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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

भारतीय वैज्ञानिक - डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर (Dr. SHANTI SWAROOP BHATNAGAR)

 डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर

Dr. SHANTI SWAROOP BHATNAGAR


   

     सृष्टि के आरम्भ से लेकर वर्तमान युग में आज तक को चमत्कृत कर देने वाली समस्त वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हमें विज्ञान के बारे में अद्भुत जिज्ञासा देती रही है वैज्ञानिकों के अनवरत शोध ने विश्वभर में नित नये कीर्तिमान स्थापित किये है। एक से बढ़कर एक वैज्ञानिक नई - नई खाजों में हमें चैंकाते रहे है। इनमें भारतीय वैज्ञानिकों का महत्व प्राचीन काल से रहा है। पिछले 150 वर्षो में भारत भी कई ऐसे वैज्ञानिक हुए जिनके शोधकार्य ने उनका नाम ही नहीं रोशन किया अपितु भारत देश को संसार के वैज्ञानिक मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया है। भारत के वैज्ञानिक सभी क्षैत्रों में हमेशा से अग्रणी रहे है। खगोल, रसायन विज्ञान, धातु विज्ञान, शरीर विज्ञान, सौर ऊर्जा आयुर्वेद, अन्तरिक्ष विज्ञान, परमाणु ऊर्जा आदि विज्ञान की सभी शाखा प्रशाखाओं और खोजों में भारतीय वैज्ञानिकों का योगदान प्रशंसनीय रहा है। 

    भारत के कुछ प्रमुख वैज्ञानिकों में से एक वैज्ञानिक ‘‘डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर‘‘ है। यह वैज्ञानिक प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी थे। विज्ञान के युग में इनके शोधकार्य अतिप्रशंसनीय व सराहनीय रहें। इन शोधकार्यो की सफलता के लिये इन्हें कई पुरस्कार व उपलब्धियों प्राप्त हुई। हम इस वैज्ञानिक के जीवन - वृत का विस्तार से अध्ययन करेंगें। 

जन्म स्थली -डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर का जन्म 21 फरवरी 1894 को वर्तमान पाकिस्तान में स्थित शाहपुर जिले के भेरा नामक कस्बे में हुआ था। 

पारिवारिक स्थिति -डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर के पिता का नाम बाबू परमेश्वरी सहाय और माता का नाम पार्वती था। पिता हाई स्कूल में अध्यापक के पद पर कार्यरत थें। 

    जब वे मात्र छः महीने की उम्र के थे तब उनके पिता का देहान्त हो गया। तदुपरान्त इनका भरण-पोषण, शिक्षा-दीक्षा, उनके ननिहाल में आरम्भ हुई। 

शैक्षिक पृष्ठभूमि -डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर की प्रारम्भिक शिक्षा सिकन्दराबाद के एंग्लोवैदिक हाई स्कूल में हुई। 1911 में शान्ति स्वरूप भटनागर ने लाहौर के दयाल सिंह हाई स्कूल से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इस योग्यता के परिणाम स्वरूप इन्हें छात्रवृत्ति प्राप्त हुई और वे दयाल सिंह काॅलेज में भर्ती हो गये। इस काॅलेज से इन्होंने एफ.ए. पास किया और बी.एस.सी. भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र और अंग्रेजी विषय लेकर क्रिशचियन काॅलेज लाहौर से पास की। 

    सन् 1916 में बी.एस.सी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्होंने दयालसिंह काॅलेज में डिमाॅन्स्ट्रेटर के पद पर नौकरी कर ली। इस दौरान शीघ्र ही उन्हें आगे बढ़ने व अध्ययन करने का अहसास हुआ और नौकरी छोड़कर इन्होंने एम.एस.सी. में प्रवेश ले लिया। और 1919 में प्रथम श्रैणी से परीक्षा उत्तीर्ण की। 

    शान्ति स्वरूप शुरू से ही विज्ञान के प्रयोगों में रूचि रखते थे। और हर चीज को पुरी गहराई के साथ समझना चाहते थे। जब वे बी.एस.सी. व एम.एस.सी के छात्र थे। तब से ही उनके एक अध्यापक प्रोफेसर रूचिराम साहनी उनकी प्रगति पर नजर रखे हुये थे। और उन्हें शान्ति स्वरूप भटनागर की प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। उन्होंने दयाल ट्रस्ट से सिफारिश की, कि शान्ति स्वरूप को उच्च शिक्षा के लिये अमेरिका भेजा जाना चाहिए। सौभाग्य से ट्रस्ट ने प्रोफेसर साहनी की सिफारिश मान ली और शान्ति स्वरूप को अमेरिका जाने का मौका मिला। 

    सन् 1919 में शान्ति स्वरूप पानी के जहाज से लन्दन गये जहाँ से उन्हें अमेरिका जाना था। लेकिन शान्ति स्वरूप को अमेरिका जाने वाले जहाजों में लन्दन से जगह नहीं मिल सकी। क्योंकि कि 1918 में विश्व युद्ध (World-war) समाप्त हुआ ही था। और सैनिक जहाज से वापस स्वदेश लौट रहे थे। यह स्थिति काफी दिनों तक रही। अतः तत्पश्चात् शान्तिस्वरूप ने लंदन में रहकर आगे। पढ़ने का निश्चत किया। शान्तिस्वरूप भटनागर ने दयालसिह ट्रस्ट को पत्र लिखकर लन्दन विश्वविद्यालय में रसायन विभाग के प्रोफेसर डोनन, कोलायड रसायन के क्षेत्र में अनुसंधान कर रहे थे। शान्तिस्वरूप ने डी.एस.सी. की डिग्री के लिये प्रोफेसर डोनन से मुलाकात की और उन्हें अपनी रूचि व काम दिखाया। प्रोफेसर डोनन उनके काम से प्रभावित हुए और इस तरह डी.एस.सी. की डिग्री के लिये विश्वविद्यालय के छात्र बन गये। सन् 1921 में डाॅ. शान्तिस्वरूप भटनागर ने डी.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की। 

उत्कृष्ट देशप्रेम -डी.एस.सी. की डिग्री प्राप्त कर डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर जर्मनी और फ्रांस गये। और इस प्रकार से शान्ति स्वरूप वहाँ के वैज्ञानिकों के सम्पर्क में आऐ। उन्हीं दिनों मदन - मोहन मालवीय की शान्ति स्वरूप पर नजर पड़ी। और मदन मोहन मालवीय ने उन्हें बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय में आने का निमंत्रण दिया। शान्ति स्वरूप अपने उत्कृष्ट देशप्रेम के कारण तमाम सुख-सुविधाओं महत्वाकांक्षाओं, प्रलोभनों को ठुकराकर बनारस आ गये। 

वैज्ञानिक खोजे एवम सिद्धान्त तथा अनुसंधान -डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर का लक्ष्य विज्ञान के क्षेत्र मे नयी - नयी करना ही नही वरन  उन्हें मानव जाति के उपयोग लगाना और स्वदेश की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना भी था । 

डाॅ. भटनागर के मुख्य अनुसंधानो में कुछ प्रमुख इस प्रकार है -

  • रेल के धुरी को ठण्डा करने के लिए, नया तेल तैयार किया । 
  • मिठाईयाॅ लपेटने के कागज के लिये पेराफीन मोम को गंधहीन पद्धति खोजी। 
  • चुम्बकीय रसायन पर खोज की और इस विषय पर पहली पुस्तक लिखी जिसकी देश - विदेश में काफी ख्याति रहीं। 
  • इन्होंने पैट्रोलियम व मिट्टी के तेल की समस्याओं पर अनुसंधान किये। 

