Culture शब्द के अर्थ पर विचार किया जाय तो इसका सम्बन्ध संस्कृति, शिष्टता, सम्वर्द्धन, संस्कार एवं सामूहिक व्यवस्था आदि से लिया जाता है। Knowing शब्द के अर्थ का विचार किया जाय तो इसका अर्थ सुविचारित, जानकार, जानते हुए, सुशिक्षित , जानना, जान - बूझकर की गयी क्रिया एवं भिज्ञ आदि से लिया जाता है। दोनों ही शब्द व्यापक रूप में अपने अर्थ को प्रकट करते हैं। वास्तविक रूप से संस्कृति का सम्बन्ध जानने की प्रक्रिया या ज्ञान की प्रक्रिया से होता है क्योंकि जानने की प्रक्रिया का प्रमुख आधार संस्कृति ही होती है।
आज भले ही बालकेन्द्रित शिक्षा व्यवस्था का युग हो परन्तु भारतीय संस्कृति में शिक्षक को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया जाता है। अतः ज्ञान की प्रक्रिया या जानने की प्रक्रिया हमारे मानवीय मूल्यों, सामाजिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित होती है। संस्कृति के अन्तर्गत विद्यालयी संस्कृति को भी सम्मिलित किया जाता है। विविध प्रकार की सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के जानने की प्रक्रिया या ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया पर निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं-
1- जानने की प्रक्रिया में सामाजिक संस्कृति की भूमिका
(Role of social culture in knowing)-
जानने की प्रक्रिया में सामाजिक संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि विद्यालयी व्यवस्था, शिक्षा के उद्देश्य एवं शिक्षा के विषयों का निर्धारण सामाजिक संस्कृति पर निर्भर करता है। प्राचीनकाल में समाज का सम्बन्ध वेदों से था तो छात्रों को वेदों को जानने के लिये प्रेरित किया जाता था। इसी क्रम में धर्म की शिक्षा को महत्त्व दिया जाता था। वर्तमान समय में विद्यालयों में धर्म की शिक्षा वर्जित है क्योंकि सामाजिक व्यवस्था में धर्म के स्थान पर भौतिकता का प्रभाव है। अत : सामाजिक संस्कृति अपने स्वरूप की पहचान कराने के लिये शिक्षा एवं शिक्षालयों का सहारा लेती है। इसका एक उदाहरण यह भी है कि वर्तमान समय में वह ज्ञान श्रेष्ठ माना जाता है जो कि धन कमाने से सम्बन्धित होता है तथा भौतिक विकास के उपयोग में आता है।
2. जानने की प्रक्रिया में विषयगत संस्कृति की भूमिका
( Role of subject culture in knowing ) –
विषयगत संस्कृति का आशय विषय की प्रकृति से होता है; जैसे - विज्ञान विषय की संस्कृति में प्रयोग द्वारा विचार, परिकल्पना एवं मान्यताओं को सत्य सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है जबकि दार्शनिक विषय में मान्यताओं, परम्पराओं एवं सूत्रों को प्रमुख स्थान प्रदान किया जाता है। दर्शनशास्त्र एवं विज्ञान दोनों विषयों के उद्देश्य, शिक्षण विधियाँ एवं शिक्षण सामग्री पृथक् - पृथक् रूप में होती है। इसलिये इनके अधिगम या ज्ञान से सम्बन्धित गतिविधियाँ भी पृथक् - पृथक् रूप में होंगी। इस प्रकार विषयगत संस्कृति द्वारा भी ज्ञान की प्रक्रिया का स्वरूप एवं उससे सम्बन्धित विविध गतिविधियों का निर्धारण किया जाता है।
3. विद्यालय संस्कृति की भूमिका ( Role of school culture ) –
