से या अनौपचारिक रूप से, अधीनस्थों को यह दिखाने के लिए कि चीजों को कैसे करना है? (या विशिष्ट कार्य करना), दबाव में कैसे काम करना है?(अर्थात, तनाव और तनाव के तहत) और कितने घंटे के लिए एक कंपनी के व्यक्ति को समर्पित करना चाहिए? किसी विशेष कार्य को पूरा करना (या किसी विशेष कार्य को करना)।
    प्रबंधकों की जनसंपर्क भूमिका होती है। जो संगठन के बाहर के लोगों के साथ चलती है। उदाहरण के लिए, प्रबंधक को समाज के प्रतिनिधियों के साथ एक अच्छा काम करने वाला संबंध स्थापित करना और बनाए रखना पड़ता है।
1. चित्रात्मक भूमिका
    प्रबंधक प्रकृति में एक औपचारिक और प्रतीकात्मक के कर्तव्यों का पालन करते हैं जैसे- कि आधिकारिक आगंतुकों का स्वागत करना, कानूनी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करना आदि संगठन या रणनीतिक व्यापार इकाई या विभाग के प्रमुख के रूप में।
पारस्परिक भूमिकाओं के कर्तव्यों में दिनचर्या, थोड़ा गंभीर संचार और कम महत्वपूर्ण निर्णय शामिल हैं। हालांकि, वे किसी संगठन या विभाग के सुचारू कामकाज के लिए महत्वपूर्ण हैं।
2. नेतृत्व की भूमिका
    सभी प्रबंधकों की एक नेतृत्वकारी भूमिका होती है। प्रबंधक, संगठन, विभाग के प्रभारी के रूप में, दूसरों के काम का समन्वय करता है और अपने अधीनस्थों का नेतृत्व करता है।
इस भूमिका में कर्मचारियों को काम पर रखना, प्रशिक्षण देना, प्रेरित करना और अनुशासित करना शामिल है। औपचारिक प्राधिकरण और कार्यात्मक प्राधिकरण व्यायाम करने और चीजों को प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक संभावित शक्ति प्रदान करता है।
3. संपर्क भूमिका
    संगठन या इकाई के नेता के रूप में, प्रबंधक को प्रेरणा, संचार, उत्साहजनक टीम भावना और इसी तरह के कार्य करने होते हैं। इसके अलावा, उसे अपने सभी अधीनस्थों की गतिविधियों का समन्वय करना होगा, जिसमें संपर्क की गतिविधि शामिल है।
इस भूमिका के लिए प्रबंधक को संगठन के बाहर अन्य प्रबंधकों के साथ बातचीत करने के लिए भी एहसान और जानकारी को सुरक्षित करने की आवश्यकता होती है। इस भूमिका में, प्रबंधक औपचारिकता के सभी मामलों में अपने संगठन का प्रतिनिधित्व करता है।
एक प्रबंधक की सूचनात्मक भूमिकाएँः
    प्रबंधक की भूमिका में डपदज्रइमतह ने तीन सूचनात्मक भूमिकाओं की भी पहचान की है। ये स्वाभाविक रूप से नहीं बल्कि पारस्परिक भूमिकाओं से स्वतः प्रवाहित होते हैं। इसका मतलब है कि उपरोक्त तीन पारस्परिक भूमिकाओं को पूरा करते समय प्रबंधक को स्वचालित रूप से एक रणनीतिक बिंदु पर रखा जाता है, जहां से वह जानकारी इकट्ठा कर सकता है और प्रचार कर सकता है जो निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
1. मॉनिटर की भूमिका
    प्रबंधक की व्यावसायिक भूमिका एक मॉनिटर के रूप में कार्य करना है। उसे लगातार और सक्रिय रूप से उन सूचनाओं की तलाश करनी होगी जो मूल्य की हो सकती हैं। यह अधीनस्थों से पूछताछ करके, अवांछित जानकारी के प्रति ग्रहणशील होने के साथ-साथ व्यापार के आंतरिक और बाहरी दोनों वातावरणों के बारे में यथासंभव सूचित किया जा सकता है।
