बुधवार, 19 मई 2021

पाठ्यचर्या का अर्थ और आवश्यकता

पाठ्यचर्या का अर्थ और आवश्यकता
Meaning & need of curriculum


पाठ्यचर्या का शाब्दिक अर्थ:-

पाठ्यचर्या दो शब्दों से मिलकर बना है “पाठ्य” और “क्रम”। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि “पाठ का क्रम” अर्थात किसी कक्षा के लिए सभी विषयों, उपविषय (टॉपिक) तथा उससे संबंधित शिक्षण सामग्री का सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुतीकरण “पाठ्यचर्या” कहलाता है।

    पाठ्यचर्या शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘करीक्यूलम’ (Curriculum) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। ‘करीक्यूलम’ शब्द लैटिन भाषा से अंग्रेजी में लिया गया है तथा यह लैटिन शब्द ‘कुर्रेर’ से बना है। ‘कुर्रेर’ का अर्थ है ‘दौड़ का मैदान’। दूसरे शब्दों में, ‘करीक्यूलम’ वह क्रम है जिसे किसी व्यक्ति को अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचने के लिए पार करना होता है। अतः पाठ्यचर्या वह साधन है, जिसके द्वारा शिक्षा व जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति होती है। यह अध्ययन का निश्चित एवं तर्कपूर्ण क्रम है, जिसके माध्यम से शिक्षार्थी के व्यक्तित्व का विकास होता है तथा वह नवीन ज्ञान एवं अनुभव को ग्रहण करता है।

 बबिट महोदय के अनुसार - ‘‘उच्चतर जीवन के लिए प्रतिदिन और चैबीस घण्टे की जा रही समस्त क्रियायें पाठ्यचर्या के अन्तर्गत आ जाती है।’’

वाल्टर एस. मनरो के शब्दकोष के अनुसार - ‘‘पाठ्यचर्या को किसी विद्यार्थी द्वारा लिये जाने वाले विषयों के रूप में परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। पाठ्यचर्या की कार्यात्मक संकल्पना के अनुसार इसके अन्तर्गत वह सब अनुभव आ जाते है जो विद्यालय में शिक्षा के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयुक्त किये जाते है।’’

इस संकल्पना के अनुसार पाठ्यचर्या विकास के अन्तर्गत प्रयुक्त किये जाने वाले अनुभवों के आयोजन में पाठ्यचर्या को व्यवस्थित करने, उसे क्रियान्वित करने तथा उसका मूल्यांकन करने सम्बन्धी पक्ष सम्मिलित होते है।

ब्लांडस के शिक्षा कोष के अनुसार - ‘‘पाठ्यचर्या को क्रिया एवं अनुभव के परिणाम के रूप में समझा जाना चाहिए न कि अर्जित किये जाने वाले ज्ञान और संकलित किये जाने वाले तथ्यों के रूप में। विद्यालय जीवन के अन्तर्गत विविध प्रकार के कलात्मक, शारीरिक एवं बौद्धिक अनुभव तथा प्रयोग सम्मिलित रहते है

राबर्ट एम. डब्ल्यू. ट्रेवर्स से अपनी पुस्तक ‘इण्ट्रोक्शन टू रिसर्स’ में पाठ्यचर्या की गत्यात्मकता पर बल देते हुए लिखा है- ‘‘एक शताब्दी पूर्व पाठ्यचर्या की संकल्पना उस पाठ्य-सामग्री का बोध कराती थी जो छात्रों के लिए निर्धारित की जाती थी, परन्तु वर्तमान समय में पाठ्यचर्या की संकल्पना में परिवर्तन आ गया है। यद्यपि प्राचीन संकल्पना अभी भी पूर्णरूपेण लुप्त नहीं हुई है, लेकिन अब माना जाने लगा है कि पाठ्यचर्या की संकल्पना में छात्रों की ज्ञान - वृद्धि के लिए नियोजित सभी स्थितियाँ, घटनायें तथा उन्हें उचित रूप में क्रमबद्ध करने वाले सैद्धांतिक आधार समाहित रहते है।’’

सी.वी. गुड द्वारा सम्पादित शिक्षा कोष में पाठ्यचर्या की तीन परिभाषायें दी गई है, जो इस प्रकार है -

‘‘अध्ययन के किसी प्रमुख क्षेत्र में उपाधि प्राप्त करने के लिए निर्धारित किये गये क्रमबद्ध विषयों अथवा व्यवस्थित विषय-समूह को पाठ्यचर्या के नाम से अभिहित किया जाता है।’’

‘‘किसी परीक्षा को उत्तीर्ण करने अथवा किसी व्यावसायिक क्षेत्र में प्रवेश के लिए किसी शिक्षालय द्वारा छात्रों के लिए प्रस्तुत विषय-सामग्री की समग्र योजना को पाठ्यचर्या कहते है।’’

