सोमवार, 22 अगस्त 2022

लेखन सुधार part-3

 लेखन सुधार  (भाग-3)

सुधार के प्रथम अभ्यास में हमने अक्षरों के ऊपर की लाइन को सही तरीके से बनाने के बारे में सिखा। आज के इस अभ्यास में हम खड़ी लाइन(।) बनाने के बारे में सीखेंगे। भारत मेरा देश है। इस वाक्य में भा मैं 2 खड़ी लाइन, एक खड़ी लाइन, मे एक खड़ी लाइन, रा एक खड़ी लाइन, एक खड़ी लाइन,एक खड़ी लाइन है। इस वाक्य के अंदर साथ खड़ी लाइनें हैं।

कॉपी के एक पेज में 30 लाइनें हैं तो एक लाइन में मै 20 खड़ी लाइनें माने तो एक पेज में 20x30=600 बार खड़ी लाइनें हम बनाते हैं। यह लाइन सीधी हो और सही हो तो हम एक पेज में लगभग 600 बार गलती करने से बच जाएंगे। प्रथम व द्वितीय अभ्यास अगर प्रशिक्षित अध्यापक की देखरेख में किया जाएं तो आपका लेखन 50 से 60% तक सुधार किया जा सकता है। 

लेखन सुधार के अभ्यास हेतु निम्नलिखित अभ्यास पेज दिया गया है--

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                Dr. D R BHATNAGAR   

बुधवार, 17 अगस्त 2022

लेखन सुधार Part - 2, अक्षर व शब्द के ऊपर की लाइन खीचना

लेखन सुधार (भाग-2) 

अक्षर व शब्द के ऊपर की लाइन खीचना

 
जब भी हम लेखन सुधार का कार्य प्रारंभ करते हैं तो उसमें सबसे पहले अभ्यास के रूप में अक्षरों के ऊपर की लाइन का अभ्यास करते हैं। हमने देखा है की एक कॉपी में लगभग एक लाइन की 30 लाइनें होती है। एक लाइन में तकरीबन 10 से 12 अक्षर लिखे जाते हैं। हम यह मान के चलें की एक पेज में 25 के लगभग लाइने है तो हमें एक पेज में तकरीबन 250 बार ऊपर की लाइन सीखनी पड़ेगी। यह ऊपर की लाइन सीधी नहीं होती है, या हम सीधी नहीं खींचते हैं या टेढ़ी होती है तो हमारे लेखन शैली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जो सीधे-सीधे हमारे लेखन पर पड़ता है। 
अगर इस गलती को सुधार लिया जाए तो हम एक पृष्ठ पर 250 बार गलती करने से बज जाएंगे। 
इस अभ्यास के सुधार से हमारी लेखन शैली में लगभग 20 से 25% सुधार संभव है। 
यह अभ्यास अगर किसी प्रशिक्षित अध्यापक की देखरेख में किया जाए, तो इसके परिणाम और भी अच्छे आएंगे।
धन्यवाद 

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              डॉ. डी. आर. भटनागर

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

हिंदी लेखन सुधार कैसे करें? Part -1

 हिंदी लेखन सुधार कैसे करें?

(भाग-1)

भारत में हिंदी भाषा जो कि उत्तर भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय है। ज्यादातर सरकारी कार्य में हिंदी भाषा का बोलबाला है। जब भी विद्यार्थी किसी परीक्षा में बैठता है और प्रश्न पत्र का उत्तर देता है उस समय हिंदी भाषा की लेखन शैली आपको अधिक अंक दिलाने में अपना महत्वपूर्ण रोल अदा करती है। अगर लेखन शैली स्पष्ट, शुद्ध एवं पढ़ने योग्य ना हो तो परीक्षा लेने वाला अध्यापक आपकी भाषा शैली न बढ़ पाने के कारण या शुद्ध ना होने के कारण सही अंक देने में अपने आप को असमर्थ समझता है। कुछ परिस्थितियों में तो ऐसा भी पाया गया है की आप द्वारा प्रश्नों के उत्तर सही लिखे गए लेकिन लेखन शैली इतनी अशुद्ध, अस्पष्ट होने के कारण अध्यापक उसको सही ढंग से समझ नहीं पाता है और आप के अंक काट लेता है। परिस्थिति कोई भी हो लेकिन इसमें विद्यार्थी का ही नुकसान होता है इस नुकसान को कैसे कम किया जाए? इसी को ध्यान में रखते हुए हिंदी की देवनागरी लिपि को शुद्ध तरीके से कैसे लिखा जाए? या लेखन सुधार कैसे किया जाए? इस पर कुछ क्रियात्मक कार्य करेंगे। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं अगर आप द्वारा मेरे इस क्रियात्मक कार्य को रोजाना अभ्यास किया जाएगा तो निश्चित ही आपको 1 सप्ताह में रिजल्ट सामने दिखाई देंगे और 1 महीने में आपके लेखन में अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिलेगा।

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                Dr. D R BHATNAGAR   

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

क्या सेवारत प्रशिक्षण संस्थान भूतकाल की बात हो गये है ?

क्या सेवारत प्रशिक्षण संस्थान भूतकाल की बात हो गये है ?
Are in-service training institutes a thing of the past?