    प्रबंधक की दूसरी सूचनात्मक भूमिका सूचना के प्रसारकर्ता की है। चूंकि उचित निर्णय लेना सूचना के दो-तरफा प्रवाह (मिमकइंबा और मिमकवितूंतक दोनों) पर आधारित है, इसलिए कार्यस्थल में दूसरों तक प्रासंगिक जानकारी पहुँचाना प्रबंधक का एक महत्वपूर्ण कार्य है।
2. प्रसार भूमिका
    सूचना के इस युग में, किसी भी प्रबंधकीय संचार क्रांति ने अतीत की तुलना में बहुत अधिक महत्वपूर्ण मान लिया है। पिछले कुछ वर्षों में संगठनात्मक लोगों रूप में उभरने के कारण सूचना इनपुट बहुत महत्वपूर्ण है। और मॉनिटर और प्रसारकर्ता की अपनी संयुक्त भूमिकाओं में, प्रबंधक संगठन की संचार श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभरता है।
3. प्रवक्ता की भूमिका
    सूचनात्मक भूमिका बाहरी संचार से संबंधित है। इस भूमिका में, प्रबंधक एक प्रवक्ता के रूप में कार्य करता है। उसे यूनिट के बाहर या संगठन के बाहर के लोगों से निपटना पड़ता है। 
    वैकल्पिक रूप से, प्रबंधक एक चैंबर ऑफ कॉमर्स, या ट्रेड एसोसिएशन, या यहां तक ​​कि एक उपभोक्ता समूह जैसे संगठन का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
फिगरहेड और प्रवक्ता के रूप में प्रबंधक की भूमिकाएं समान हैं। लेकिन दोनों के बीच एक बुनियादी अंतर है। एक व्यक्ति के रूप में कार्य करते हुए, प्रबंधक खुद को संगठन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन जब प्रबंधक एक प्रवक्ता के रूप में कार्य करता है, तो वह सूचना का वहन करता है और औपचारिक रूप से दूसरों से संवाद करता है।
प्रबंधक की निर्णायक भूमिकाः
    प्रबंधक की निर्णायक भूमिकाएं प्रबंधक की सूचनात्मक भूमिकाओं का पालन करती हैं। इसका अर्थ यह है कि सूचनात्मक भूमिकाओं के प्रदर्शन के परिणामस्वरूप प्रबंधक जो जानकारी एकत्र करने में सक्षम होता है, वह महत्वपूर्ण निर्णयों पर महत्वपूर्ण असर डालता है जो वह करता है।
1. उद्यमी भूमिका
    सबसे पहले, प्रबंधक उद्यमी की भूमिका को निभाता है, जो स्वेच्छा से परिवर्तन की शुरुआत करता है। उदाहरण के लिए, प्रबंधक शुरू में किसी समस्या को पहचान सकता है या शोषित होने के अवसर की पहचान कर सकता है। दूसरे चरण में, वह स्थिति से निपटने के लिए बदलाव शुरू कर सकता है।
2. गड़बड़ी हैंडलर की भूमिका
    अपनी दूसरी निर्णय भूमिका में, प्रबंधक एक परेशान हैंडलर के रूप में कार्य करता है। उसे दूसरों द्वारा बनाई गई समस्याओं जैसे कि हड़ताल, इनपुट की कमी, झूठे विज्ञापन या कॉपीराइट के उल्लंघन से निपटना पड़ता है।
3. संसाधन आवंटन भूमिका
    प्रबंधक को संसाधन आवंटनकर्ता के रूप में भी कार्य करना होता है। धन और समय दो मुख्य संसाधन हैं। इसलिए, यूनिट के सदस्यों और परियोजनाओं के बीच यूनिट के ऑपरेटिंग बजट में फंड को तर्कसंगत रूप से आवंटित करना प्रबंधक का कार्य है।
    प्रबंधक को विभिन्न कार्यों के प्रदर्शन में और संगठनात्मक लोगों के मार्गदर्शन में अपना समय आवंटित करना होगा। संक्षेप में, संसाधन आवंटनकर्ता की अपनी भूमिका में, प्रबंधक को यह तय करना होगा कि यूनिट में कौन यूनिट के संसाधनों के विभिन्न भागों को दिया जाएगा और प्रबंधक के समय तक कौन पहुंचेगा?