    डाॅ. भटनागर ने डेढ सौ से अधिक शोध-पत्र प्रकाशित किये। और तीस से भी अधिक विधियाँ पेटेन्ट करवाई। इन्होंने पूरे भारत वर्ष में 11 भारतीय अनुसंधान प्रयोगशालाओं की आधारशिला रखी। 

डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ -सन् 1942 में (CSIR काउन्सिल ऑफ साइन्तिफिक एण्ड इण्डस्ट्रियल रिसर्च)की स्थापना हुई। और शान्ति स्वरूप भटनागर इसके निदेशक नियुक्त किये गये। 

  • सन् 1943 में शान्ति स्वरूप राॅयल सोसायटी के फेलो चुने गये। 
  • विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) डाॅ. भटनागर की सूझबूझ है। और वे इसके आरम्भ में अध्यक्ष रहें। 

    देश में विभिन्न प्रयोगशालाओं की स्थापना CSIR द्वारा की गई व इनमें हो रहे अनुसंधानों का लाभ देश के उद्योगों तक पहुँचाने के लिये राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम की स्थापना डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर की ही देन है। उद्योगों के उत्पादों की गुणवत्ता सुधार के लिये भारतीय मानक संस्था भी उन्हीं की ही देन है। 

पुरस्कार व उपाधियाँ -डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर को अंग्रेज सरकार ने सन् 1936 में ओबीआई (OBI) की उपाधि प्रदान की। सन् 1941 में इन्हें सर का खिताब दिया गया था। 

    सन् 1954 में भारत सरकार ने डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर को ‘‘पद्म विभूषण‘‘ की पद्वी से सम्मानित किया था। 

    डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर प्रारम्भ समय से ही मेहनती, परिश्रमी व प्रतिभाशाली थे। उनका सारा जीवन-काल विज्ञान के क्षैत्र में भारत को अग्रणी बनाने में ही बीत गया। 

    डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर एक सच्चे भारतीय और देशभक्त थे। यह कोमल हृदय कवि भी थे। इन्हें अंग्रेज व भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया। 

    आज भी प्रतिवर्ष डाॅ. भटनागर के सम्मान में भारत के प्रतिभाशाली  वैज्ञानिकों तथा को डाॅ. शान्ति स्वरूप भटनागर पुरस्कार दिया जाता है। 1 जनवरी 1955 को उनका निधन हो गया। 

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Dr. D R BHATNAGAR 

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

नोबेल पुरस्कार प्राप्त भारतीय वैज्ञानिक - चन्द्रशेखर वेंकटरमन (CHANDRASEKHARA VENKATA RAMAN)

 चन्द्रशेखर वेंकटरमन

 CHANDRASEKHARA VENKATA RAMAN 


    चन्द्रशेखर वेंकटरमन एक ऐसा नाम है, जिससे विश्वभर के लोग परिचित है। इसका प्रमुख कारण उनका वह प्रकाश संबंधी अनुसंधान है जिसके कारण उन्हें भारत ही नही, समूचे एशियाभर में नोबेल पुस्कार प्राप्त हुआ। इनको सी.वी. रमन के नाम से भी जाना जाता है। इनके अनुसंधान प्रकाश संबंधी होते थें। ये कही भी जाते थे जल की लहरों व प्रकाश की गति पर ध्यान रखते थें। 

जन्म- चन्द्रशेखर वेकंटरमन का जन्म तमिलनाडु के त्रिचनापल्ली नामक स्थान पर नवम्बर, 1888 में हुआ था। 

पारावारिक स्थिति  शैक्षिक पृष्ठभूमि - रमन की रूचि आरम्भ से ही विज्ञान में थी। उनका प्रिय विषय भौतिक विज्ञान था। वे काॅलेज की पढ़ाई के दिनों से ही घर पर वैज्ञानिक अनुसंधान करते रहते थे। रमन प्रारम्भ से ही अपनी कक्षा में प्रथम आते थे। जब उनकी आयु 17 वर्ष की थी और वे एम.ए. के छात्र थे, तो उन्होंने भौतिक विज्ञान से संबंधित एक निबन्ध लिखा। वह उन्होंने अध्यापक जोन्स को दिखाया ताकि वे अपनी सम्मति दे और उसमें सुधार के लिए सुझाव दे। परन्तु आश्चर्य की बात कि वह निबन्ध जोन्स की समझ के बाहर था। बहुत दिनों तक प्रतीक्षा करने के बाद वह लेख स्वयं लंदन की एक सुप्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका ‘फिलासफिसल मैगजीन‘ में छपने के लिए भेज दिया। जब वह लेख ज्यों का त्यों बिना किसी संशोधन के छपा तो मि. जोन्स तो क्या अन्य सभी अध्यापक और प्रिंसीपल आश्चर्यचकित रह गए। इसके बाद उन्होंने अन्य पत्रिका में कुछ दुसरे लेख भी भेजे। इसका लाभ यह हुआ कि वे छोटी-सी आयु में और वह भी विद्यार्थी काल में ही महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों के सम्पर्क में आ गए। 

शिक्षा के बाद इग्लैण्ड जाकर किसी प्रतियोगिता में बैठना चाहते थे, क्योंकि बड़ी और अच्छी नौकरियाँ पाने के लिए प्रतियोगिताओं में बैठना आवश्यक था और प्रतियोगिताएँ इग्लैण्ड जाने के मार्ग में बाधा डाल दी। केवल फाइनेन्स विभाग की प्रतियोगिता परीक्षा ही भारत में होती थी। सो, विज्ञान के विद्यार्थी को फाइनेन्स की परीक्षा में विवश होकर बैठना पड़ा। यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि जब उन्हें फाइनेंस प्रति विवश होकर बैठना पड़ा। यहां यह बता देना आवश्यक है कि जब इन्हें फाइनेंस प्रतियोगिता में बैठना था तो केवल एक ही महिने का समय तैयारी के लिए बचा था। और उसके सभी विषय नए थे इसके लिए उन्हें साहित्य, इतिहास, राजनीति-विज्ञान और संस्कृत आदि में पांरगत होना आवश्यक था। इसमें रमन के अदम्य आत्मविश्वास ने ही सफलता दिलवायी और वे अन्य परीक्षाओं के समान इसमें भी सर्वप्रथम आए। सो वे भारत सरकार के फाइनेंस विभाग में डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर चुन लिए गए और उनकी नियुक्ति पहले-पहल कलकत्ता में हुई। 

    वैज्ञानिक खोजे एवं सिद्धान्त व अनुसंधान - रमन का प्रकाश संबंधी अनुसंधान है। सभी व्यक्ति नदियों, नालों, तालाबों, पोरवरों और समुद्रों मे लहरें उठते देखते है। लहरें दूर-दूर तक उठती चली जाती है, पानी आगे फैलता जाता है। वैज्ञानिक सोचता है कि क्या प्रकाश भी पानी की लहरों के समान फैलता है? पानी और प्रकाश की लहरों में अन्तर क्या है? पानी में लहरें उठने का कारण वायु है। जहाँ वायु का प्रवेश होता है, वहीं लहरें फैलती है। परन्तु प्रकाश की विशेषता यह है कि वह वायुरहित स्थान पर भी फैलता है। 

प्रकाश के सम्बन्ध में अन्य अनेक वैज्ञानिकों ने अनुसंधान किए है परन्तु सी.वी. ने यह सिद्ध किया कि तरल और पारदर्शी पदार्थों में से छितराने पर प्रकाश का रंग बदल जाता है। उन्होंने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन तो कर दिया परन्तु इसे सिद्ध करके दिखाने में उन्हें तीन-चार वर्ष लग गए। 