 क्या सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान भूतकाल की बात हो गये है? 
वर्तमान समय में सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की बात की जाए तो यह कहना उचित रहेगा कि बिल्ली को दूध संभालने के लिए दे दिया। 

    • सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान को राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ा दिया गया है। 
    • सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान को समाप्त करने का राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ने कदम बढ़ा दिए। 
    • समग्र शिक्षा अभियान के तहत होने वाले शिक्षक प्रशिक्षण को ऑनलाइन और मॉड्युल आधारित करवाए जा रहे हैं जो केवल एक ही प्रकार की विधा की ओर इंगित करता है। 
    • अध्यापक जो प्रशिक्षण प्राप्त करने जाते हैं उनकी नजर में प्रशिक्षण के प्रति उत्साह से ज्यादा उदासीनता ने उनको घेर लिया है तथा प्रशिक्षण संस्थानों में अधिकारियों की मौजूदगी उन्हें हमेशा दबाव में प्रशिक्षण व चापलूसी को प्रेरित करती है। 
    • सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण की गुणवत्ता के खत्म होने के पीछे एक कारण प्रशिक्षण प्राप्त लोगों का उनकी सर्विस के साथ प्रशिक्षण का कोई लाभ नहीं मिलना है। 
    • प्रशिक्षण देने वाले व लेने वाले दोनों ही जब योग्यता में समान होते हैं तब प्रशिक्षण अपनी उपादेयता को खो देता है जो वर्तमान में हमारे प्रशिक्षण में हो रहा है। 
    • प्रशिक्षण के साथ-साथ उस पर अनुसंधान भी आवश्यक है लेकिन वर्तमान मे अनुसंधान मौलिक ना होकर शुन्य हो गया है या लीपापोती हो रही है। 
    • आन साइड प्रोग्राम मरणासन्न की अवस्था में पहुंच गए हैं। 
    • कार्यशालाओं का आयोजन ना के बराबर हो रहा है या हो रहा है तो विभागीय चाटुकारिता या बजट निस्तारण के लिए। 
    • विश्वविद्यालयों व कॉलेजों के साथ इन प्रशिक्षण संस्थानों के समन्वय से उच्च कोटि के प्रशिक्षण जो चल रहे थे अब उनका पटाक्षेप हो चुका है। 
    • वर्तमान के प्रशिक्षण को अध्यापक 10 दिन की गोठ या पिकनिक नाम दे रहे हैं। 
    • जिम्मेदार आंख मूंदे बैठे निर्णय ले रहे हैं क्योंकि उनके ऊपर कुछ ऊपर के लोगों का दबाव है। 
    • इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों और विद्यार्थी भुगतने को तैयार हो चुके हैं क्योंकि भविष्य नेताओं का, जिम्मेदार अधिकारियों का खराब नहीं होगा खराब इस देश के नागरिक विद्यार्थियों का होगा जो भविष्य की नींव है। 

कैसे सुधार किया जाए? 
    • सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण हेतु शिक्षक प्रशिक्षण कैडर बनाकर शिक्षक प्रशिक्षकों व शिक्षण संस्थानों को विकसित किया जाए। 
    • शिक्षक प्रशिक्षण में विद्यालय, शिक्षण, शिक्षण विधियों पर आधारित नवाचारों पर अधिक जोर दिया जाए। 
    • शिक्षक प्रशिक्षण को सेवा नियमों का अंग बनाया जाए वह वेतन वर्दी में अतिरिक्त लाभ दिया जाए। 
    • ऑनलाइन माध्यम के प्रशिक्षण को तुरंत प्रभाव से बंद कर दिया जाए। ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग विशिष्ट विधाओं, शिक्षण प्रशिक्षण सामग्री व अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेमिनार हेतु किया जाना ही उचित रहेगा।
    • लैब एरिया गतिविधियों को भी बढ़ाया जाए। 
    • शिक्षक प्रशिक्षण में अनुसंधान कार्यक्रम को पीएच.डी. जैसे कार्यक्रम एवं डिग्री के साथ जोड़ा जाए तथा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के पेपर पब्लिश करने हेतु अध्यापकों को प्रेरित किया जाए। 
    • शिक्षण प्रशिक्षण से संबंधित संस्थाओं के साथ कोलोबरेशन किया जाए। 
    • भाषा आधारित कार्यशाला सभी अध्यापकों के लिए आयोजित की जाए। जहां हिंदी भाषी क्षेत्रों में अंग्रेजी और मातृभाषा क्षेत्रों में हिंदी और अंग्रेजी दोनों हेतु कार्य किया जाए। 
    • प्रशिक्षण संस्थाओं को सुदृढ़ किया जाए। 

इसी प्रकार ही शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की डूबते जहाज को वापस किनारे लाकर उसको सुधार किया जा सकता है। 

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     Dr. D R BHATNAGAR   

Reader /Associate professor 
7222005216
dungarambhatnagar@gmail.com



मंगलवार, 19 जुलाई 2022

क्या पतन की ओर है हम?

      What are we in The Fall? 

क्या पतन की ओर है हम? 

    वर्तमान की उद्वेलित करने वाली परिस्थितियों में देश, समाज, व्यक्ति किसी भी धर्म का हो उसके पतन की शुरुआत वो खुद करता है जिसको कुछ बिंदुओं के अंतर्गत हम समझेंगे-

व्यक्तित्व

    मनुष्य अपने व्यक्तित्व को दूसरों की देखरेख में चला रहे हैं उसके खुद के व्यक्तित्व का कोई अस्तित्व नहीं है तेज दिमाग व नेतृत्वशील लोग उसके व्यक्तित्व को अपने अनुसार ढाल रहे हैं उदाहरण के तौर पर देखें-

जैसे टीवी में विज्ञापन आता है कि यह कोल्ड ड्रिंक पीना चाहिए और लोग उसको देखा-देखी जब भी मौका मिलता है उसी को ड्रिंक को पीता है क्योंकि विज्ञापन ने हमारे व्यक्तित्व को उसके अनुसार बदल दिया है। 

खानपान

    हम पुराने समय से ही सादा एवं सात्विक खाना खाते रहे लेकिन जैसे ही नई संस्कृति और लोगों के संपर्क में आए, हम लोग जो सुबह दलिया राबड़ी दूध दही खाने वाले हैं सीधे मैगी, पास्ता, मोमोज के चटकारे लेने में अपनी शान समझने लगे। उस समय संस्कृति के संरक्षण इसका प्रतिकार नहीं करते है। 

बच्चों का विद्यालय

    हम वैदिक एवं संस्कृत भाषा के ऐसे विद्यालय का समर्थन करते रहे हैं जो पूर्णतया हमारी संस्कृति का पोषक कर रहे हैं तथा इन विद्यालयों में अपने बच्चों को भेजना भी हम अपनी शान समझते थे। आज वही संस्कृति के पोषक समाज के लोग जो दूसरों को संस्कृति पोषण करने की सलाह देते हैं लेकिन खुद की संतानों को मिशनरी, अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भेजते हैं अर्थात मुंह में राम और बगल में छुरी वाली कहावत चरितार्थ करते हैं - यानी अपने आसपास के लोग जो भक्ति और उपवास करने को कहेंगे और खुद गपा-गप भोजन करेंगे यही हमारे  पतन का कारण भी बनेंगे।

