मंगलवार, 25 मई 2021

स्कूल नियोजन में प्रधानाचार्य की भूमिका तथा प्रबन्धीय कार्य Duties and Responsibilities/Role of Head-Master

प्रधानाध्यापक के कर्तव्य एवं उत्तरदायित्त्व 
Duties and Responsibilities/Role of Head-Master



    प्रधानाध्यापक विद्यालय का केन्द्र बिंदू होता है। विद्यालय के समस्त कार्यक्रम उसी के द्वारा संचालित होते है- विद्यालय कार्यक्रम का नियोजन कार्य का विभाजन, प्रवृतियों का समायोजन आदि समस्त कार्यो पर उसी की छाप दृष्टिगोचर होती है। वह विद्यालय के प्रत्येक कार्यक्रम में दृष्टिगोचर प्रधानाध्यापक को निम्नकिंत कार्य करता है। अतः एक विद्यालय के लूथर गुलिक प्रधानाध्यापक के सात कार्य बताए है ये संक्षिप्त में अपने POSDCORB (पोस्डकोरब) के रूप में व्यक्त किया है 
1. योजना निर्माण (Planning)-प्रधानाध्यापक का सबसे पहला कार्य योजना बनाना है। सत्र प्रांरभ होने से पूर्व ही उसे विद्यालय की वार्षिक योजना, मासिक योजना, दैनिक योजना आदि का निर्माण करना पडता है ताकि सत्रारम्भ के प्रथम दिवस से ही विद्यालय नियमित रूप से कार्य प्रारम्भ कर सकें। योजना निर्माण प्रधानाध्यापक सफलता की प्रथम कड़ी है।
2. संगठन (organization)-प्रधानाध्यापक का दूसरा कार्य शालीय संगठन है जिसे मुख्यतः तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है - (1) मानवीय (2) आर्थिक (3) शैक्षणिक।
(1) मानवीय संगठन की दृष्टि से शिक्षक, कार्यालय कर्मचारी, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आदि की नियुक्तियाँ उच्चधिकारियों से कराना ताकि विद्यार्थियों की शिक्षा में व्यवधान उत्पन्न न हो।
(2) आर्थिक संगठन के अंतर्गत शालीय बजट प्राप्त करना, विद्यालय भवन में आवश्यकतानुसार नवीन कक्ष निर्माण एवं साज-सज्जा, शालीय उपवन यदि हो आदि के रखरखाव हेतु सरकार एवं जनसंम्पर्क के माध्यम से धन प्राप्त कर विद्यालय को आदर्श विद्यालय बनाने से है।
(3) शैक्षिक संगठन की दृष्टि से विषयाध्यापकों के लिए उनकी योग्यतानुसार समय - विभाग चक्र का निर्माण तथा शाला में छात्रों के प्रवेश कार्य आदि को समय पर पूर्ण कराने से है।
3. निरीक्षण (पर्यवेक्षण)(supervision)-सम्पूर्ण विद्यालय की शैक्षिक सहशैक्षिक एवं अन्य गतिविधयों का प्रधानाध्यापक निरीक्षण करता है। दूसरे शब्दों, वह स्वयं विद्यालय का निरीक्षक होता है और स्वयं ही बनाई योजना का निरीक्षण कर उसकी सफलता एवं असफलता का मूल्याकंन करता है।
4. निर्देशन(Direction)- प्रधानाध्यापक अपने सहयागी शिक्षकों, छात्रों, नय कार्यरत कर्मचारियों और अभिभावकों को समय समय पर आवश्यक निर्देश कार्य मौखिक एवं लिखित दोनों ही रूपों में होता है। निर्देश शाला को खुशहाली, अध्यापकों का मार्गदर्शन तथा छात्रों की शैक्षिक प्रगति पर आधारित होते है।
5. समन्वय(co-ordiation)-आर्थिक, भौतिक और मानवीय संसाधनो के अधिकतम उपयोग के समन्वय का कार्य भी प्रधानाध्यापक को ही करना पडता है। वह प्रतिष्ठित व्यक्तियों को उत्सव एवं पर्वो पर आमंत्रित करता है। शिक्षकों से भी सक्रिय सहयोग प्राप्ति हेतु सम्पर्क बनाए रखता है।
6. प्रतिवेदन (Reporting)-प्रधानाध्यापक को विद्यालय संबंधी प्रकरणों का प्रतिवेदन भी तैयार कर उच्चधिकारियों को प्रेषित करना पड़ता है। ये अतिमहत्वपूर्ण होते है और इन पर विद्यालय की भावी प्रगति आधारित होती है।