रमन 1921 में जब पहली बार विदेश गए तो उनका जहाज भूमध्य सागर से गुजर रहा था। वे जहाज के डेक पर खडे़ यों ही पानी की लहरें देख रहे थे। वे एकाएक गंम्भीर हो गए। उन्होंने देखा कि भूमध्य सागर का पानी गहरे नीले रंग का है, जबकि बंगाल की खाड़ी का पानी काला-सा मैलापन लिए हुए सफेदी माइल है।

रमन ने प्रकाश के छितराने के सिद्धान्त का प्रतिपादन 1925 में किया था और 1930 में उन्हें प्रकाश के इस सिद्धान्त पर जिसे हम ‘रामन प्रभाव‘ कहते है, नोबेल पुरूस्कार प्राप्त हुआ। उनमें इतना जबरदस्त आत्मविश्वास था कि 1925 में ही कह दिया था कि मेरे इस अनुसंधान पर पाँच वर्ष पश्चात् नोबेल पुरूस्कार प्राप्त होगा - और हुआ भी ऐसा ही। नोबेल पुस्कार की घोषणा होते ही उनकी गणना विश्व के महानतम वैज्ञानिकों में होने लगी और उन्हें मानद उपाधियों और सम्मान से लाद दिया गया। उन्हें लेनिन शांति पुस्कार भी दिया गया। 

डाॅ. रमन ने रंगो के संबंध में भी अनुसंधान किए है। उन्होंने इस प्रश्न को तीन भागों में बांटा - भौतिक, शारीरिक और मानव मस्तिष्क विज्ञान। रंगो की पहचान आँख की रैटिना करती है। उन्होंने रैटिना के विभिन्न भागों और उनके काम करने के संबंध में अनेक अनुसंधान किए और महत्वपूर्ण नवीन जानकारी दी। 

रमन ने प्रकाश और रंगो के अतिरिक्त ध्वनि के संबंध में भी अनेक अनुसंधान किए। इसके लिए उन्होंने अनेक वाद्य यंत्रो की ध्वनियों का अध्ययन किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने चुम्बकीय शक्ति, एक्सरे और समुद्री जल आदि के संबंध में भी अनुसंधानों में समय लगाया। 

उपलब्धियाँ -रमन ने अपने जीवन में अनेक उपलब्धियाँ हासिल की। उन्होंने कई महत्वपूर्ण नौकरियां छोड़ कर विज्ञान की खोज में लगे। रमन की रूचि विज्ञान में थी और वे अपना जीवन भी विज्ञान के लिए समर्पित समझते थे। परन्तु उन्हें काम करना पड़ता था फाइंनेस विभाग में। परन्तु जहाँ चाह होती है, वहाँ राह निकल ही आती है। उन्हें भी एक दिन कलकत्ता की भारतीय विज्ञान परिषद का द्वार दिखाई दिया, जहाँ सर आशुतोष मुखर्जी और सर गुरूदास बनर्जी की देख-रेख में काम होता था। रमन अपने कार्यालय के बाद वहाँ की प्रयोगशाला में आकर देर रात  तक अनुसंधान और परीक्षण करने लगे। परन्तु उनका यह सिलसिला अधिक दिन नहीं चल पाया और उनका तबादला रंगून कर दिया गया। वहाँ से उन्हें नागपुर जाना पड़ा और कुछ काल बाद पदोन्नत होकर वे अकाउंटेट जनरल बने और उन्हें कलकत्ता भेज दिया गया। यहाँ उन्होंने विज्ञान सम्बन्धी पुस्तके लिखीं और अनुसंधान किए। 

सर आशुतोष मुखर्जी, सर तारकनाथ पालित और डाॅ. रासबिहारी घोष के प्रयत्न से जब कलकत्ता में साइंस काॅलेज की स्थापना हुई तो रमन महोदय ने इतनी बड़ी सरकारी नौकरी छोड़कर काॅलेज का भौतिक विज्ञान संभाल लिया। विज्ञान के प्रति उन्होंने यह उनका काफी बड़ा और सराहनीय त्याग था। रमन ने विज्ञान संबंधी अपने कार्य की जानकारी देने के लिए अनेक बार विदेश जाना पड़ा। उस समय के विश्व विख्यात वैज्ञानिक अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने डाॅ. रामन के संबंध में कहा था - ‘‘डाॅ. रमन ने केवल महत्वपूर्ण अन्वेषण ही नहीं किए, वरन् अपने प्रयासों से कलकत्ता विश्वविद्यालय में विज्ञान की खोज के लिए एक प्रगतिशील और उपयोगी संस्था की स्थापना तथा उसका विकास भी किया है।‘‘


पुस्कार -

    डाॅ. रमन ने अपने जीवन काल में अनेक उपाधियाँ व पुस्कार प्राप्त किए थे। सन् 1930 में प्रकाश के संबंध में उन्हें नोबेल पुस्कार प्राप्त हुआ। नोबेल पुस्कार की घोषणा होते ही उनकी गणना विश्व के महानतम वैज्ञानिकों में होने लगी और उन्हें मानद उपाधियों और सम्मान से लाद दिया गया। उन्हें लेनिन शांति पुस्कार भी दिया गया। भारत सरकार ने विज्ञान संबंधी उनके महान् कार्यो को ध्यान में रख 1954 में उन्हें ‘भारत रत्न‘ के सम्मान से गौरवान्वित किया। 

डाॅ. रमन के अपने वैज्ञानिक कार्यो के कारण लंदन की रायल सोसाइटी ही नहीं, अनेक देशों की विज्ञान-संस्थाओं ने उन्हें अपना सम्मानित सदस्य बनाया। नोबेल पुरूस्कार प्राप्त करने के बाद रामन केवल दो वर्ष तक ही देश की सुप्रसिद्ध संस्था ‘इडियंन इंस्टीट्युट ऑफ सांइस‘ के संचालक पद पर काम करते रहें। 

1943 में उन्होंने रमन इन्टीट्युट की स्थापना की और अपने कार्यो, लेखों, भाषणों और आविष्कारों से इस संस्था को इतना समद्ध कर दिया कि आज यह देश-विदेश में प्रसिद्ध विज्ञान संस्था है। 

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Dr. D R BHATNAGAR 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

भारतीय वैज्ञानिक - डाॅ. प्रफुल्ल चन्द्र राॅय (Dr. PRAFULLA CHANDRA RAY)

 

डाॅ. प्रफुल्ल चन्द्र राॅय

Dr. PRAFULLA CHANDRA RAY 




    डाॅ. प्रफुल्ल चन्द्र राॅय भारत के महान् रसायन शास्त्री थे। डाॅ. राॅय केवल वैज्ञानिक ही नहीं थे अपितु उन्हें शिक्षा उद्योग, समाज-सुधार, वैज्ञानिक आर्थिक और राजनीति पुरूत्थान देवोत्थान में भी रूचि थी। वे महान् वैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री थे। इतिहास और साहित्य से डाॅ. राॅय को विशेष प्रेम था। 

डाॅ. राॅय को आधुनिक भारतीय ‘रसायन विज्ञान का जन्मदाता‘ माना जाता है।

जन्म - डाॅ. राॅय का जन्म 2 अगस्त 1861 ई. को पूर्वी बंगाल (अब बंगला देश) के रड़ौली गांव के समृद्ध जमींदार हरिशचन्द्र राय के घर पर हुआ था। रड़ौली गांव भारत - प्रसिद्ध गांव रहा है। इस क्षेत्र के राजा प्रताप द्वितीय और राजा सीताराम राय ने दिल्ली के सुल्तानों और उनके नवाबो की सत्ता कभी नहीं मानी। बंगाल के प्रसिद्ध महाकवि मधुसूदन दत्त इसी रड़ौली गांव के नाती थे। बंगाल के प्रसिद्ध नाटककार दीनबंधु मित्र भी इसी क्षेत्र के रहने वाले थे। 