व्यवहार 

    आस्था के पोषक लोक व्यवहारवादियों को भी पछाड़ रहे हैं। अपना काम होने पर ये गधे को भी बाप बना लेते हैं लेकिन काम निकल जाने के बाद इनको अपनी आस्था के प्रतीकों की याद आती है। यह लोग गिरगिट की तरह बाहर से ही नहीं, अपने व्यवहार, अपने आचार, अपने विचार सब तरह से रंग बदलते हैं इनको देखकर गिरगिट भी शर्म के मारे पानी-पानी हो जाता है। 

    जब तक देश व समाज में ऐसे महानुभाव रहेंगे हमारे लिए तरक्की मैं बाधा डालेंगे। जब तक देश की    आखिरी पायदान पर खड़ा व्यक्ति विकास की राह पर नहीं चल पड़ेगा तब तक ऊपर शिखर पर पहुंचने वाला व्यक्ति अपनों को विकसित नहीं समझ सकता और धीरे धीरे वह पतन की ओर अग्रसर होगा। विकसित वही इंसान होगा जो सबको साथ लेकर चलेगा। 

जय हिंद जय भारत। 

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 Dr. D R BHATNAGAR   

Reader Education 

7222005216 

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शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

John Dewey (John Dewey)

 जॉन डीवी
John Dewey


    जॉन डीवी का जन्म इंग्लैण्ड के वरमाण्ट में अक्टूबर सन् 1859 में हुआ था। स्नातक की परीक्षा में उसने दर्शन में विशेष योग्यता दिखायी। विभिन्न,विश्वविद्यालयों में वह दर्शन का शिक्षक रहा। शिकागो में पढ़ाने के काल में उसका ध्यान शिक्षा की ओर गया। इसलिये उसने एक प्रयोगशाला स्कूल (Laboratory School) 1896 ई. में खोल दिया। इस स्कूल को खोलने का प्रयोजन यह था कि वह दर्शन मनोविज्ञान तथा शिक्षा के विषयों का प्रयोगशाला में ठीक ऐसा ही सम्बन्ध स्थापित कर दें, जैसा कि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का प्रयोगशाला से होता है। डीवी को हम व्यावहारिकतावादी मानते हैं, यद्यपि उसके दर्शन पर हीगेल तथा जेम्स दोनों का प्रभाव स्पष्टतः व्यक्त है। उसने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से बाहर भी शिक्षा पर वक्तव्य दिये हैं, विशेषकर  चीन में। उसका निधन सन् 1952 में 93 वर्ष की आयु में हुआ।



डीवी के अनुसार शिक्षा का अर्थ

Meaning of education according to John Dewey

डीवी के अनुसार, “व्यापक अर्थ में शिक्षा जीवन के सामाजिक रूप की अविरलता है।”

दूसरे स्थान पर डीवी ने “शिक्षा को पूर्णरूपेण सामाजिक प्रक्रिया बताया है, जिसके प्रमुख दो आधार हैं, व्यक्तिगत और सामाजिक । 

व्यक्ति की शक्तियों, रुचियों, योग्यताओं आदि को भी ध्यान में रखकर उसके अनुकूल उसे शिक्षा देनी चाहिये, परन्तु साथ ही साथ उसकी समस्त शक्तियों, रुचियों आदि को सामाजिक मूल्य देना है।

      • शिक्षा मानव जीवन के लिये आवश्यक है अन्यथा उसके बिना बालक की मूल प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण नहीं रखा जा सकता। 
      • शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है। समस्त शिक्षा व्यक्ति के द्वारा सामाजिक चेतना में भाग लेने से आगे बढ़ती है। 
      • शिक्षा छात्र के विकास से सम्बन्ध रखती है।
      • शिक्षा पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है। 
      • साध्य से साधन अधिक महत्त्वपूर्ण है।

डीवी के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य

Objectives of Education according to John Dewey 

 डीवी के अनुसार सभ्य समाज के साथ-साथ शिक्षा के उद्देश्य को भी बदलते रहना चाहिये ताकि समयानुकूल शिक्षा दी जा सके। 

(1)अनुभवों का पुनर्निर्माण –डीवी के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य पूर्व में निश्चित होने चाहिये अर्थात् बालक की प्रत्येक क्रिया का कोई न कोई उद्देश्य होता है अर्थात् शिक्षा द्वारा बालक के अनुभवों का पुनर्निर्माण होता है।

(2) वातावरण के साथ अनुकूलन – शिक्षा को बालक का इस प्रकार से विकास करना चाहिये ताकि वह वातावरण के साथ समायोजन कर सके। “शिक्षा की प्रक्रिया अनुकूल की निरन्तर प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य विकास की बढ़ती हुई क्षमता प्रदान करना है।”

(3) सामाजिक कुशलता प्राप्ति – बालक समाज का एक अंग है, अत: यह आवश्यक है कि शिक्षा बालक को समाज के अनुरूप ही तैयार करे तथा उसको समाज के प्रति कर्त्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों को निभाने का तरीका बताये तभी बालक अपने को समाज में समायोजित कर सकता है।

(4) स्वीकारात्मक नैतिकता – स्वीकारात्मक नैतिकता का विकास भी बालक के विकास में सहायक है, जिसको शिक्षा के द्वारा ही पूर्ण किया जा सकता है, इससे बालक की सामाजिक कुशलता में वृद्धि होती है।

डीवी के अनुसार पाठ्यक्रम 

Teaching Syllabus of Education according to John Dewey 

(1) उपयोगिता का सिद्धान्त – रुचि की प्रधानता के साथ-साथ पाठ्यक्रम साधारण जीवन में भी उपयोगी होना चाहिये, जिससे बालक अपने जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान कर सके तथा वातावरण में अपने को समायोजित कर सके। इस प्रकार पाठ्यक्रम व्यावहारिक ज्ञान देने वाला होना चाहिये।