7. बजट बनाना (Budgeting)-वित्तीय एवं आर्थिक संसाधनों एवं उनके उपयोग हेतु बजट पडता है। बजट बनाना और उसे प्राप्त करना विद्यालय की अनिवार्य आवश्यकता है।
    लूथर गुलिक ने सात कार्याे का वर्णन किया है। फिर भी इन कार्यो के अलावा प्रधानाध्यापक को कुछ अन्य कार्य भी करने पडते है जो अद्योलिखित है-
1. अध्यापन कार्य- प्रधानाध्यापक एक योग्य एवं दक्ष अध्यापक होता है तत्पश्चात् प्रशासक। उसका स्वयं का शिक्षण कार्य अध्यापकों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए वह एक सफल शिक्षक होने के बाद ही शिक्षकों का नेतृत्त्व कर सकता है और मार्गदर्शन दे सकता है। उसका आने विषय पर पूर्णाधिकार होना चाहिए।
2. समय-विभाग चक्र बनाना- शिक्षण कार्य का प्रभावी रूप से चलाने हेतु समय-सारिणी अथवा समय विभाग चक्र बनाना नितान्त आवश्यक है। इसमें विद्यालय का समस्त शैक्षिक एवं सहशैशिक कार्यक्रम प्रतिबिम्बित होता है। विभिन्न प्रकार के समय-विभाग चक्र बनाए जाते है।
3. कक्षाव्यवस्था करना - प्रत्येक कक्षा में बैठने के लिए जहाँ तक संभव हो सके प्रत्येंक - प्रत्येक कक्ष की व्यवस्था की जावें। 
4. कक्षा कक्ष में फर्नीचर आदि की व्यवस्था - प्रत्येक कक्षा - कक्ष में छात्रों के नामांकन के अनुसार फर्नीचर की व्यवस्था, कक्षा में शिक्षक हेतु एक मेज एवं कुर्सी की भी व्यवस्था प्रधानाध्यापक ही करता है। 
5. सहशैक्षिक क्रियाओं की व्यवस्था - शैक्षिक व्यवस्था के साथ - साथ छात्रों चतुर्मुखी विकास हेतु सहशैक्षिक क्रियाओं की भी व्यवस्था की जानी चाहिए। 
6. विद्यालय भवन की साज सज्जा एवं सफाई - छात्रों के स्वास्थ्य को दृष्टिगत रखते हुए विद्यालय भवन की पूताई, फर्नीचर आदि पर वार्षिक कराना तथा विद्यालय को सुसज्जित कराना भी प्रधानाध्यापक का प्रमुख कार्य है। 
7. परीक्षा सचालन एवं परीक्षा परिणाम - विभागीय पंचागनुसार मासिक जाँच, अर्द्धवार्षिक परीक्षा एवं वार्षिक परीक्षा का संचालन करना भी प्रधानाध्यापक का मुख्य कार्य है। 
8. शिक्षक और छात्रों की समस्याओं का निराकरण करना - एक सफल प्रधानाध्यापक अपनी शाला के शिक्षकों और छात्रों की व्यक्तिगत तथा शालीय समस्याओं का भी निराकरण करता है। एक दक्ष व योग्य प्रधानाध्यापक उनकी समस्याओं को अपनी समस्या मानकर उनका निराकरण एवं समाधान करता है। 
9. सम्पर्क स्थापित करना - एक प्रधानाध्यापक को अपने उच्चाधिकारियों से भी निकटतम संबंध बनाए रखना पड़ता है, जिससे कि विद्यालय उन्नति में उनका सहयोग प्राप्त किया जा सके। 
10. पाठ्य - पुस्तकों का चयन - निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार प्राथमिक से माध्यमिक कक्षाओं के लिए पुस्तकें नियतो निश्चित होती है, परन्तु उच्च माध्यमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक के लिए कई वैकल्पिक पुस्तकें स्वीकृत रहती है। 
11. प्रशिक्षक कार्य - शिक्षण की नवीन विद्याओं, नवचारों का साथी शिक्षकों का ज्ञान कराना, साथी शिक्षकों के ज्ञानार्जन में सहायक है। 
12. छात्रों का प्रवेश एवं वर्गीकरण - प्रधानाध्यापक को विभिन्न कक्षाओं में छात्रों को प्रवेश देने का कार्य करना पड़ता है। 
13. अनुशासन व्यवस्था - विद्यालय में अनुशासन की व्यवस्था करना प्रधानाध्यक का प्रमुख कत्र्तव्य है। 
14. कार्यालय का कार्य - किसी विद्यालय का कार्यालय ही उसकी धुरी होता है। यहीं पर महत्वपूर्ण अभिलेख सुरक्षित रखे जाते है। 