4. वार्ताकार की भूमिका
    एक वार्ताकार के रूप में उनकी निर्णय लेने वाली भूमिका में, उन्हें संस्था के प्रतिनिधि के रूप में बातचीत में प्रवेश करना होगा। उदाहरण के लिए, प्रबंधक संघ के साथ तीन साल के वेतन अनुबंध, एक सलाहकार के साथ एक समझौते या एक आपूर्तिकर्ता के साथ दीर्घकालिक संबंध पर बातचीत कर सकते हैं।
    बातचीत भी संगठन के लिए आंतरिक हो सकती है। उदाहरण के लिए, दो अधीनस्थों के बीच मध्यस्थता या विवाद करना या किसी अन्य विभाग से समर्थन के एक निश्चित स्तर पर बातचीत करना प्रबंधक का कर्तव्य है।
    संगठन में प्रबंधक की भूमिकाय हालाँकि, प्रबंधक की अलग-अलग भूमिकाओं की चर्चा सुविधा के लिए अलग-अलग की जाती है, वे वास्तव में अविभाज्य हैं। प्रबंधक को एक के साथ एक को एकीकृत करके इन भूमिकाओं को निभाना पड़ता है।
    इस प्रकार, प्रबंधक की प्रमुख भूमिका प्रबंधकीय भूमिका निभाते हुए या अपने कार्यों को करते हुए सभी भूमिकाओं को एकीकृत करती है। वास्तव में, प्रबंधक अन्य भूमिकाओं को अलग करने में कोई भूमिका नहीं निभा सकता है। एक रणनीतिकार के रूप में, प्रबंधक को निर्णय लेने और अपने कार्यों को करने में सभी भूमिकाओं को एकीकृत करना होता है।

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स्कूल नियोजन में प्रधानाचार्य की भूमिका तथा प्रबन्धीय कार्य Duties and Responsibilities/Role of Head-Master

प्रधानाध्यापक के कर्तव्य एवं उत्तरदायित्त्व 
Duties and Responsibilities/Role of Head-Master



    प्रधानाध्यापक विद्यालय का केन्द्र बिंदू होता है। विद्यालय के समस्त कार्यक्रम उसी के द्वारा संचालित होते है- विद्यालय कार्यक्रम का नियोजन कार्य का विभाजन, प्रवृतियों का समायोजन आदि समस्त कार्यो पर उसी की छाप दृष्टिगोचर होती है। वह विद्यालय के प्रत्येक कार्यक्रम में दृष्टिगोचर प्रधानाध्यापक को निम्नकिंत कार्य करता है। अतः एक विद्यालय के लूथर गुलिक प्रधानाध्यापक के सात कार्य बताए है ये संक्षिप्त में अपने POSDCORB (पोस्डकोरब) के रूप में व्यक्त किया है 
1. योजना निर्माण (Planning)-प्रधानाध्यापक का सबसे पहला कार्य योजना बनाना है। सत्र प्रांरभ होने से पूर्व ही उसे विद्यालय की वार्षिक योजना, मासिक योजना, दैनिक योजना आदि का निर्माण करना पडता है ताकि सत्रारम्भ के प्रथम दिवस से ही विद्यालय नियमित रूप से कार्य प्रारम्भ कर सकें। योजना निर्माण प्रधानाध्यापक सफलता की प्रथम कड़ी है।
2. संगठन (organization)-प्रधानाध्यापक का दूसरा कार्य शालीय संगठन है जिसे मुख्यतः तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है - (1) मानवीय (2) आर्थिक (3) शैक्षणिक।
(1) मानवीय संगठन की दृष्टि से शिक्षक, कार्यालय कर्मचारी, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आदि की नियुक्तियाँ उच्चधिकारियों से कराना ताकि विद्यार्थियों की शिक्षा में व्यवधान उत्पन्न न हो।