परिवार - प्रफुल्लचन्द्र के पिता हरिशचन्द्र राॅय पुराने किस्म के रूढ़िवादी व्यक्ति नहीं थे। वे पाश्चात्य शिक्षा के प्रति उदार थे। वे अग्रेंजी, फारसी तथा बंगाल आदि भाषाओं के अच्छे ज्ञात थे। उनका अपने समय के लगभग सभी समाज सुधारकों से परिचय था। जतीन्द्र मोहन टैगोर, दिगम्बर मित्र, कृष्टोदास पाल और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, ये सभी उनके मित्र थे। उन्होंने अपने गांव में प्राथमिक विद्यालय भी स्थापित किया था। 

बचपन - बालक प्रफुल्ल ‘अकडू‘ लड़कों से सदा अलग रहता और पढ़ने लिखने में मन लगाता। प्रफुल्ल को अपने पिता के पुस्तकों के भण्डार मे जीवन - चरित्रों की एक पुस्तक मिल गई, जिसमें न्यूटन, गैलीलियों, बेजामिन फ्रेकलिन के जीवन चरित्र थे। इनके जीवन चरित्रों को पढ़कर बालक प्रफुल्ल बड़ा प्रभावित हुआ। उसे सबसे खास बात यह लगी कि वे सब साधारण घरों में पैदा हुए थे तथा अपनी लगन और मेहनत से इतने महान् बन गए थे। 

प्रेरणा - बेजामिन फ्रेकलिन के जीवन चरित्र ने प्रफुल्ल को सबसे अधिक प्रभावित किया, जो दस वर्ष की आयु में जीवनयापन की चिंता में फस गया था तथा एक पुस्तक विक्रेता से पुस्तके मांगकर रातभर पढ़ता और सुबह वापस कर देता था तथा जिसने बाद में बिजली का अविष्कार किया बालक प्रफुल्ल ने भी उन जैसा वैज्ञानिक बनने और बड़े - बड़े काम करने का निश्चय किया। 

बीमारी -इस अवधि में सन् 1874 में प्रफुल्ल को पेचिश के रोग ने आ घेरा, जिसने उसके हृष्ट-पुष्ट शरीर को बुरी तरह दुर्बल कर दिया। एड़िसन, सर वाल्टर एकाॅट, रविन्द्रनाथ टैगोर, लार्ड बायरन कर्लाइल, हर्बट स्पेन्सर आदि के जीवन चरित्रों को पढ़कर बालक प्रफुल्ल ने अपने स्वास्थ्य को सुधारने के लिए नियमों का पालन करना और प्रतिदिन थोड़ा व्यायाम करना भी शुरू कया 

वह सात महीने तक बीमार रहे। अपनी बीमारी के सात महीनों में बालक प्रफुल्ल ने एक-एक दिन अपना ज्ञान बढ़ाने में लगाया। 

प्रारंभिक शिक्षा - प्रफुल्लचन्द्र राॅय की प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय में ही हुई, जिसे 9 वर्ष की आयु में उत्र्तीण कर उन्होंने सन् 1870 में कोलकत्ता के हेयर स्कुल में प्रवेश लिया, जहाँ से उन्होंने सन् 1871 में कोलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा उत्र्तीण की। गांव से आने पर शहरी कपड़े पहने हुए जब सन् 1870 में उन्होंने इस विद्यालय में प्रवेश लिया था तो शहरी लड़कों ने उनकी ग्रामीण चाल-ढ़ाल को देखकर ‘अरे ओ देहाती‘ कहकर मजाक उड़ाया था। 

उच्च शिक्षा - प्रवेश परीक्षा उत्र्तीण करने के बाद प्रफुल्ल ने ईश्वरचंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट (अब विद्यासागर काॅलेज) में एफ.ए. में अपना नाम लिखाया तथा रसायन विज्ञान विषय अध्ययन के लिए चुना। 

बालक प्रफुल्ल को कक्षा में पढ़ाई जाने वाली बातों से संतोष नही हुआ, फलतः उन्होंने ‘बाहरी छात्र‘ के रूप में प्रेसीडेंसी काॅलेज में भौतिकशास्त्र और रसायनशास्त्र के व्याख्यान सुनने जाना शुरू कर दिया। इतना ही नही, रसायन विज्ञान की जो भी पुसतक उनके हाथ जाती, वे उसे पढ़ ड़ालते। पिता के कोलकत्ता से गांव चले जाने पर प्रफुल्ल ने छात्रावास में रहना शुरू कर दिया। जहाँ वह अपने कमरे में एक छोटी प्रयोगशाला कायम कर प्रयोग करते रहते थें। वैज्ञानिक अध्ययन के साथ-साथ वे संस्कृत भाषा का ज्ञान भी बढ़ा रहे थे तथा उन्होंने कालिदास के रघुवंश कुमारसंभव तथा मट्टीकाव्यम् का अध्ययन भी किया। 

प्रतियोगिताएँ -

1. सन् 1882 में प्रफुल्ल ने अपने मित्रों और संबंधियों को बताए बिना ‘‘अखिल भारतीय गिल क्राइस्ट स्काॅलरशिप‘‘ प्रतियोगिता के लिए तैयारी की तथा मुंबई के एक पारसी बालक बहादुर जी के साथ सफलता प्राप्त की। 

2. सन् 1885 में एडिनबरा विश्वविद्यालय की स्नातक कक्षा के छात्र के रूप में उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक निबंध प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर मिला। निबन्ध का विषय था- ‘‘गदर के पहले और बाद का भारत‘‘। प्रफुल्ल द्वारा लिखा गया निबन्ध प्रतियोगिता में पुरस्कृत नहीं हो सका, क्योंकि इस निबन्ध मे भारत की दयनीय, सामाजिक एवं आर्थिक दशा का मुद्दा उठाकर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार पर व्यंग्यात्मक शैली में तीव्र प्रहार किये गये थे, परन्तु स्तरीय साहित्यिक भाषा में लिखा जाने के कारण प्राचार्य सर विलियम मूर अंग्रेज होने के उपरान्त भी निबन्ध की प्रशंसा किए बिना न रह सका। 

यूरोप यात्रा -‘‘अखिल भारतीय गिल क्राइस्ट स्काॅलरशिप प्रतियोगिता‘‘ की सफलता ने प्रफुल्ल को उच्च शिक्षा के लिए यूरोप जाने का अवसर दिया। इस सफलता की सूचना प्रफुल्ल ने स्टैट्समैन नामक अखबार की खबर काटकर अपने पिता को गांव भेजी और माता-पिता से इग्लैण्ड जाने की आज्ञा मांगी। जब प्रफुल्ल विदा लेने और आशीर्वाद ग्रहण करने मां के सामने पहुँचे तो मां के ऑसू देखकर खुद भी रो पड़े। प्रफुल्ल ने मां को ढ़ाढ़स बंधाते हुए कहा - ‘‘मां आशीर्वाद दो कि मैं सफल होकर लौटू और विश्वास रखो, जब मै. लौटकर आऊंगा तो सबसे पहले काम यह करूॅगा कि बिकी हुई जमीन खरीद लूंगा और गिरता हुआ मकान फिर बनवा दूंगा।‘‘ 