(2) क्रियाशीलता का सिद्धान्त – पाठ्यक्रम बालक के अनुभवों, क्रियाओं तथा भावी जीवन की तैयारियों से सम्बद्ध होना चाहिये। डीवी का विचार है, “विद्यालय समुदाय का अंग है, इसलिये यदि ये क्रियाएँ समुदाय की क्रियाओं का रूप ग्रहण कर लेंगी तो ये क्रियाएँ बालक में नैतिक गुणों तथा स्वतन्त्रता के दृष्टिकोण का विकास करेंगी। साथ ही ये उसे नागरिकता का प्रशिक्षण भी देंगी और उसके आत्मानुशासन को ऊँचा उठायेंगी।”

(3) एकीकरण का सिद्धान्त – प्रयोजनवादी डीवी के अनुसार शिक्षा में ज्ञान का एकीकरण होना चाहिये। ज्ञान पूर्णरूप से देना चाहिये,खण्ड-खण्ड करके ज्ञान नहीं देना चाहिये। इस प्रकार संक्षिप्त रूप में पाठ्यक्रम लचीला, बाल केन्द्रित होना चाहिये।

डीवी के अनुसार शिक्षण-विधियाँ 

Teaching Method of Education according to John Dewey 

(1) स्वानुभव द्वारा सीखना 

(2) प्रयोग द्वारा सीखना 

(3) अप्रत्यक्ष रूप से योजना विधि को भी उचित ठहराया है।

डीवी के अनुसार अनुशासन

Discipline according to John Dewey 

    • जॉन डीवी दण्ड का कट्टर विरोधी था। 
    • उसके अनुसार शिक्षा को भय के साथ विद्यार्थी पर नहीं थोपा (Impose) जाना चाहिये। 
    • अनुशासन स्वाभाविक हो, जो विनय पर आधारित हो, जिससे बालक के कार्य में बाधा नहीं आनी चाहिये। 
    • अनुशासन उसमें अन्दर से उत्पन्न होना चाहिये तो स्थायी होगा तथा समाज के अनुकूल होगा अर्थात् व्यक्ति का समाजीकरण ही अनुशासन का मुख्य उद्देश्य है।

डीवी के अनुसार विद्यालय और शिक्षक

Schools and teachers according to John Dewey

    • जॉन डीवी ऐसे विद्यालयों निन्दा करता है जिनमें बालक के प्रति कठोरता का व्यवहार किया जाता है और परम्परागत पाठ्यक्रम का सहारा लेकर केवल किताबी ज्ञान दिया जाता है। 
    • वह अव्यावहारिक देने वाले विद्यालयों को बेकार समझता है। इसके स्थान पर डीवी स्वतन्त्र तथा सामाजिक वातावरण वाले विद्यालय को प्राथमिकता प्रदान करता है। विद्यालय का प्रयोगात्मक होना अति आवश्यक है। 
    • उनके अनुसार, “विद्यालय को सामाजिक अनुभवों की प्रयोगशाला होना चाहिये, जहाँ बालक परस्पर सम्पर्क द्वारा जीवन-यापन की सर्वोत्तम प्रणालियाँ सीख सकें।”
    • डीवी शिक्षक को महत्त्वपूर्ण स्थान देता है। उसके अनुसार शिक्षक एक सम्मिलित व्यक्ति है, जो उपयोगी शिक्षण-विधि द्वारा बालक के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है तथा एक पथ-प्रदर्शक के रूप में कार्य करता है। 
    • वह एक चतुर बढ़ई के समान है, जो अपनी बुद्धि के आधार पर लकड़ी का सर्वोत्तम उपयोग करता है।

शिक्षा में जॉन डीवी का योगदान 

John Dewey's Contribution to Education

      डीवी ने पाठ्यक्रम को भी कुछ सिद्धान्तों के आधार पर निश्चित किया है, जिसके लिए आवश्यक है कि बालक के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखा जाय। अत: उसने निम्नलिखित सिद्धान्त प्रतिपादित किये-

(1) रुचि का सिद्धान्त – पाठ्यक्रम का निर्माण बालक को रुचियों के आधार पर किया जाना चाहिये, जिससे उसकी विशिष्टताओं को विकसित किया जा सके। इसके लिये जितने सम्भव हो सकें विविध विषयों को सम्मिलित किया जाना चाहिये। इसीलिये ‘डीवी ने पाठ्यक्रम के निर्माण के समय भूगोल, इतिहास, कला, विज्ञान, गणित, भाषा, संगीत, कला आदि को सम्मिलित किया।

(1) क्रिया द्वारा सीखना 


(1) शिक्षा कुशल सामाजिक जीवन की तैयारी तथा संवाहिकता का रूप है। 

(2) उद्देश्य,शिक्षा की प्रक्रिया के साथ ही जुड़े हैं। 

(3) शिक्षा के दो आधार हैं-सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक । अतः शिक्षा व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक दोनों प्रकार से तैयार करती है। 

(4) पाठ्यक्रम समाज की क्रियाओं का सरल, शुद्ध और सन्तुलित रूप है, इसलिये विद्यालय में उचित वातावरण तैयार करना चाहिये । 

(5) विद्यालय में जनतान्त्रिक एवं सामाजिक व्यवस्था होनी चाहिये। 

(6) अनुशासन छात्रों की रुचियों के द्वारा किया जा सकता है। 

(7) शिक्षक को बालकों की उद्देश्य पूर्ति के लिये अभ्यास कराना चाहिये तथा विकास का अवसर प्रदान कराने में सहायक होना चाहिये। 

(8) विद्यालय के सभी कार्यक्रमों में लघु समाज का स्वरूप झलकना चाहिये। 

(9) शिक्षण की विधियों में ‘अनुभव’ तथा ‘क्रिया द्वारा सीखने’ पर बल दिया जाना चाहिये। 

(10) पाठ्य-विषयों में सहसम्बन्ध होना चाहिये।


गुरुवार, 22 जुलाई 2021

निर्देशन- विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए (Need of Guidance for children with special needs )

विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए निर्देशन एवं परामर्श की आवश्यकता
Need of Guidance & counselling for children with special needs 


    इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति भिन्न-भिन्न है यहां तक कि जुड़वा बच्चे भी भिन्नता देखने को मिलती है, इसी प्रकार शारीरिक रचना, बुद्धि, सामाजिक-आर्थिक स्तर, संवेगात्मक स्थिति सभी से भिन्नता होती है पर जब यह भिन्नता इतनी अधिक हो जाती है तो उन लोगों को सामान्य कार्य करने के लिए भी सहायता की आवश्यकता हो जाती है तो हम उन्हें विशिष्ट आवश्यकता (विशेष समूह) वाला समूह कहते है।
कारण 
1. अभिभावक द्वारा अपने बच्चे को विशेष न मानना - ऐसे बच्चों के अभिभावक ना तो ऐसे बच्चों को स्वीकार करने को तैयार होते है ना ये मानने को तैयार होते है कि उनका बच्चा विशेष है वे उसे अभिशाप, पापों का दण्ड जैसे नकारात्मक भाव अपने बालक के प्रति रखते है खुद को एवं बालकों को कोसते है ऐसे में सबसे पहले अभिभावकों के परामर्श की आवश्यकता होती है ताकि वे ऐसे बालक को स्वीकार कर पाए तथा उसकी जरूरतों को समझे।
2. अध्यापक सहयोग देने की समूचित विधियों से परिचित नहीं होते हैं।
3. संस्थानों में समूचित साधनों एवं सुविधाओं का अभाव होता हैं।
4. विद्यार्थियों में हीनता एवं आत्मविश्वास की कमी होना हैं।
5. सम्मान पूर्वक जीवन जीने हेतु व्यावसायिक परामर्श की आवश्यकता होती हैं।
6. बालको के अनुरूप शिक्षण विधि का उपयोग के लिए।
विशिष्ट आवश्यकता (विलक्षणता) वाले बालको का वर्गीकरण 
विलक्षणता के आधार पर ऐसे विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को 4 वर्गो में वर्गीकृत किया जाता है-

    असाधारण (विशिष्ट आवश्यकता) बालक से तात्पर्य उन बालकों से है जो किसी प्रकार से सामान्य बालकों से विचलन (अलग) प्रदर्शित करते है।



संज्ञानात्मक विलक्षणता
    वे सभी बालक जो अत्यधिक प्रतिभाशाली है, या मानसिक रूप से विमंदित है, कम उपलब्धि प्राप्त करने वाले या धीमी गति से सीखने वाले, वे सभी इसी श्रेणी के अन्तर्गत रखे जाते है- 
    अत्यधिक सृजनात्मक बालकों को भी विलक्षण बालकों की श्रेणी में रखा जाता है इस प्रकार इस श्रेणी में पांच प्रकार के बालकों को रखा गया है इसमें वे बालक आते है जो सामान्य सभाव्यता वक्र में दोनों तरफ सामान्य रूप से विचलित होते है। यह पांच प्रकार हैं-

1.प्रतिभाशाली बालक (BRILLIANT CHILD)

    ‘‘टरमैन’’ के अनुसार वे बालक जिनकी बुद्धिलब्धि 140 या उससे अधिक है तथा जो चिन्तन से क्षमता युक्त है प्रतिभाशाली बालक कहलाते है इन बालको का प्रदर्शन पढ़ाई व अन्य क्षेत्रों में भी श्रेष्ठ होता है। 
    ये बच्चे बुद्धि में औसत बच्चों से अत्याधिक उच्च होते है। इसलिए चीजों को आसानी से समझ व सीख लेते है सामान्य बच्चों से कम समय व कम प्रयास में। इसलिए इन बच्चों को अनेक सामाजिक, भावनात्मक व समायोजन संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं।

प्रतिभाशाली बालकों के लिए निर्देशन
1. विद्यालयों में शीघ्र प्रवेश दिया जाए।
2. सीधे उच्च कक्षाओं में प्रवेश दिया जाए या एक वर्ष में दो कक्षा एक साथ या कुछ कक्षा छोड़ने की अनुमति दी जाए या अपनी उम्र से ऊँची कक्षा की परीाा देने का अधिकार दिया जाए।
3. अपने पंसद के विषय में स्वयं निर्धारित शीर्षक पर गहन अधिगम के छूट दी जाए।
4. ऐसे बालकों के लिए कुछ विशेष कक्षाओं की व्यवस्था की जा सकती है।
5. विद्यालयी मूल विषयों के साथ अन्य और विषय पढ़ने की छूट दी जा सकती है।
6. पाठ्यक्रम में उच्च स्तरीय चिंतन को समाहित किया जाए।
7. व्यक्तित्व विकास कार्यशालाओं को आयोजन कर विकास में सहायता प्रदान की जा सकती है।
8. ऐसे बालकों को पढ़ाने के लिए प्रतिभाशाली अध्यापकों का प्रबन्ध हो ताकि वे बालक अपनी जिज्ञासा शांत कर सकें।
9. ऐसे बालकों को कक्षा में कुछ अन्य जिम्मेदारियां दी जाए।
10. सेमीनार, वर्कशाॅप में भाग लेने के अवसर प्रदान किये जाए।
11. विभिन्न प्रतियोगिताओं जैसे प्रश्नोतरी, वाद-विवाद, सामान्य ज्ञान में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
12. खुले प्रश्न पूछे जाए।

 2.सृजनात्मक बालक(CREATIVE CHILD)

ऐसे बालक जो नवीन, मौलिक व विलक्षण सोचने की क्षमता युक्त होते है सृजनात्मक बालकों की श्रेणी में आते है। इनमें प्रवाहिता, लचीलापन व मौलिकता का गुण होता है, सृजनात्मकता के ये तीनों ही तत्वों का विकास संरचनात्मक विद्यालयी प्रशिक्षण व कठोर पारिवारिक अनुशासन से बाधित होता है। संसार में व्याप्त सुन्दरता चाहे वह आविष्कारों को रूप में हो, कविता, कहानी, उपन्यास या चित्रकारी के रूप में इन्हीं सृजनात्मक लोगों की वजह से है।