(2) आर्थिक संगठन के अंतर्गत शालीय बजट प्राप्त करना, विद्यालय भवन में आवश्यकतानुसार नवीन कक्ष निर्माण एवं साज-सज्जा, शालीय उपवन यदि हो आदि के रखरखाव हेतु सरकार एवं जनसंम्पर्क के माध्यम से धन प्राप्त कर विद्यालय को आदर्श विद्यालय बनाने से है।
(3) शैक्षिक संगठन की दृष्टि से विषयाध्यापकों के लिए उनकी योग्यतानुसार समय - विभाग चक्र का निर्माण तथा शाला में छात्रों के प्रवेश कार्य आदि को समय पर पूर्ण कराने से है।
3. निरीक्षण (पर्यवेक्षण)(supervision)-सम्पूर्ण विद्यालय की शैक्षिक सहशैक्षिक एवं अन्य गतिविधयों का प्रधानाध्यापक निरीक्षण करता है। दूसरे शब्दों, वह स्वयं विद्यालय का निरीक्षक होता है और स्वयं ही बनाई योजना का निरीक्षण कर उसकी सफलता एवं असफलता का मूल्याकंन करता है।
4. निर्देशन(Direction)- प्रधानाध्यापक अपने सहयागी शिक्षकों, छात्रों, नय कार्यरत कर्मचारियों और अभिभावकों को समय समय पर आवश्यक निर्देश कार्य मौखिक एवं लिखित दोनों ही रूपों में होता है। निर्देश शाला को खुशहाली, अध्यापकों का मार्गदर्शन तथा छात्रों की शैक्षिक प्रगति पर आधारित होते है।
5. समन्वय(co-ordiation)-आर्थिक, भौतिक और मानवीय संसाधनो के अधिकतम उपयोग के समन्वय का कार्य भी प्रधानाध्यापक को ही करना पडता है। वह प्रतिष्ठित व्यक्तियों को उत्सव एवं पर्वो पर आमंत्रित करता है। शिक्षकों से भी सक्रिय सहयोग प्राप्ति हेतु सम्पर्क बनाए रखता है।
6. प्रतिवेदन (Reporting)-प्रधानाध्यापक को विद्यालय संबंधी प्रकरणों का प्रतिवेदन भी तैयार कर उच्चधिकारियों को प्रेषित करना पड़ता है। ये अतिमहत्वपूर्ण होते है और इन पर विद्यालय की भावी प्रगति आधारित होती है।
7. बजट बनाना (Budgeting)-वित्तीय एवं आर्थिक संसाधनों एवं उनके उपयोग हेतु बजट पडता है। बजट बनाना और उसे प्राप्त करना विद्यालय की अनिवार्य आवश्यकता है।
    लूथर गुलिक ने सात कार्याे का वर्णन किया है। फिर भी इन कार्यो के अलावा प्रधानाध्यापक को कुछ अन्य कार्य भी करने पडते है जो अद्योलिखित है-
1. अध्यापन कार्य- प्रधानाध्यापक एक योग्य एवं दक्ष अध्यापक होता है तत्पश्चात् प्रशासक। उसका स्वयं का शिक्षण कार्य अध्यापकों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए वह एक सफल शिक्षक होने के बाद ही शिक्षकों का नेतृत्त्व कर सकता है और मार्गदर्शन दे सकता है। उसका आने विषय पर पूर्णाधिकार होना चाहिए।
2. समय-विभाग चक्र बनाना- शिक्षण कार्य का प्रभावी रूप से चलाने हेतु समय-सारिणी अथवा समय विभाग चक्र बनाना नितान्त आवश्यक है। इसमें विद्यालय का समस्त शैक्षिक एवं सहशैशिक कार्यक्रम प्रतिबिम्बित होता है। विभिन्न प्रकार के समय-विभाग चक्र बनाए जाते है।
3. कक्षाव्यवस्था करना - प्रत्येक कक्षा में बैठने के लिए जहाँ तक संभव हो सके प्रत्येंक - प्रत्येक कक्ष की व्यवस्था की जावें। 
4. कक्षा कक्ष में फर्नीचर आदि की व्यवस्था - प्रत्येक कक्षा - कक्ष में छात्रों के नामांकन के अनुसार फर्नीचर की व्यवस्था, कक्षा में शिक्षक हेतु एक मेज एवं कुर्सी की भी व्यवस्था प्रधानाध्यापक ही करता है। 