इंग्लैण्ड यात्रा -सन् 1882 में प्रफुल्ल इग्लैण्ड आये और एड़िनबरा विश्वविद्यालय में विज्ञान संकाय में प्रवेश प्राप्त किया। यहाँ वे प्रसिद्ध रसायन वैज्ञानिक अलैक्जैण्ड़र क्रम ब्राऊन के प्रभाव में आये तथा रसायन शास्त्र की प्रति उनकी रूचि और भी बढ़ गई। यहाँ उनका सर्वप्रथम परिचय ह्मूम मार्शल, अलैक्जेण्ड़र स्मिथ, डाॅ. डाॅर्बिन तथा जेम्स वाॅकर आदि से हुआ। कुछ ही दिनों में जर्मन भाषा सीखकर वे जर्मन वैज्ञानिकों की पुस्तकों से भी लाभ उठाने लगे। इग्लैण्ड प्रवासकाल में उनकी मित्रता लंदन में अध्ययनरत सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस से हो गई। प्रफुल्ल इग्लैण्ड में राजा राममोहन राय की तरह चोगा और चपकन पहना करते थे। इस भारतीय पोशाक में उन्हें गौरव अनुभव होता था। 

लेख प्रकाशित -युवक प्रफुल्ल ने ‘लन्दन टाइम्स‘ सहित इग्लैण्ड की प्रतिष्ठित पत्रों में जाॅन ब्राइट की सिफारिश के साथ अपना लेख प्रकाशनार्थ प्रेषित कर दिया और एक दिन इग्लैण्ड वासियों को इस लेख के माध्यम से पढ़ने को मिला कि अंग्रेजो ने भारत को कितनी बेरहमी से लूटा है, भारत के लोगों के साथ कितना अन्याय किया। लेख के साथ लेखक का नाम भी छपा ‘‘प्रफुल्लचन्द्र रे‘‘। 

कई वर्षो के अध्ययन के पश्चात् उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘हिन्दु रसायन शास्त्र का इतिहास‘‘ सन् 1902 में प्रकाशित हुई, जिसे विश्व के सभी वैज्ञानिकों द्वारा सराहा गया। उसका दूसरा खण्ड सन् 1908 में प्रकशित हुआ जो 15 वर्ष से अधिक दीर्घ और श्रमपूर्ण शोधकार्य का परिणाम था। यह ग्रन्थ रसायन के क्षेत्र में प्राचीन कालीन हिन्दुओं की उपलब्धियों पर प्रकाश डालता है विद्वान आलोचकों और पाठकों द्वारा इसे विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण देन माना गया है। 

शोध-कार्य -

1. B.Sc. की परीक्षा में उन्होंने शानदार सफलता प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने ‘कच्ची धातु का विश्लेषण‘ विषय पर शोधकार्य किया। 

2. सन् 1896 उनके जीवन का महत्वपूर्ण समय था। उस समय उन्होंने एक महान् कार्य किया। उन्होंने मरक्युरस नाइट्रेट नामक अस्थायी पदार्थ प्रयोगशाला में तैयार कर दिखाया। उनकी इस महान् खोज से विश्व के रसायनशास्त्री आश्चर्यकित होगा।  

3. उन्होंने अपने घर पर पशुओं की हड्डियों को जलाकर दिमागी ताकत बढ़ाने वाला रासायनिक तत्व ‘‘फास्फेट ऑफ कैल्सियम‘‘ का निर्माण किया। 

4. डाॅ. राॅय ने मरक्यूरस नाइट्रेट के अलावा अमोनिया नाइट्रेट यौगिकों तथा उनके व्युत्पादो पर मौलिक अनुसंधान किए। रसायनशास्त्र में निम्नलिखित महत्वपूर्ण देन है -

1. पारे के नाइट्रेट तथा उनके व्युत्पन्न।

2. नाइट्राइप्स की चालकता निकालना।

3. मरक्यूरली के नाइट्रस। 

उपाधि, सम्मान और ख्याति - 
  • सन् 1888 में ड़ी.एस.सी. की उपाधि अकार्बनिक रसायन विषय पर प्राप्त की तथा एड़िनबरा विश्वविद्यालय में कई छात्रवृतियों को प्राप्त करने वाले हो गए। 
  • एड़िनबरा विश्वविद्यालय में वे एकमात्र छात्र थे जिन्होंने सन् 1888 में ड़ी.एस.सी. की उपाधि प्राप्त की। अतः उनका सम्मान सभी जगह बढ़ गया। 
  • एड़िनबरा विश्वविद्यालय की रसायन सोसाइटी ने 1887-88 के सत्र् में उन्हें अपना उपाध्यक्ष भी चुन लिया था। इससे उनकी प्रतिभा की धाक का पता चलता है। 
  • सन् 1911 में उन्हें ‘नाइट‘ की उपाधि से सम्मानित किया गया। सन् 1934 में वे लंदन रसायन सोसाइटी के सम्मानित सदस्य चुने गए। 
  • ड़रहय विश्वविद्यालय में उन्हें डी.एस.सी की सम्मानित उपाधि प्रदान की। कोलकत्ता ढ़ाका और बनारस विश्वविद्यालयों ने भी उन्हें अनेक उपाधियों से सम्मानित किया।
  • सन् 1912 में ब्रिटिश विश्वविद्यालयों के सम्मेलन से वापस आने पर प्रिसीडे़सी काॅलेज में उनके सम्मान में एक भोज आयोजित किया, जिसमें पिं्रसिपल जेम्स ने उनकी विशेषताओं का गुणगान किया था। 
  • सन् 1920 में वे भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए।
  • सन् 1917 में वे भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन, कोलकत्ता के अध्यक्ष बने।
  • सन् 1901 में उनकी मित्रता प्रोफेसर गोपालकृष्ण गोखले और महात्मा गांधी से हुई। कोलकत्ता में 19 जनवरी 1902 को गांधीजी की पहली सभा करने डाॅ. राॅय को ही है। डाॅ. राॅय रूढ़िवादिता में विश्वास नहीं रखते है। 

अध्यापन कार्य -सन् 1888 में भारत लौटने पर वे सन् 1889 में प्रेसीडेंसी काॅलेज कोलकत्ता में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए, जहाँ सन् 1911 में अपनी सेवा निवृति से कुछ वर्ष पूर्व वे वरिष्ठ प्रोफेसर बने। एक कुशल अध्यापक के रूप में वे अपने छात्रों से सदैव कहा करते थे- ‘‘विज्ञान का अध्ययन एक सच्चे भारतीय की तरह अपनी अपनी ही मातृभाषा में करो। देखी रूसी वैज्ञानिक दिमित्री मैडिंलीफ ने अपना विश्व-प्रसिद्ध अनुसंधान-कार्य ‘तत्त्वों की आवृत सारणी‘ से संबंधित पत्र रूसी भाषा में प्रकाशित कराया है, अंग्रेजी नहीं।‘‘ 

सन् 1916 में वे राजकीय सेवा से निवृत हो गए। उसके बाद उन्होंने महान शिक्षाशास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी के निवेदन पर नवसृजित विश्वविद्यालय विज्ञान महाविद्यालय, कोलकत्ता मे रसायनशास्त्र के पालित प्रोफेसर के पद का भार ग्रहण किया। उनके शोध छात्रों की संख्या निरन्तर बढ़ती रही। 