‘‘व्यक्ति को समाज में समायोजित करने के उद्देश्य से विद्यालय के निर्देशन में निर्धारित शैक्षिक अनुभवों का समूह पाठ्यचर्या कहलाता है।

कनिंघम के अनुसार ‘‘पाठ्यचर्या कलाकार (शिक्षक) के हाथ में एक साधन है जिससे वह अपनी सामग्री (शिक्षार्थी) को अपने आदर्श (उद्देश्य) के अनुसार अपनी चित्रशाला (विद्यालय) में ढाल सके।’’

डीवी के अनुसार-’’सीखने का विषय या पाठ्यचर्या, पदार्थो, विचारों और सिद्धांतों का चित्रण है जो निरंतर उद्देश्यपूर्ण क्रियान्वेषण से साधन या बाधा के रूप में आ जाते हैं।’’

सैमुअल के अनुसार -’’पाठ्यचर्या में शिक्षार्थी के वे समस्त अनुभव समाहित होते हैं जिन्हें वह कक्षाकक्ष मे, प्रयोगशाला में, पुस्तकालय में, खेल में मैदान में, विद्यालय में सम्पन्न होने वाली अन्य पाठ्येतर क्रियाओं द्वारा तथा अपने अध्यापकों एवं साथियों के साथ विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम से प्राप्त करता है।’’

होर्नी के शब्दों में -’’पाठ्यचर्या वह है जो शिक्षार्थी को पढ़ाया जाता ह। यह सीखने की क्रियाओं तथा शान्तिपूर्वक अध्ययन करने से कहीं अधिक है। इसमें उद्योग, व्यवसाय, ज्ञानोपार्जन, अभ्यास तथा क्रियायें सम्मिलित होती है। इस प्रकार यह विद्यार्थी के स्नायुमण्डल में होने वाले गतिवादी एवं संवेदनात्मक तत्वों को व्यक्त करता हैं समाज के क्षेत्र में यह उन सब की अभिव्यक्ति करता है जो कुछ जाति ने संसार के सम्पर्क में आने से किये हैं।’’

माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार -’’पाठ्यचर्या का अर्थ केवल उन सैद्धान्तिक विषयों से नहीं है जो विद्यालयों में परम्परागत रूप से पढ़ाये जाते हैं, बल्कि इसमें अनुभवों की वह सम्पूर्णता भी सम्मिलित होती है, जिनको विद्यार्थी विद्यालय, कक्षा, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, कार्यशाला, खेल के मैदान तथा शिक्षक एवं छात्रों के अनेक अनौपचारिक सम्पर्को से प्राप्त करता है। इस प्रकार विद्यालय का सम्पूर्ण जीवन पाठ्यचर्या हो जाता है जो छात्रों के जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करता है और उनके संतुलित व्यक्तित्व के विकास में सहायता देता है।

वेण्ट और क्रोनोबर्ग के अनुसार -’’पाठ्यचर्या का पाठ्यवस्तु का सुव्यवस्थित रूप है जो बालकों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु तैयार किया जाता है।’’

फ्रोबेल के मतानुसार -’’पाठ्यचर्या सम्पूर्ण मानव जाति के ज्ञान एवं अनुभव का प्रतिरूप होना चाहिए।’’

    पाठ्यचर्या की उपरोक्त सभी परिभाषाओं का विवेचन करने के बाद निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि पाठ्यचर्या का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। यह छात्र के जीवन के सभी पहलुओं को स्पष्ट करता है फिर चाहे वह शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय, बौद्धिक या नैतिक किसी से भी जुड़े हो। वर्तमान समय में पाठ्यचर्या शिक्षकों को गॉड स्थान देकर तथा विद्यार्थी की क्षमताओं एवं अभिरुचियों को केंद्र में रखकर बनाया जाता है।

    इसका ध्येय बालक का सर्वांगीण विकास करना एवं बालक को इस योग्य बनाना होता है कि वह अपने साथ साथ अपने समाज समुदाय व देश का भी विकास व उद्धार कर सके।

प्रत्येक विद्यालय में शिक्षा के निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कुछ विशेष साधनों का उपयोग किया जाता है। पाठ्यचर्या भी एक ऐसा ही साधन है जिसकी सहायता से प्रत्येक विद्यार्थी को उसके समय के सदुपयोग एवं ज्ञानार्जन की दिशा में सजग रखा जा सकता है। इसके साथ ही साथ शिक्षकों को भी उनके कर्तव्यों की पूर्ति हेतु सही दिशा मिलती रहती है।

इस प्रकार शिक्षा की प्रक्रिया में पाठ्यचर्या का विशेष महत्व है। पाठ्यचर्या ही संपूर्ण शिक्षण क्रिया का आधार होता है। पाठ्यचर्या के अभाव में शिक्षण कार्य न तो सफलतापूर्वक संपन्न हो सकता है और न ही अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि शैक्षिक प्रक्रिया में पाठ्यचर्या केंद्र बिंदु का कार्य करता है, जिसके चारों ओर शिक्षक एवं शिक्षार्थीगण अपने कर्तव्यों की पूर्ति व उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