5. सहशैक्षिक क्रियाओं की व्यवस्था - शैक्षिक व्यवस्था के साथ - साथ छात्रों चतुर्मुखी विकास हेतु सहशैक्षिक क्रियाओं की भी व्यवस्था की जानी चाहिए। 
6. विद्यालय भवन की साज सज्जा एवं सफाई - छात्रों के स्वास्थ्य को दृष्टिगत रखते हुए विद्यालय भवन की पूताई, फर्नीचर आदि पर वार्षिक कराना तथा विद्यालय को सुसज्जित कराना भी प्रधानाध्यापक का प्रमुख कार्य है। 
7. परीक्षा सचालन एवं परीक्षा परिणाम - विभागीय पंचागनुसार मासिक जाँच, अर्द्धवार्षिक परीक्षा एवं वार्षिक परीक्षा का संचालन करना भी प्रधानाध्यापक का मुख्य कार्य है। 
8. शिक्षक और छात्रों की समस्याओं का निराकरण करना - एक सफल प्रधानाध्यापक अपनी शाला के शिक्षकों और छात्रों की व्यक्तिगत तथा शालीय समस्याओं का भी निराकरण करता है। एक दक्ष व योग्य प्रधानाध्यापक उनकी समस्याओं को अपनी समस्या मानकर उनका निराकरण एवं समाधान करता है। 
9. सम्पर्क स्थापित करना - एक प्रधानाध्यापक को अपने उच्चाधिकारियों से भी निकटतम संबंध बनाए रखना पड़ता है, जिससे कि विद्यालय उन्नति में उनका सहयोग प्राप्त किया जा सके। 
10. पाठ्य - पुस्तकों का चयन - निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार प्राथमिक से माध्यमिक कक्षाओं के लिए पुस्तकें नियतो निश्चित होती है, परन्तु उच्च माध्यमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक के लिए कई वैकल्पिक पुस्तकें स्वीकृत रहती है। 
11. प्रशिक्षक कार्य - शिक्षण की नवीन विद्याओं, नवचारों का साथी शिक्षकों का ज्ञान कराना, साथी शिक्षकों के ज्ञानार्जन में सहायक है। 
12. छात्रों का प्रवेश एवं वर्गीकरण - प्रधानाध्यापक को विभिन्न कक्षाओं में छात्रों को प्रवेश देने का कार्य करना पड़ता है। 
13. अनुशासन व्यवस्था - विद्यालय में अनुशासन की व्यवस्था करना प्रधानाध्यक का प्रमुख कत्र्तव्य है। 
14. कार्यालय का कार्य - किसी विद्यालय का कार्यालय ही उसकी धुरी होता है। यहीं पर महत्वपूर्ण अभिलेख सुरक्षित रखे जाते है। 
15. लिखित कार्य की जाँच - प्रधानाध्यापक स्वयं अपने विषय में लिखित कार्य की जाँच उसी प्रकार करें जैसा कि वह अपने साथी शिक्षकों से चाहता है। 
16. व्यावसायिक समुन्नयन - विद्यालय में विषय - विशेषज्ञों द्वारा वार्ताओं का आयोजन, विचार - गोष्ठियों - सम्मेलनों का आयोजन, वाद-विवाद, पत्र-वाचन, अध्ययन-वृत्त आदि आयोजित कर शिक्षकों का व्यावसायिक समुन्नयन किया जा सकता है। 
प्रधानाध्यापक में गुण अंग्रेजी के शब्द HEADMASTER में इस प्रकार निहित है - 
H – Honest(ईमानदार)
E – Earnest(उत्सुक)
A – Accountable(जवाबदेह)
D – Dignastic (नैदानिक)
M – Marager (प्रबन्धक)
A – Affective (प्रभावात्मक)
S – Sincere (सत्यनिष्ठ)
T – Tactful (नीति-निपूण)
E – Effecint(योग्य)
R – Resaurceful (साधन - निपुण)
प्रधानाचार्य के कार्य (Functions of Principle) 