विद्यालय संस्कृति का प्रभाव जानने की प्रक्रिया पर व्यापक रूप से देखा जाता है । विद्यालय की संस्कृति यदि आधुनिक शैक्षिक मूल्यों से प्रेरित है , शिक्षक की भूमिका छात्रों के लिये सुविधादाता के रूप में है , शिक्षक द्वारा छात्रों की शैक्षिक एवं अशैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है तथा छात्रों एवं शिक्षकों के मध्य उचित सम्प्रेषण व्यवस्था पायी जाती है तो ऐसी स्थिति में ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया या जानने की प्रक्रिया प्रभावी रूप में सम्पन्न होगी क्योंकि विद्यालय की संस्कृति से ही विद्यालय का वातावरण निर्मित होता है । जब विद्यालयी संस्कृति में ज्ञान प्राप्त का उद्देश्य निहित होगा तो निश्चित रूप से छात्रों को ज्ञान की प्राप्ति सरल एवं स्वाभाविक रूप में हो सकेगी ।
4. राजनीतिक संस्कृति की भूमिका ( Role of political culture ) –
शिक्षा का अधिकार, 6 से 14 वर्ष के बालक - बालिकाओं के लिये निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा, बालिकाओं की शिक्षा व्यवस्था के अतिरिक्त सुविधा तथा शिक्षा का सार्वभौमीकरण उस राजनीतिक संस्कृति की ओर संकेत करते हैं जो कि शैक्षिक मूल्य एवं शैक्षिक व्यवस्था से प्रेरित है। इस प्रकार राजनीतिक संस्कृति जो कि शिक्षा से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित है जानने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है क्योंकि इस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति में नेतागण शिक्षित एवं समर्पित होते हैं। इस स्थिति में छात्रों को ज्ञान प्राप्ति के लिये समान एवं अधिकाधिक अवसरों की प्राप्ति होती है।
5. आर्थिक संस्कृति की भूमिका ( Role of economic culture ) –
आर्थिक संस्कृति के समाज में विविध प्रकार के रूप पाये जाते हैं। कुछ सामाजिक व्यवस्थाएँ अर्थ प्रधान होती हैं तथा भौतिक विकास को मान्यता देती है। कुछ सामाजिक व्यवस्थाएँ धन को मात्र साधन समझती हैं तथा ज्ञान को सर्वोच्च स्थान देती हैं। 'धन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग शिक्षा के लिये' जिस सामाजिक संस्कृति का मूल मन्त्र होता है उस समाज में ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया प्रभावी रूप में सम्पन्न होती है। जो संस्कृति शिक्षा या ज्ञान को धन कमाने का साधन मानती है उसमें जानने की प्रक्रिया उचित रूप में सम्पन्न नहीं हो पाती क्योंकि वहाँ ज्ञान का सम्बन्ध भौतिक विकास से होता है।
6. शैक्षिक संस्कृति की भूमिका ( Role of educational culture ) –
शैक्षिक संस्कृति का स्वरूप भी जानने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है, जैसे- भारतीय समाज में शिक्षा का स्वरूप आदर्शवादी, नैतिकतावादी एवं मानवतावादी मूल्यों पर आधारित है। इसलिये शिक्षालयों में सभी बालक - बालिकाओं को समानता के साथ शिक्षा प्रदान की जाती तथा पाठ्यक्रम का स्वरूप आदर्श, मानवता एवं नैतिकता के आधार पर निर्धारित किया गया है। समाज का वातावरण भी शिक्षा के उद्देश्यों के अनुरूप होता है। इसलिये शिक्षा एवं समाज में सहयोग की स्थिति पायी जाती है क्योंकि इसके मूल में शैक्षिक संस्कृति की व्यापकता है।
7. धार्मिक संस्कृति की भूमिका ( Role of religious culture ) –
जिस समाज में धार्मिक मान्यताओं एवं व्यवस्थाओं पर आधारित होती है, जैसे- भारतीय सांस्कृतिक व्यवस्था में धर्म का संस्कृति का प्रभाव होता है उस समाज में जानने की प्रक्रिया या ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया धार्मिक महत्त्वपूर्ण स्थान है इसलिये आज भी ज्ञान प्राप्ति के लिये गुरु का आवश्यकता होती है। गुरु का स्थान आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ईश्वर के समकक्ष माना जाता है। इस स्थिति में ज्ञान की प्रक्रिया में विविध प्रकार की कल्पनाओं एवं मान्यताओं का समावेश हो जाता है जो कि आधुनिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं होती हैं।