15. लिखित कार्य की जाँच - प्रधानाध्यापक स्वयं अपने विषय में लिखित कार्य की जाँच उसी प्रकार करें जैसा कि वह अपने साथी शिक्षकों से चाहता है। 
16. व्यावसायिक समुन्नयन - विद्यालय में विषय - विशेषज्ञों द्वारा वार्ताओं का आयोजन, विचार - गोष्ठियों - सम्मेलनों का आयोजन, वाद-विवाद, पत्र-वाचन, अध्ययन-वृत्त आदि आयोजित कर शिक्षकों का व्यावसायिक समुन्नयन किया जा सकता है। 
प्रधानाध्यापक में गुण अंग्रेजी के शब्द HEADMASTER में इस प्रकार निहित है - 
H – Honest(ईमानदार)
E – Earnest(उत्सुक)
A – Accountable(जवाबदेह)
D – Dignastic (नैदानिक)
M – Marager (प्रबन्धक)
A – Affective (प्रभावात्मक)
S – Sincere (सत्यनिष्ठ)
T – Tactful (नीति-निपूण)
E – Effecint(योग्य)
R – Resaurceful (साधन - निपुण)
प्रधानाचार्य के कार्य (Functions of Principle) 
1. शैक्षिक क्रियाओं सम्बन्धी कार्य- शिक्षण क्रियाओं के रूप में प्रधानाचार्य द्वारा पाठ्यक्रम का चयन करना, शिक्षण विधियों व सहायक सामग्री की व्यवस्था करना, मूल्यांकन करना, निर्देशन देना आदि कार्य किए जाते हैं, ताकि विद्यालय का चहुँमुखी विकास किया जा सके।
2. शिक्षकों सम्बन्धी कार्य- विद्यालय के समस्त कार्यक्रमों का सफलता तथा असफलता उसके राक्षका पर निर्भर होती है। शिक्षक ही केवल वह एक साधन है जो स्कूल को गतिशील बनाए रखता है। इसक बिना विद्यालय शन्य बना रहता है। अतः प्रधानाचार्य द्वारा शिक्षकों को मार्ग-दर्शन व परामर्श देना, उन्नति के अवसर प्रदान करना. कार्यभार सन्तुलित करना, सभी सुविधाएँ देना तथा कार्य का मूल्यांकन करना आदि कार्य किए जा सकते है।
3. छात्र वर्ग सम्बन्धी कार्य - आज के युग में विद्यालय, प्रशासन का यह प्रमुख कार्य है कि प्रत्येक एसछात्र को ऐसे उत्तरदायी,स्वःअनुशासित, उत्साही तथा एक सशक्त कार्यकर्ता के रूप में तैयार करे जो अपने परिवार, समाज राजनीति प्रणा जीवन के हर क्षेत्र में प्रभावी रूप से कार्य कर सके। इस प्रकार प्रधानाचार्य छात्रा को उचित निर्देशन एवं परामर्श देना उनकी संख्या निश्चित करके कक्षा तथा विषय आदि में दर्ज  करना, प्रगति सम्बन्धी रिकार्ड तैयार करना, परीक्षा व उपयुक्त मूल्याकन का व्यवस्था, समचित अनुशासन की व्यवस्था करना छात्र वर्गीकरण के लिए नीतियाँ बनाना, पिछड़े छात्रों के लिए अलग सेशिक्षा की व्यवस्था करना एवं वित्तीय सहायता देना आदि कार्य किए जाते हैं।
4. विद्यालय प्रबन्धन सम्बन्धी कार्य - हेनरी स्विलिन महोदय के अनुसार ‘‘विद्यालय प्रबन्धन का मजतवपूर्ण कार्य शिक्षकों, छात्रों तथा अन्य कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग स्थापित करना है‘‘ अतः विद्यालय प्रबन्धन का मार्गदर्शन उत्तम शिक्षक छात्र सहयोग पर ही आधारित होता है।  इन्हे ही प्रशासन का उत्तम साधन माना गया है। इस प्रकार प्रधानाचार्य द्वारा विद्यालय प्रबन्धकों को उचित निर्देश प्रदान करना, प्रबन्ध सम्बन्धी नीतियों को निश्चित करना, शिक्षक संघ का गठन करना, विकास समितियों का गठन करना, उपलब्धि की जाने हेतु एक संयोजक की नियुक्ति करना आदि कार्यो में किया जाता है।