1. शैक्षिक क्रियाओं सम्बन्धी कार्य- शिक्षण क्रियाओं के रूप में प्रधानाचार्य द्वारा पाठ्यक्रम का चयन करना, शिक्षण विधियों व सहायक सामग्री की व्यवस्था करना, मूल्यांकन करना, निर्देशन देना आदि कार्य किए जाते हैं, ताकि विद्यालय का चहुँमुखी विकास किया जा सके।
2. शिक्षकों सम्बन्धी कार्य- विद्यालय के समस्त कार्यक्रमों का सफलता तथा असफलता उसके राक्षका पर निर्भर होती है। शिक्षक ही केवल वह एक साधन है जो स्कूल को गतिशील बनाए रखता है। इसक बिना विद्यालय शन्य बना रहता है। अतः प्रधानाचार्य द्वारा शिक्षकों को मार्ग-दर्शन व परामर्श देना, उन्नति के अवसर प्रदान करना. कार्यभार सन्तुलित करना, सभी सुविधाएँ देना तथा कार्य का मूल्यांकन करना आदि कार्य किए जा सकते है।
3. छात्र वर्ग सम्बन्धी कार्य - आज के युग में विद्यालय, प्रशासन का यह प्रमुख कार्य है कि प्रत्येक एसछात्र को ऐसे उत्तरदायी,स्वःअनुशासित, उत्साही तथा एक सशक्त कार्यकर्ता के रूप में तैयार करे जो अपने परिवार, समाज राजनीति प्रणा जीवन के हर क्षेत्र में प्रभावी रूप से कार्य कर सके। इस प्रकार प्रधानाचार्य छात्रा को उचित निर्देशन एवं परामर्श देना उनकी संख्या निश्चित करके कक्षा तथा विषय आदि में दर्ज  करना, प्रगति सम्बन्धी रिकार्ड तैयार करना, परीक्षा व उपयुक्त मूल्याकन का व्यवस्था, समचित अनुशासन की व्यवस्था करना छात्र वर्गीकरण के लिए नीतियाँ बनाना, पिछड़े छात्रों के लिए अलग सेशिक्षा की व्यवस्था करना एवं वित्तीय सहायता देना आदि कार्य किए जाते हैं।
4. विद्यालय प्रबन्धन सम्बन्धी कार्य - हेनरी स्विलिन महोदय के अनुसार ‘‘विद्यालय प्रबन्धन का मजतवपूर्ण कार्य शिक्षकों, छात्रों तथा अन्य कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग स्थापित करना है‘‘ अतः विद्यालय प्रबन्धन का मार्गदर्शन उत्तम शिक्षक छात्र सहयोग पर ही आधारित होता है।  इन्हे ही प्रशासन का उत्तम साधन माना गया है। इस प्रकार प्रधानाचार्य द्वारा विद्यालय प्रबन्धकों को उचित निर्देश प्रदान करना, प्रबन्ध सम्बन्धी नीतियों को निश्चित करना, शिक्षक संघ का गठन करना, विकास समितियों का गठन करना, उपलब्धि की जाने हेतु एक संयोजक की नियुक्ति करना आदि कार्यो में किया जाता है।
5. वित्त सम्बन्धी कार्य - मारेफेट(Morphet) के अनुसार, ‘‘शिक्षा के क्षेत्र में केवल लेखा-जोग रखना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस धन से अधिकतम शैक्षिक उपलब्धियाँ प्राप्त करनी है।‘‘ यह केवल उचित प्रशासन द्वारा ही सम्भव है। इस प्रकार प्रधानाचार्य द्वारा विद्यालय वित्तीय योजना का निर्माण करना आय-व्यय का बजट बनाना, लेखा-जोखा का विवरण रखना सभी कर्मचारियों के वेतन की व्यवस्था करना, आय-व्यय का मूल्यांकन करना, प्रबन्धन समिति के सभी मदों का विवरण रखना, वित्तीय विभाग व शिक्षा विभाग से सम्बन्ध रखना तथा वित्त के अनुसार कार्यों की व्यवस्था करना आदि विशेष कार्य किए जाते हैं।