सृजनात्मक बालकों के लिए निर्देशन

i. मस्तिष्कीय तुफान - अध्यापक द्वारा किसी विषय समस्या है या किसी वस्तु के उपयोग के लिए जितने अधिक विचार प्रस्तुत किये जा सकते हो प्रस्तुत करने पर बल दिया जाए ताकि सृजनात्मक विकसित कि जा सके। यहां पर अध्यापक को चाहिए कि वह हर विचार का सम्मान करें, बालक को अधिक से अधिक विचार प्रस्तुत करने के लिए अभिप्रेरित करे।
ii. सिनेटिक्स - यह विधि विलियम गाॅर्डन द्वारा विकसित की गई, इस विधि का प्रयोग मुख्यतः जटिल यांत्रिक समस्याओं का हल कर पाने हेतु किया जाता है। इसमें भी समस्याओं का वैकल्पित समाधान ढूढ़ पाता है।
iii. भूमिका अदा करना - इसका उपयोग कर बालकों को ऐसे अनुभव प्रदान किये जा सकते है जो वे सामान्यतः वास्तविक जीवन में नहीं प्राप्त कर पाते हैं। सोचने का अवसर प्राप्त होता है जिससे उसमे बहुआयामी चिन्तन का विकास होता है।
iv. लक्षणों को सुचीबद्ध करना - यह किसी विशेष उत्पाद सेवा य क्रिया में सुधार का महत्वपूर्ण तरीका है उदाहरणार्थ- चम्मच का सामान्य उपयोग खाना-खाना है पर इसका अन्य उपयोग ढक्कन खोलने में भी किया जा सकता है। इस प्रकार वस्तु की विशेषता को बड़ा दिया जाता है।

3.कम उपलब्धि वाले बालक(UNDERACHIEVING CHILD)

    कुछ बालक विद्यालय में अपनी क्षमताओं से कम शैक्षिक उपलब्धि प्राप्त करते है वे बालक इस श्रेणी में आते है। ये बालक अपनी बुद्धिलब्धि के अनुरूप अपेक्षित उपलब्धि के स्तर को प्राप्त नहीं कर पाते हैं व उसमें निम्न स्तरीय निष्पत्ति हाती है।

कम उपलब्धि बालको के लिए निर्देशन 

    कम उपलब्धि प्राप्त बालक विद्यालय में निष्पत्ति के आधार पर संज्ञानात्मक विलक्षणता को एक और समूह में विभाजित किया है, जो बालक जिनकी शैक्षिक निष्पत्ति उनकी क्षमता की तुलना में कम होती है उन्हें हम कम उपलब्धि वाले बालक कहते है। 
    बालक के विद्यालयी अंको व बुद्धिलब्धि बालकों में तुलना कर कम-उपलब्धि बालकों का पता लगाया जा सकता है। कम उपलब्धि के अनेक कारण हो सकते है जैसे विषय या पढ़ाई में रूचि का ना होना, अच्छा प्रदर्शन करने की अभिप्रेरणा का अभाव, गलत या अप्रभावी अध्ययन आदते, साथ ही घर का माहौल या विद्यालय का वातावरण भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते है।
1. बालक खुद का मूल्यांकन स्वयं कर सके ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन विद्यालय में किया जाए।
2. ऐसे बालकों को कार्य के तुरन्त पश्चात् उनके द्वारा किये गए कार्य के निष्पादन की जानकारी प्रदान की जाए ताकि वे विश्लेषण कर अपने निष्पादन को सुधार सके।
3. कम निष्पादन से जुडे़ कारकों की पहचान के लिए अभिप्रेरित किया जाए।
4. अच्छी अध्ययन आदतों के विकास के लिए कक्षा में वार्ता की जा सकती है।
5. समूह परामर्श द्वारा अच्छे निष्पादन के लिए पे्ररित किया जाए।
6. व्यक्तिगत परामर्श प्रदान किया जाए।
7. स्वयं छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर उन्हें प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित किया जाए।
8. सहपाठियों से पढ़ाई में सहायता लेने को अभिप्रेरित किया जाए। साथ ही सहपाठियों को सहायता करने हेतु अभिपे्ररित किया जाए।
9. अध्यापक-अभिभावक वार्ता में ऐसे बालकों के अभिभावकों को नियमित रूप से बुलाया जाए, जहाँ अध्यापकों द्वारा अभिभावकों को बालक की इस समस्या से परिचित कराया जाए। साथ ही अभिभावकों को इस समस्या में सहायता हेतु वे किस प्रकार योगदान दे सकते है ये बताया जाए। 

          4.मंद गति से सीखने वाले बालक (SLOW LEARNER)

    इन बालकों की बुद्धिलब्धि 81 से 90 होती है। इन्हें सीखने में सामान्य बच्चों को ज्यादा समय लगता है इसलिए इन्हें मंद गति से सीखने वाला बालक कहा जाता है।

मंदगति से सीखने वाले बालकों के लिए निर्देशन

1. ऐसे बच्चों को व्यक्तिपरक देखभाल की आवश्यकता होती हैं।
2. एक बार में एक ही आदेश या सूचना दी जानी चाहिए।
3. जो भी सूचना दी जाए वह बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए।
4. सूचनाएं अन्तविरोधी नहीं होनी चाहिए।
5. पढ़ाने में अधिक से अधिक संवेदी सूचनाओं का उपयोग किया जाए।
6. अध्ययन अनुभवों का विस्तार किया जाए जैसे- अगर शिक्षक फूल के बारे में समझाना चाहता है। तो कक्षा में फूल को साथ में लाकर उसके साथ फूल का सम्प्रत्यय समझा जा सकता है।
7. अगर वास्तविक चीजें उपलब्ध ना हो तो तस्वीरे दिखा कर भी अनुभव को बढ़ाया जा सकता है।
8. ऐसे बालकों को उनके निम्न निष्पादन के कारण पहचानने में मदद की जानी चाहिए।
9. इन बालकों के अभिभावकों को नियमित रूप से अध्यापक-अभिभावक मुलाकात में बुलाना चाहिए ताकि इन विद्यार्थियों की समस्याओं पर बात की जा सकें।
10. व्यक्तिगत परामर्श प्रदान किया जाए।
11. ‘‘अध्ययन आदतों’’ में सुधार का प्रशिक्षण देना चाहिए।