उद्योग धंधो की स्थापना -डाॅ. राॅय को केवल वैज्ञानिक कहना उचित न होगा। वे इस बात से भी बड़े दुखी हुए कि भारत के लोग आवश्यक औषधियों के लिए भी विदेशी-देशों विशेषक इग्लैण्ड पर आश्रित है। उन्होंने देखा कि फल-कारखानों, उद्योग-धंधों से रसायन-विद्या का गहरा संबंध है। यह देखकर भी उन्हे बड़ी पीड़ा होती थी कि बंगाली नवयुवक विश्वविद्यालय की डिग्रिया लेकर नौकरी की तलाश में दर-दर भटकते फिरते है। व्यापार और उद्योग-धंधों की तरफ उनका ध्यान बिल्कुल नहीं जाता। वे औद्योगिक प्रतिष्ठानों और कारखानों की स्थापना एवं विकास के लिए भी बराबर उत्साही एवं प्रयत्नशील रहे। उन्होंने ऐसी रासायनिक चीजे बनाने का दृढ़ निश्चय किया जो दवाओं के काम आ सके। अतः उन्होंने औषध-निर्माण का कार्य हाथ में लिया और उन्होंने अपनी मासिक आय का अधिकांश भाग इसके निहित होम कर दिया। उन्होंने अपने घर पर पशुओं की हड्डियां जलाकर दिमागी ताकत बढ़ाने वाला रासायनिक तत्व ‘फास्फेट आॅफ कैल्शियम‘ का निर्माण किया। उन्होंने अपने घर पर जो कारखाना बनाया था, वह धीरे-धीरे प्रगति करने लगा तथा सन् 1900 लगभग एक बड़ा भारी कारखाना बन गया, जो बंगाल कैमिकल्स एण्ड फार्मास्यूटिकल वक्र्स के नाम से आज भी प्रसिद्ध है, उन्होंने उसे सन् 1902 में एक लिमिटेड संस्थान में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने एक ट्रस्ट मण्डल का गठन अपने जन्म स्थान खुलना जिले में एक विद्यालय का संचालन करने के लिए तथा अन्य लोक-कल्याणकारी कार्यो के लिए किया। 

स्वदेशी धंधो को प्राथमिकता -डाॅ. राॅय ‘स्वदेशी उद्योग धंधो‘ के संस्थापक थे। सौदेपुर में गंधक के तेजाब का कारखाना, सन् 1901 में स्थापित कोलकत्ता पाॅट्री वक्र्स नामक चीनी-मिट्टी के बर्तन बनाने का कारखाना सन् 1921 में स्थापित बंगाल एनेमल वक्र्स नामक तामचीनी की चीजे बनाने का कारखाना और सन् 1905 में स्थापित बंगीय स्टीम नैविगेशन कंपनी नामक जहाजरानी कंपनी आदि की स्थापना और संचालन में डाॅ. राॅय की भूमिकाएं अविस्मरणीय रहेगी। 

सम्मेलन व भाषण -सन् 1921 से 1931 तक उन्होंने देश के कोने-कोने का भ्रमण किया और राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना करके बद्दर और छुआछुम उन्मूलन पर भाषण देकर नवयुवकों में नई चेतना फूकी। सभी राजनीतिक नेताओं के जेल में डाल देने पर उन्होंने खुलना, दिजानपुर, कटक आदि अनेक स्थानों पर राजनीतिक सम्मेलनों का सभापतित्व भी किया। असहयोग आन्दोलन के जोर पकड़ने पर उन्होंने कहा था - ‘विज्ञान प्रतीक्षा कर सकता है स्वराज्य नहीं।‘ 

देश प्रेम की भावना -डाॅ. राॅय वैज्ञानिक होने से पहले एक भारतीय थे और सच्चे भारतीय होने के कारण वे सच्चे लोक - सेवक थे। जब कभी और जहाँ कहीं बाढ़ो से भारी नुकसान और विनाश होता था। डाॅ. राॅय प्राकृतिक आपदा से पीड़ित लोगों की राहत के लिए समर्पित भाव से जुट जाते थे। 

सन् 1922 के भयानक अकाल में वे सब शोधकार्य छोड़कर दीन-दुःखियों और पीड़ितों की सहायता के लिए कूद पड़े। उनके मार्गदर्शन में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारम्भिक दिनों में सन् 1922 में उत्तरी बंगाल के बाढ़-पीड़ितों के लिए सहायता-शिविरों का आयोजन किया था। सितम्बर सन् 1931 में उत्तरी और पूर्वी बंगाल में पुनः बाढ़ का प्रकोप हुआ। ‘संकट निवारण समिति‘ ने डाॅ. राॅय को ही इसके निवारण हेतु चुना। सहायता कार्य से बंगाल के युवको, पढ़े-लिखे नौजवनों को बहुत प्रेरणा मिली। वे गांव-गांव गए। अपने देशवासियों की दुर्दशा अपनी आँखो से देखी तथा अपनी एकतामूलक संस्कृति के दर्शन किए। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि की सेवा में समर्पित कर दिया। प्राचीन संतो की भांति उन्होंने विद्वता को चरित्र से मिलाया। उनका उदाहरण वर्तमान और भावी दोनों पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। 

व्यवहार- कुशलता -वे आधुनिक भारत के शिल्पकारों में मूर्धन्य थे, किन्तु वे शक्ति, पद धन और सम्मान के अभिमानी लोगों से बचते थें। वे प्रत्येक से, चाहे वह अनपढ़ अथवा धनी हो, बड़े ही प्रेम से मिलते थे। उन्हें सांमतवादी पृथकतावाद से घृणा थी। 

वे केवल बुद्धि जीवियों, प्रबुद्ध वर्ग और छात्रों के ही मित्र दार्शनिक और मार्गदर्शक नहीं थे, बल्कि सामान्य युवा वर्ग के भी अखण्ड़ प्रेरणा स्त्रोत थे। वे युवकों को यह बताने में अपना अपना कर्तव्य मानते थे कि जीवन में सफलता का रहस्य उद्योगों में निहित है, न कि क्लर्क का कार्य करने में। सन् 1929 में वे तन-मन से असहयोग के आर्थिक रचनात्मक कार्यक्रम में जुट गए। उन्होंने कताई और बुनाई का भरपुर प्रचार किया और जीवन पर्यन्त खादी का उपयोग किया। वे कोई राजनीतिक प्रचारक नहीं थे। परन्तु प्रबुद्ध वर्ग और कार्यो में महान् थे। वे सादगी और सदाचार की प्रतिमूर्ति थे। धर्म और संस्कृति के प्रबल समर्थक इस वैज्ञानिक के रहन-सहन आचार-विचार एवं व्यवहार को देखकर उन्हें महान् भारतीय वैज्ञानिक संत कहते थे। 

उद्घाटन तथा दान राशि -उन्होंने सन् 1924 में भारतीय रसायन सोसाइटी का उद्घाटन किया जिसके वे 2 वर्ष तक संस्थापक अध्यक्ष रहे। उनके द्वारा दिए गए 12 हजार रूपयों की राशि से ही इस सोसाइटी का प्रारम्भ हुआ था। सन् 1936 में वे पालित प्रोफेसर के पद से सेवा निवृत हुए और जीवन पर्यन्त एमेरिटर प्रोफेसर बने रहे। इससे बहुत पूर्व सन् 1921 में अपने जीवन के 60 वर्ष पूरे करने पर उन्होंने अपने मासिक वेतन के स्वतंत्र दान का निवेदन विश्वविद्यालय अधिकारियों से किया। यह राशि विश्वविद्यालय विज्ञान और तकनीकी महाविद्यालय के विकास के लिए निर्धारित की गई। इसी 1,30,200 रू. की राशि के ब्याज से दो प्रफुल्लचन्द्र राॅय छात्रवृत्तियां श्रेष्ठ छात्रों को प्रदान की जाती है। सन् 1922 में उन्होंने पुनः 12,000 रूपयों का दान नागार्जुन पुरस्कार तथा दूसरा सन् 1936 में 11000 रू. का दान जन्तुविज्ञान और जीव-विज्ञान में सर आशुतोष मुखर्जी पुरस्कार के लिए दिया। 