6. विद्यालय कार्यालय सम्बन्धी कार्य- कार्यालय द्वारा विद्यालयों की समस्त गतिविधियों को विकसित किया जाता है। इसका सम्बन्ध सभी क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं से रहता है। अतः उत्तम कार्यालय ही उत्तम विद्यालय का निर्माण करता है। इसी के द्वारा विद्यालय की प्रगति को आँका जाता है। इस प्रकार प्रधानाचार्य द्वारा कार्यालय का निरन्तर आडिट (।नकपज) कराना, सभी वित्तीय रिकार्डों की जाँच करना, वार्षिक व अर्धवार्षिक सहायता प्रतिवेदनों का निरीक्षण कराना, वित्त सम्बन्धी उचित परामर्श प्रदान करना, आय-व्यय सम्बन्धी रूपरेखा तैयार करके देना आदि कार्य किए जाने चाहिए। वार्षिक बजट भी प्राचार्य ही तैयार करता है
प्रधानाचार्य के प्रबन्धकीय कार्य (Functions of Principal in Management) 
। . नियोजन कार्य (Planning as Functions)
    विद्यालय के खुलने से पूर्व -इस स्तर पर प्राचार्य को निम्नलिखित कार्यों का नियोजन करना होता है 
    ग्रीष्मकालीन अवकाश के पश्चात् विद्यालय खुलने की तिथि की घोषणा की जाती है। विद्यालय में प्रवेश की अन्तिम तिथि, एक आवेदन-पत्र प्राप्त किए जा सकेंगे। कुछ कक्षाओं के लिए प्रवेश परीक्षा का भी आयोजन किया जाएगा। परीक्षा की तिथियाँ तथा परीक्षा की व्यवस्था भी की जाएगी। विद्यालय के नोटिस बोर्ड पर सभी सूचनाओं को अंकित किया जाता है। यदि सम्भव हो सके तो समाचार-पत्र में भी विज्ञापन दे दिया जाता है।
    प्रवेश के नियमों तथा प्रक्रिया को तैयार किया जाता है। इसके लिए एक प्रवेश समिति का गठन किया जाता है, जिसका उत्तरदायित्व प्रवेश प्रक्रिया का सम्पादन करना तथा पूरा करना होता है। कक्षा में छात्रों की संख्या भी सुनिश्चित की जाती है। प्रवेश सम्बन्धी समस्याओं का प्रवेश समिति ही समाधान करती है।
प्रधानाचार्य के प्रबन्धकीय कार्य (Functions of Principal in Management) 
नियोजन कार्य (Planning as Functions)
  • प्राचार्य के विद्यालय के फर्नीचर तथा साज-सज्जा की भी व्यवस्था करनी होती है।संसाधन, उपकरण तथा पुस्तकों का भी पुस्तकालय में आयोजन करना होता है। टूटे हुये फर्नीचर को ठीक करना होता।  प्रधानाचार्य इन कार्यों का उत्तरदायित्व वरिष्ठ अध्यापकों को भी सौप देता है और अधिकार भी देता है।
  • विद्यालय में आवश्यक सामग्री उपस्थित रजिस्टर, डायरी, चाक, डस्टर, श्यामपट्ट आदि की व्यवस्था करता है। 
  • प्राचार्य विद्यालय शिक्षा सत्र का कलेण्डर भी तैयार करता है जिसमें पूरेसत्र क्रिया, अन्य मों तथा अवकाश की तिथियों का विवरण दिया जाता है।
  • आवश्यकतानुसार शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्तियाँ भी करता है। कार्यालय साबन्धी रजिस्टारों की व्यवस्था की जाती है।
  • प्रधानाचार्य विद्यालय भवन की पुताई तथा टूट-फूट को ठीक कराता है। फर्नीचर की पॉलिश भी कराता है।। जिससे नए सत्र में विद्यालय भवन नया-सा दिखाई दे। विद्यालय का भौतिक छात्रों के लिए आकर्षक लगना चाहिए। 
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