             5.मानसिक रूप से विमंदित बालक (MENTALLY RETARDED CHILD)

    इन बालकों की बुद्धिलब्धि 75 से भी कम होती है यह मस्तिष्क की एक अवस्था है जिसे किसी भी इलाज द्वारा ठीक नहीं किया जा सकता है। वे बच्चे जिनकी बुद्धिलब्धि 50-75 के मध्य होती है। शिक्षित किये जा सकते है पर जिन बालकों की बुद्धिलब्धि 25 से 50 के मध्य होती है केवल प्रशिक्षित किये जा सकते है ताकि वे अपना दैनिक कार्य स्वयं कर सके। इन बालकों में निश्चित रूप से समायोगी व्यवहार में कमी के साथ सार्थक रूप से औसत बौद्धिक व मानसिक हास देखने को मिलता है। मानसिक रूप से दुर्बल बालक अपनी उम्र के अनुसार समायोजी व्यवहार नहीं कर पाते है तथा इनमें कम से कम समायोजी कौशल के दो क्षेत्रों में प्रभावशाल रूप से काफी चिंताजनक होती है जैसे - संचार, आत्म देख रेख, घरेलू जीवन, शैक्षिक कौशल, खाद्य तथा सुरक्षा, सामाजिक कौशल आत्म निर्देश आदि।

मानसिक रूप से विमंदित बालकों के लिए निर्देशन

1. पारिवारिक परामर्श दिया जाए ताकि ऐसे बच्चों के अभिभावक सर्वप्रथम अपने बच्चों को स्वीकार कर सके, साथ ही उन्हें इन बच्चों की विशेष आवश्यकताओं, समस्याओं व इनके साथ प्रभावशाली रूप से कार्य करने के तरीको की जानकारी व प्रशिक्षण दिया जा सके।
2. किसी भी पुनर्वास या सामाजिक प्रशिक्षण कार्यक्रम की सफलता के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता अभिभावकों द्वारा उन्हें स्वीकार किया जाना है क्योंकि जब अभिभावक बच्चों को स्वीकार तभी वे उनके लिए धनात्मक रूप से उनके विकास में योगदान दे पाएगें।
3. इन बालकों को कार्य करने के लिए कोई भी निर्देश व्यक्तिगत रूप से दिया जाना चाहिए।
4. इन्हें सीखाने के लिए उन गतिविधियों का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाना चाहिए जिनमें वे कुछ अपने हार्थो द्वारा करके सीख सके।
5. इन बच्चों की अमूर्त बुद्धि कम होती है इसलिए सिखाने के लिए ठोस वस्तुओं, वास्तविक जीवन की समस्याएं उदाहरण द्वारा शिक्षित किया जाना आवश्यक है।
6. इन बालकों में एकाग्रता की शक्ति कम होती है। अतः कालाशों का समय कम होना चाहिए।

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Dr. D R BHATNAGAR 

शिक्षकों हेतु लिखित सम्प्रेषण- परिपत्र, सूचना पत्र, आदेश पत्र, प्रतिवेदन, विवरण



शिक्षकों हेतु लिखित सम्प्रेषण
Written Communication for Teacher

    • कक्षा में शिक्षक मौखिक व लिखित सम्प्रेषण का ही सर्वाधिक उपयोग करता है। 
    • संप्रेषणकर्त्ता किसी सूचना या निर्देश को लिख कर संप्रेषित करता है। शिक्षक श्याम पट् पर लिख कर सम्प्रेषण का कार्य करता है तथा मूल्यांकन में भी लिखित सम्प्रेषण का ही उपयोग किया जाता है। 
    • विद्यालय में कई लोगों के मध्य लिखित सम्प्रेषण होता है जैसे प्राचार्य और शिक्षकों के बीच। शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच तथा विद्यालय प्रबंधन समिति व शिक्षकों, प्राचार्य व अभिभावकों  के बीच। 
    • इस प्रकार से वर्तमान में शिक्षकों के लिए लिखित सम्प्रेषण कौशल में निपुण होना भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। लिखित सम्प्रेषण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-
    • उचित भाषा का चुनाव- ऐसी भाषा चुननी चाहिए जो कि संदेश प्राप्त कत्र्ता को समझ में आए। कक्षा में संदेश ग्राहक एक से अधिक होते है उनमें वैयक्तिक विभिन्नताएँ भी होती है। कोई कठिन क्लिष्ट भाषा भी समझ लेता परन्तु कुछ विद्याार्थि सरल भाषा समझ लेता है।
    • लिखते समय लेखन में व्याकरण संबंधि त्रुटियाँ न हो तथा अक्षर सुंदर लिखने का प्रयास करे।
    • लिखित संदेश छोटा व सारगर्भित व विषयवस्तु से संबंधित होना चाहिएं।
    • हस्तलिखित बिंदु (Hand written point) बनाते है जो कि विद्यार्थियों स्व-अध्ययन में उपयोगी होते है उनमें पाठ के सभी महत्वपूर्ण बिंदु आने चाहिए व उन्हें रेखाचित्रों के माध्यम से रचनात्मक बनना चाहिए।
    • वर्तमान में सभी सरकारी व गैर सरकारी विद्यालयों में विद्यालय प्रबंधन समितियाँ होती है उसके सदस्य शिक्षक भी होते है व उससे संबंधित Notice, आदेश, उसकी नीतियाँ व योजनाओं को लिखित रूप से ही संप्रेंषित किया जाता है।
    • सामान्यतः पूरी कक्षा को दिये जाने वाले निर्देश लिखित सम्प्रेषण के माध्यम से संप्रेषित किये जाते है- जैसे पाठ के अंत में शिक्षक द्वारा लिखकर ही गृहकार्य दिया जाता है।
    • अभिभावकों व शिक्षकों के मध्य सम्प्रेषण लिखित रूप से होता है। विद्यार्थियों की अधिगम संबंधि समस्याओं व विद्यालय में उसके व्यवहार से संबंधित संदेश, सूचनाएँ लिखित रूप से शिक्षक ही अभिभावकों को संप्रेषित करता है।
    • सामान्यतः विद्यालय के अन्दर प्रधानाध्यापक, शिक्षकों, उच्च अधिकारियों व अभिभावकों व प्रबंध समिति के सदस्यों के बीच सम्प्रेषण लिखित संदेशों द्वारा होता है। उन्हें Circulars, आदेश, Minutes, प्रतिवेदन आदि नाम दिए जाते है।