अन्य रूचियाँ -इतिहास और साहित्य से डाॅ. राॅय को विशेष प्रेम था। रविन्द्रनाथ टैगोर, मधुसूदन दत्त और शेक्सपियर उनके प्रिय कवि थे। सन् 1932 में उन्होंने अपनी आत्मकथा - ‘‘एक बंगाली रसायनवेत्ता का जीवन और अनुभव‘‘ पूरी की। 

रसायनशास्त्री होते हुए भी वे प्रयोगशाला की चारदीवारी तक सीमित नहीं थे। विज्ञान के प्रति प्रगाढ़ प्रेम होते हुए उनकी रूचियाँ विविध और आश्चर्यजनक थी, जैसे- शिक्षा, उद्योग, समाज-सुधार, वैज्ञानिक, आर्थिक और राजनीतिक पुनरूत्थान देशोत्थान इन सब ने उन्हें काफी प्रभावित किया।

अंग्रेजी कवि और नाटककार शेक्सपियर के नाटक, इतिहास और जीवन-चरित्र की पुस्तके पढ़ना का भी प्रफुल्ल को बहुत शौक था। उसके पिता उसकी जिज्ञासा को शांत कर उसका ज्ञानवर्धन करते थे। प्रफुल्ल को ब्रह्मसमाज के विद्वानों के भाषण सुनने जाते थे और उनके उदार विचारों का मनन करता था। 

मृत्यु -शुक्रवार 14 जून 1944 को सायं 6 बजकर 27 मिनट पर कोलकत्ता विश्वविद्यालय विज्ञान और तकनीकी काॅलेज में डाॅ. राॅय का कुछ क्षणों की बीमारी के बाद निधन हो गया। जो उनके जीवन के पिछले 30 वर्षो से उनका घर था। देश डाॅ. राॅय के अविस्मरणीय कार्यो का हमेशा कृतज्ञ रहेगा। 

डाॅ. राॅय ने ‘कच्ची धातु का विश्लेषण‘ विषय पर शोधकार्य किया। इन्होंने दिमागी ताकत बढ़ाने वाले ‘‘फास्फेट आॅफ कैल्शियम‘‘ का निर्माण किया वे स्वदेशी धंधो को प्राथमिकता देते थे तथा उन्होंने कई उद्योग-धंधो की स्थापना की। 

डाॅ. राॅय को केवल वैज्ञानिक कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि उन्हे विज्ञान के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी रूचि थी। व्यवहार कुशल होने के साथ ही स्वदेश प्रेमी भी थे। उनको अनेक उपाधि, सम्मान और ख्याति दी गई। 

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Dr. D R BHATNAGAR 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

भारतीय वैज्ञानिक - जगदीश चन्द्र बोस

 भारतीय वैज्ञानिक - जगदीश चन्द्र बोस 

 JAGADISH CHANDRA BOSE


    जगदीश चन्द्र बोस भारत के महान वैज्ञानिकों में से एक है। उन्हें महाभारत के कर्ण से बहुत प्रेरणा मिली जिसके आधार पर उन्होंने जीवन में संघर्ष करते रहना सीखा, जगदीश चन्द्र बोस हार से ही विजय का जन्म होना मानते थे। 

सभी देश के विद्वान वैज्ञानिकों ने श्री बोस को आदर्श वैज्ञानिक माना है। 

जन्म- जगदीश चन्द्र बोस का जन्म 30 नवम्बर 1858 को भारत के मैमन सिंह जिले में हुआ जो वर्तमान में बांग्लादेश में है। यहाँ इनके पिता डिप्टी मजिस्ट्रेट थे। 

पारिवारिक स्थिति -जगदीश चन्द्र बोस का परिवार एक सुशिक्षित एवं धार्मिक विचारों वाला परिवार था, जिसमें रामायण और महाभारत पढ़े जाते थे। उनके पिता का नाम भगवान चन्द्र बोस तथा माता का नाम वामा सुन्दरी बोस था इनके पिता बड़े ही उदारता पूर्ण व्यवहार के धनी थे। 

शैक्षिक पृष्ठभूमि -जगदीश चन्द्र बोस के पिता ने उन्हें अंग्रेजी माध्यम के बजाय हिन्दी की जानकारी रखने पर बल दिया। उन्होंने बोस को हिन्दी स्कूल में दाखिल कराया क्योंकि उनका कहना था कि पहले मातृभाषा का ज्ञान होना जरूरी है, बाद में अन्य भाषाओं का। प्रारम्भिक अध्ययन के उपरान्त बोस ने अपनी नौ वर्ष की अल्पायु में कोलकत्ता के हेयर स्कूल तथा सेंट जेवियर स्कूल में यूरोपीय तथा भारत में रह रहे अंग्रेज छात्र पढ़ते थे। उनके साथ बोस का मन उदास रहने लगा लेकिन फिर भी उन्होंने उनसे मित्रता रखी। खाली समय में वे विज्ञान की चीजों के बारे में भी मशगूल हो जाते। 


बोस सन् 1880 में उच्च शिक्षा के लिए इग्लैण्ड गए। वहाँ उन्होंने चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन शुरू किया ही था कि उनका स्वास्थ्य अचानक बिगड़ गया और पढ़ाई छूट गई। फिर वे कैम्ब्रिज में क्राइस्ट चर्च काॅलेज में प्रकृति विज्ञान के अध्ययन में जुट गए। यहाँ के दो अध्यापकों ने उनका मार्गदर्शन किा। ये अध्यापक प्रकृति विज्ञानी प्रोफेसर सिडनी विनिस और भौतिक विज्ञानी लाॅर्ड रैले थे। 

अध्यापन कार्य -जगदीश चन्द्र बोस सन् 1885 में शिक्षा पूरी कर भारत लौट आए उन्होंने कोलकत्ता के प्रेसीडेंसी काॅलेज में भौतिकी का प्राध्यापक नियुक्त कर दिया गया। 

बोस का विवाह -उनका विवाह सन् 18  के जनवरी माह में अबलादास के साथ हुआ था। वे प्रसिद्ध वकील दुर्गा मोहनदास की पुत्री थी। उनके भाई देशबंधु चितरंजनदास थे। वे विवाह के समय मद्रास मेडिकल काॅलेज में चिकित्सा शास्त्र का प्रशिक्षण ले रही थी किन्तु इनकी जीवन संगिनी बनने के लिए उन्होंने पढाई बीच में ही छोड़ दी। विवाह के पश्चात् उन्होंने इनके सुख-दुःख में बराबर का साथ दिया। 

शोध कार्य -जगदीश चन्द्र बोस ने राॅयल सोसायटी के शरीर क्रिया विज्ञानियों से भी संघर्ष किया, जिसमें उनकी ही विजय हुई। इसके लिए जगदीश चन्द्र बोस ने दो वर्ष कड़ी मेहनत करके ‘रिसपान्स इन द लिविंग एण्ड नाॅन लिविंग‘ नामक मोनोग्राफ छपवाया जिसे देखकर आलोचक विज्ञानी हत प्रत्र रह गये। शेष अप्रकाशित भाषण बाद में प्रकाशित करके सभी देशों में भेजा गया, उन्हें राॅयल सोसायटी ने अपना सदस्य बना लिया। यह घटना सन् 1920 की है। 

विद्युत तंरग पर शोध -विद्युत चुम्बकीय तरंगों पर इंग्लैण्ड में ओलिवियर लाॅज तथा जर्मनी में हिनरिच हट्र्ज नामक वैज्ञानिकों ने भी शोध किए थे। बाद में उन तंरगों का नाम ‘हर्ट्जयन तंरगें‘ रख दिया गया। बोस ने इसके पश्चात् शाॅर्ट रेडियों तंरगों की खोज की। उन्होंने तंरगो पर मापन मि.मी. स्तर पर नापा, जबकि लाॅज में सेन्टीमीटर तथा हट्र्ज ने डेसीमीटर पर कार्य शुरू किया था। 