5. वित्त सम्बन्धी कार्य - मारेफेट(Morphet) के अनुसार, ‘‘शिक्षा के क्षेत्र में केवल लेखा-जोग रखना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस धन से अधिकतम शैक्षिक उपलब्धियाँ प्राप्त करनी है।‘‘ यह केवल उचित प्रशासन द्वारा ही सम्भव है। इस प्रकार प्रधानाचार्य द्वारा विद्यालय वित्तीय योजना का निर्माण करना आय-व्यय का बजट बनाना, लेखा-जोखा का विवरण रखना सभी कर्मचारियों के वेतन की व्यवस्था करना, आय-व्यय का मूल्यांकन करना, प्रबन्धन समिति के सभी मदों का विवरण रखना, वित्तीय विभाग व शिक्षा विभाग से सम्बन्ध रखना तथा वित्त के अनुसार कार्यों की व्यवस्था करना आदि विशेष कार्य किए जाते हैं।
6. विद्यालय कार्यालय सम्बन्धी कार्य- कार्यालय द्वारा विद्यालयों की समस्त गतिविधियों को विकसित किया जाता है। इसका सम्बन्ध सभी क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं से रहता है। अतः उत्तम कार्यालय ही उत्तम विद्यालय का निर्माण करता है। इसी के द्वारा विद्यालय की प्रगति को आँका जाता है। इस प्रकार प्रधानाचार्य द्वारा कार्यालय का निरन्तर आडिट (।नकपज) कराना, सभी वित्तीय रिकार्डों की जाँच करना, वार्षिक व अर्धवार्षिक सहायता प्रतिवेदनों का निरीक्षण कराना, वित्त सम्बन्धी उचित परामर्श प्रदान करना, आय-व्यय सम्बन्धी रूपरेखा तैयार करके देना आदि कार्य किए जाने चाहिए। वार्षिक बजट भी प्राचार्य ही तैयार करता है
प्रधानाचार्य के प्रबन्धकीय कार्य (Functions of Principal in Management) 
। . नियोजन कार्य (Planning as Functions)
    विद्यालय के खुलने से पूर्व -इस स्तर पर प्राचार्य को निम्नलिखित कार्यों का नियोजन करना होता है 
    ग्रीष्मकालीन अवकाश के पश्चात् विद्यालय खुलने की तिथि की घोषणा की जाती है। विद्यालय में प्रवेश की अन्तिम तिथि, एक आवेदन-पत्र प्राप्त किए जा सकेंगे। कुछ कक्षाओं के लिए प्रवेश परीक्षा का भी आयोजन किया जाएगा। परीक्षा की तिथियाँ तथा परीक्षा की व्यवस्था भी की जाएगी। विद्यालय के नोटिस बोर्ड पर सभी सूचनाओं को अंकित किया जाता है। यदि सम्भव हो सके तो समाचार-पत्र में भी विज्ञापन दे दिया जाता है।
    प्रवेश के नियमों तथा प्रक्रिया को तैयार किया जाता है। इसके लिए एक प्रवेश समिति का गठन किया जाता है, जिसका उत्तरदायित्व प्रवेश प्रक्रिया का सम्पादन करना तथा पूरा करना होता है। कक्षा में छात्रों की संख्या भी सुनिश्चित की जाती है। प्रवेश सम्बन्धी समस्याओं का प्रवेश समिति ही समाधान करती है।
प्रधानाचार्य के प्रबन्धकीय कार्य (Functions of Principal in Management) 
नियोजन कार्य (Planning as Functions)
  • प्राचार्य के विद्यालय के फर्नीचर तथा साज-सज्जा की भी व्यवस्था करनी होती है।संसाधन, उपकरण तथा पुस्तकों का भी पुस्तकालय में आयोजन करना होता है। टूटे हुये फर्नीचर को ठीक करना होता।  प्रधानाचार्य इन कार्यों का उत्तरदायित्व वरिष्ठ अध्यापकों को भी सौप देता है और अधिकार भी देता है।
  • विद्यालय में आवश्यक सामग्री उपस्थित रजिस्टर, डायरी, चाक, डस्टर, श्यामपट्ट आदि की व्यवस्था करता है। 
  • प्राचार्य विद्यालय शिक्षा सत्र का कलेण्डर भी तैयार करता है जिसमें पूरेसत्र क्रिया, अन्य मों तथा अवकाश की तिथियों का विवरण दिया जाता है।
  • आवश्यकतानुसार शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्तियाँ भी करता है। कार्यालय साबन्धी रजिस्टारों की व्यवस्था की जाती है।
  • प्रधानाचार्य विद्यालय भवन की पुताई तथा टूट-फूट को ठीक कराता है। फर्नीचर की पॉलिश भी कराता है।। जिससे नए सत्र में विद्यालय भवन नया-सा दिखाई दे। विद्यालय का भौतिक छात्रों के लिए आकर्षक लगना चाहिए। 
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