 परिपत्र (Circulars)

  • विद्यालयों में परिपत्रों के द्वारा सम्प्रेषण होता है। Circular लिखित सम्प्रेषण के माध्यम होते है। विद्यालय प्रबंधन में परिपत्रों का अत्यधिक महत्व होता है। क्योंकि इनके द्वारा ही संस्था प्रधान व अन्य उच्च अधिकारी अपने अधीनस्थों से लिखित रूप में सम्पे्रषण करते है। 
  • जब एक ही प्रकार की सूचना को किसी समूह में सम्प्रेषित करना  हो तब Circulars या परिपत्रों का प्रयोग किया जाता है।
  • Circulars समजजमते के द्वारा समय तथा धन की बचत होती है। विद्यालयों में भी इस प्रकार के परिपत्रों का उपयोग लिखित सम्प्रेषण के रूप में किया जाता है। जैसे विद्याालय के प्राचार्य के Senior teacher की meeting बुलानी है तो वो सबसे व्यक्तिगत रूप से न मिल कर एक परिपत्र के माध्यम से उन्हे इसकी जानकारी इस परिपत्र के माध्यम से उन्हे इसकी जानकारी देते है, उद्ददेश्य, समय व अन्य जानकारी इस परिपत्र द्वारा संप्रेषित की जाती है। यह एक सूचनात्मक पत्र होता है।


सूचना पत्र (Notice)

    किसी महत्वपूर्ण जानकारी से सम्बधिंत व्यक्ति समुह को अवगत कराने के लिए सूचना पत्रों या notice के माध्यम से सम्प्रेषण किया जाता है।

    सूचना पत्र वह सम्पे्रषण का माध्यम है जिससे किसी व्यक्ति समूह को हो चुकी घटना के बारे में नवीनम जानकारी व होने वाले कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी जाती है।

  • नोटिस में सबसे ऊपर heading आता है, नोटिस सदैव कम से कम शब्दों मे अधिक से अधिक जानकारी देने का प्रयास करता है।
  • नोटिस में नीचे notice भेजने वाले यानि विद्यालय में प्राचार्य होता है उनके हस्ताक्षर तथा दिनांक का होना आवश्यक होता है।
  • नोटिस को किसी public place/Notice बोर्ड पर लगाया जाता है।


आदेश पत्र (Order)

कार्यलय आदेश लिखित सम्पे्रषण का ऐसा माध्यम जो किसी सक्षम अधिकारी द्वारा ही किसी व्यक्ति या व्यक्ति समुह को उनके कार्य, समय, कार्य में सुधार व अन्य गतिविधियों को निर्देशित करने के लिए आदेश पत्रों का प्रयोग किया जाता है।

अ. ये आदेशात्मक कार्यवाही से सम्बन्धित होता है।

ब. इस पत्र के अन्त में उच्चअधिकारी के हस्ताक्षर तथा अन्य  सम्बन्धित,अधिकारियों के approval की जानकारी दी जाती है।

स. इसे व इससे दिए गए निर्देशों को मानने के लिए सम्बधिंत व्यक्ति बाध्य होती है अन्यथा उनके खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है।


प्रतिवेदन(Report)

    विद्यालय की गतिविधियों क बारे में संबंधित शिक्षक अन्य विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्य वार्षिक या अर्द्धवार्षिक एक प्रतिवेदन या Report तैयार करते है, प्रतिवेदन में विद्यालय में हुई गतिविधियों तथा कार्यकलापों का विवेचन किया जाता है। तथा इसके अतिरिक्त शैक्षिक वातावरण व भौतिक समस्याओं व गुणवत्ता का आंकलन किया जाता है तथा अनुशखाएँ तथा सुझाव भी दिए जाते है।

    वर्तमान में विद्यालयों में एक प्रभावी प्रतिवेदन तैयार करने में शिक्षकों की भी अति महत्वपूर्ण तैया करने में शिक्षकों की भी अति महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। प्रतिवेदन लिखित सम्प्रेषण का उत्तम माध्यम होता है, जिसके माध्यम से सम्बन्धित विषय की विस्तृत जानकारी व सुझाव सम्प्रेषित किये जा सकते है।

विवरण (Minutes)

विद्यालय में होने वाले लिखित सम्प्रेषण में Minutes(Meeting Minutes) का भी अति महत्वपूर्ण स्थान होता है। विद्यालय प्रबंधन व प्रशासन को सूचारू रूप से संचालित करने के लिए समय-समय पर गोष्ठियों (Meetings) के उद्देंश्यों विद्यालय संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों लिए गए, निर्णयों, सदस्यों द्वारा दिए सुझावों आदि सभी घटनाक्रमों का लिखित विवरण ही Minutes कहलाता है।

अ. संगोष्ठि (बैठक) विवरण में यह भी लिखा जाता है कि एक ही विषय पर पहले भी बैठके हो चुकी हो तो पिछली बैठकों के मिनट्स को भी ध्यान में रखा जाता है।

ब. Meeting Minutes- में सभापति तथा अन्य उपस्थित सदस्यों के बारे में भी जानकारी लिखी जाती है।

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Dr. D R BHATNAGAR 

सम्मेलन / कॉन्फ़्रेंस (Conference)

  सम्मेलन / कॉन्फ़्रेंस ( Conference) 1. परिभाषा ( Definition):      कॉन्फ़्रेंस एक औपचारिक और संगठित सभा होती है , जिसमें किसी विशेष वि...