बोस ने पटसन के सुक्ष्म रेशों जैसी सुक्ष्म सामग्री से विद्युत तंरगो के धु्रवण को ग्रहण करने वाले उपकरण बनाने में भी सफलता प्राप्त की। उनकी सहायता से विद्युत उपकरण रिसीवर तैयार किया गया था, जो ‘कोहेरर‘ कहा जाता था। इस यन्त्र से व्यापारियों को काफी लाभ पहुँचा। ये रिसीवर समुन्द्री जहाजों पर भी कार्य सिद्ध हुए थे। 

बोस के समय मार्कोनी ने भी अंग्रेजी और यूरोपीय वैज्ञानिकों के सहयोग से लम्बी दूरी तक रेडियों तंरगे भेजने वाला यंत्र बना लिया था। 

बोस का बतौर का यह अविष्कार सन् 1885 में कोलकत्ता ‘नगर भवन‘ में पुष्टिपूर्ण शोधकार्य मान लिया गया। उन्होंने यह कार्य अपने स्वनिधि उपकरण से विद्युत तंरगों को दो कमरों की दीवार पार करके तीसरे कमरे में पहुँचकर एक तो एक पिस्तौल चला कर बारूद के ढेर में विस्फोट करके दिखाया। 

उन्होंने सन् 1886 में विद्युत तंरगो का आकार (द्धेध्र्य) निकालने के लिए एक पृष्ट लिया जिस पर बारीक तीन रेखायें खीची गई, फिर पृष्ट से विवर्तन जाली से दैध्र्य निकालने के लिए प्रकाश किरणों का परावर्तन कराकर प्रतिबिम्ब प्रदर्शित किया गया। उन्होंने इस परीक्षण में पूर्ण सफलता प्राप्त कर ली। फिर वे विज्ञान के अन्य शोध कार्य करने लगें। उन्होंने शाॅर्ट वे व विकिरण क्षेत्र में अध्ययन आंरम्भ कर दिया। उनके सैद्धान्तिक शोधों की लंदन विश्वविद्यालय में काफी चर्चा हुई। उन्होंने अपना एक शोधलेख तैयार किया। जिसे राॅयल सोसायटी को प्रकाशनार्थ दे दिया। उन्होंने पौधो के अध्ययन पर अनेक उपकरण बनाये थे उन्होंने जीव-विज्ञान के अलावा भौतिक-विज्ञान पर भी शोधकार्य किये। 

उपलब्धियाँ व पुरस्कार -

यूरोप में सम्मान -सन् 1896 में बोस यूरोप वैज्ञानिकों के निमन्त्रण पर इंग्लैण्ड गये। उनके शोधपूर्ण भाषण और कार्यो की प्रशंसा करते हुए ‘फ्रेंच अकादमी आॅफ साइंस‘ के अध्यक्ष प्रोफेसर ए.कोर्नू ने कहा कि - ‘करने का प्रयास करना चाहिए, जो विज्ञान और कला की मशाल थी। फ्रांस में हमस ब आपकी प्रशंसा करते है और उत्तरोत्तर उन्नति करते रहने की कामना भी।‘

बोस कोहेररों (रिसीवरों) के शोध कार्य में जुट गए, उन्हें इस कार्य में अपनी विद्युत तंरगो में कुछ शिथिलता महसूस हुई। उन्हें लगा इससे उस प्रवाह में कमी होकर उनकी संवेदन शीलता नष्ट हो सकती है। यह शिथिलता जीवों में भी मांसपेशियों जैसी है। इस परीक्षण के लिए उन्होंने एक उपकरण ‘ कृत्रिम रेटिना‘ अर्थात् कृत्रिम दृष्टि पटल तैयार किया। उन्होंने जब यह सारा प्रयोग किया तो उनकी दृष्टि अपने ग्राफ पर डाॅक्टर वालर की तरह प्राप्त हुई वक्ररेखा पर पड़ी। उन्होंने निर्जीव वस्तुओं पर रासायनिक क्रिया करके प्रयोग की संपुष्टि की। अतः उन्होंने स्पष्ट किया कि संजीव पदार्थो एवं निर्जीव वस्तुओं में कोई अधिक अंतर नहीं है। 

सन् 1900 के जुलाई माह में पेरिस के इटंरनेशनल कांग्रेस ऑफ फिजिक्स में वैज्ञानिकी के समक्ष अपना प्रयोग सिद्ध करने के बाद उनकी इच्छा हुई कि कृत्रिम रेटिना को बेतार संचार में व्यवसायिक प्रयोग के लिए पेटेंट कराया जाये परन्तु कुछ वैज्ञानिकों के विरोध के कारण यह प्रस्ताव माना नहीं गया। इस समय इस सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द भी मौजुद थे, इन्होंने बोस को भारत का महान सपूत कहकर सम्मानित किया था।        

10 मई 1901 को लंदन में राॅयल सोसायटी ऑफ साइंस हाल में बोस अपना पेड़ पौधों की संवेदन शीलता का प्रयोग दिखा रहे थे पौधों की जडे़ ब्रोमाइड अम्ल में डुबी थी उपकरण पौधे से जुड़ा था कि प्रतिक्रिया होते ही स्क्रीन पर हल्के धब्बे दिखने लगे जिनसे पौधे की संवेदनशीलता जाहिर हो रही थी, पौधे की नब्ज की धड़कन जिसे वह बिन्दू पहले घड़ी के पेण्डुलम की नियमितता से आगे पीछे अंकित कर रहा था, धीरे-धीरे अनियमित और असन्तुलित होती चली गई। और वह धब्बा तीव्रता से हिलने लगा फिर अचानक ही थोड़े समय बाद उसकी सभी प्रक्रियाएँ शून्य हो गई तथा वह पौधा मर गया यह प्रयोग देखकर सभी वैज्ञानिक और दर्शक आश्चर्य में डुब गये वे बोस के शोधपूर्ण विवेचन कार्य की प्रशंसा कर उठे। भौतिक विज्ञानी सर राॅबर्ट आस्टिन ने कहा मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि धातुओं में भी जीवन होता है, मुझे यह ज्ञान नहीं था। 

जीव-जन्तुओं एवं पौधों के हृदय की क्रिया के जानने के लिए उन्होंने अनेक सहायता स्वचालित रिकार्डरों के अविष्कार किये। 

 सम्मान एवं निधन -जगदीश चन्द्र बोस को डाक्टरेट की अनेक उपाधिया मिली उन्हें अनेक देशों के विज्ञान संस्थानों का सदस्य बनाया गया उनकी 23 नवम्बर 1937 को मधुमेह एवम् रक्त चाप की बीमारियों से पीड़ित होने के कारण मृत्यु हो गई उस समय वे 79 वर्ष के थे। 

जगदीश चन्द्र बोस हमारे देश के महान वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि एक अमर राष्ट्र चेतना थी, जो कि उन्होंने अपने कार्यो से सिद्ध कर दिया। 

उन्होंने घोषणा की हमें पश्चिमी देशों को छोड़कर अपना मूल तथ्य नहीं गवांना चाहिए। देश के नए आविष्कार ही भविष्य की पूंजी है। मैं इसको जीवित रखने के लिए राष्ट्र की मान्यताओं को ही बल व स्थान दूंगा। इसके लिए में चाहता हूँ कि समस्त वैज्ञानिकों द्वारा इस संस्थान को सहयोग दिया जाये व इसे विकसित किया जाए ताकि उन्हें अपने शोध कार्य में नया संबल मिले, नए अनुसंधान कार्यो की जानकारी मिले। 

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Dr. D R BHATNAGAR 

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