8. दार्शनिक संस्कृति की भूमिका ( Role of philosophical culture ) –
दार्शनिक संस्कृति की ज्ञान प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है; जैसे- भारतीय शिक्षा में अनेक प्रकार की दार्शनिक विचारधाराओं का समावेश है। इन विचारधाराओं में कुछ विचारधाराएँ प्रयोजनवादी दृष्टिकोण एवं वैज्ञानिक विचारों से सम्बन्धित हैं तो कुछ विचारधाराएँ आदर्शवादिता से सम्बन्धित हैं। प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा के अनुसार ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया पृथक् - पृथक् रूप में होती है, जैसे- प्रयोजनवाद के अनुसार, करके सीखने तथा प्रयोग के आधार पर छात्रों को ज्ञान प्रदान किया जाता है जबकि आदर्शवाद में शिक्षक द्वारा विविध आदशों को प्राप्त करने के लिये ज्ञान प्रदान किया जाता है। इस प्रकार विविध दार्शनिक संस्कृतियाँ ज्ञान प्राप्ति या जानने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।
9. वैश्विक संस्कृति की भूमिका ( Role of global culture ) –
वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व एक मंच पर एकत्रित हो गया है । इस स्थिति में ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में भी एकीकृत रूप उपस्थित हो गया है । आज एक देश में शिक्षण अधिगम प्रक्रिया सम्बन्धी अनुसन्धानों का कोई परिणाम प्राप्त होता है तो वह सम्पूर्ण विश्व में फैल जाता है । इसी आधार पर ज्ञान प्राप्ति की गतिविधियों में तथा ज्ञान प्राप्ति के साधनों में समेकित रूप देखा जाता है । आज शिक्षा के अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के उद्देश्य को सभी देशों के शिक्षाशास्त्रियों एवं मनोवैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार किया जाता है ।
10. आधुनिक संस्कृति की भूमिका ( Role of modern culture ) –
वर्तमान सांस्कृतिक व्यवस्था विज्ञान एवं तकनीकी पर आधारित है। आज के समय में विज्ञान, सूचना संचार एवं तकनीकी क्रान्ति के कारण जानने की प्रक्रिया में भी परिवर्तन हो गया है। आज का छात्र किसी भी ज्ञान प्राप्ति के लिये शिक्षक की प्रतीक्षा नहीं करता वरन् ज्ञान के लिये कम्प्यूटर एवं इण्टरनेट का प्रयोग करता है तथा विविध प्रकार की सूचनाओं को प्राप्त कर लेता है।
वर्तमान संस्कृति शिक्षक को भी उन गतिविधियों एवं उपायों को व्यवहार में लाना चाहिये जो कि छात्रों की रुचि एवं इच्छा के अनुरूप हों। इस प्रकार की संस्कृति का प्रभाव यह है कि छात्रों के ज्ञान का स्तर उच्च एवं स्थायी हुआ है। इस संस्कृति में शिक्षक की भूमिका मात्र दिशा - निर्देश देने की है । वह छात्र की रुचि एवं क्रियाओं को उचित मार्ग पर ले जाता है जिससे छात्र अधिक से अधिक ज्ञान सरल एवं स्वाभाविक रूप में प्राप्त कर सके।
अत: यह स्पष्ट हो जाता है कि विविध सांस्कृतिक व्यवस्थाओं एवं उनसे सम्बन्धित मान्यताएँ , सिद्धान्त एवं परम्पराएँ ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया का निर्धारण करती हैं । इसके लिये सभी शिक्षकों एवं छात्रों द्वारा संयुक्त रूप से अपनी रुचि एवं आवश्यकता के अनुरूप ज्ञान प्राप्ति की विधियों का चुनाव करना चाहिये जिससे आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया जा सके ।
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बुधवार, 19 मई 2021
जानने में संस्कृति की भूमिका
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