पाठ्यचर्या की आवश्यकता Need of Curriculum

    पाठ्यचर्या के द्वारा ही विद्यालय का कार्य संगठित व संतुलित रूप से चल सकता है। पाठ्यचर्या का आवश्यकता व महत्व उसके द्वारा संपादित किए जाने वाले कार्यों के रूप में समझा जा सकता है। पाठ्यचर्या की आवश्यकता महत्व इस प्रकार है-

  • शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक
  • शिक्षण सामग्री के निर्धारण में सहायक
  • शिक्षण विधियों के निर्धारण में सहायक
  • विषय सामग्री के विभाजन में सहायक
  • चरित्र निर्माण में सहायक
  • व्यक्तित्व के विकास में सहायक
  • अनुसंधान एवं अविष्कार में सहायक
  • दर्शन एवं शिक्षा की प्रवृत्तियों को दर्शाने में सहायक
  • तत्कालीन घटनाओं के ज्ञान में सहायक

1. शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक
    प्रत्येक अवधारणा का निर्माण कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। उद्देश्यों के अभाव में कोई भी प्रक्रिया सही मार्ग पर नहीं चल सकती है। शिक्षण प्रक्रिया के संबंध में भी यह बात सत्य सिद्ध होती है। बिना उद्देश्यों के चलने वाली शिक्षण प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार होती है जैसे पतवार के बिना नाव।
    इन उद्देश्यों को प्राप्त करने में पाठ्यचर्या ही सहायता करता है। यह एक ऐसा साधन है जिसके माध्यम से हम शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं तथा उपयुक्त पाठ्यचर्या के अभाव में हम शिक्षा के उद्देश्य प्राप्त करने के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
2. शिक्षण सामग्री के निर्धारण में सहायक
    प्रत्येक विद्यालय में शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय सारणी का निर्माण किया जाता है। जिसके अंतर्गत प्रत्येक विषय के लिए निश्चित समय का आवंटन किया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक विषय एवं विषय वस्तु का शिक्षा प्रक्रिया में विशेष महत्व है।
    शिक्षक व शिक्षार्थी विषय वस्तु या अध्ययन वस्तु से अनभिज्ञ रहते हैं तथा इस बात का उन्हें ज्ञान नहीं होता कि उन्हें क्या पढ़ना है, तब तक वह अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा भी प्राप्त नहीं कर सकते। इस प्रकार पाठ्यचर्या ही शिक्षण सामग्री के निर्धारण में सहायक होता है।
3. शिक्षण विधियों के निर्धारण में सहायक
    सफल शिक्षण के लिए यह आवश्यक है कि अध्यापक को उचित शिक्षण विधियों का ज्ञान हो। यह ज्ञान अध्यापक को पाठ्यचर्या ही प्रदान करता है। पाठ्यचर्या ही विभिन्न कक्षाओं के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षण सामग्री ओं का निर्धारण करता है तथा उन विभिन्न प्रकार की शिक्षण सामग्रियों के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षण विधियों का निरूपण करता है। प्रत्येक विषय को पढ़ाने के लिए अलग-अलग प्रकार की शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाता है। पाठ्यचर्या के अभाव में शिक्षक को इस बात का ज्ञान नहीं हो सकता है कि किस कक्षा में किस प्रकार की विषय वस्तु को किस विधि से पढ़ाना है। इस प्रकार पाठ्यचर्या शिक्षण विधियों के निर्धारण में सहायक होता है।
4. विषय सामग्री के विभाजन में सहायक
    पाठ्यचर्या की विषय सामग्री का निर्धारण करता है तथा साथ ही साथ इस बात का भी निर्धारण करता है कि वह विषय वस्तु विभिन्न स्तरों के अनुरूप किस प्रकार की हो। पाठ्यचर्या छोटी कक्षाओं के लिए सरल व रोचक विषय वस्तु का सुझाव देता है।     माध्यमिक कक्षाओं के लिए तर्कपूर्ण व ज्ञानवर्धक अध्ययन वस्तु का निर्देशन करता है तथा कुछ कक्षाओं के लिए गहन व चिंतनशील तथा प्रयोगात्मक अध्ययनक्रम की रूपरेखा रखता है। विभिन्न स्तरों के अनुरूप विषय वस्तु का विभाजन वैज्ञानिक एवं उचित ढंग से करने में पाठ्यचर्या ही सहायता करता है। पाठ्यचर्या के अभाव में ऐसा तर्क सम्मत विभाजन होना संभव नहीं है।
5. चरित्र निर्माण में सहायक
    पाठ्यचर्या एक व्यापक व वृहद अवधारणा है। इसके अंतर्गत केवल पाठ्य विषय ही नहीं बल्कि विभिन्न पाठ्य सहायक गतिविधियां व पाठ्येत्तर क्रियाकलाप भी सम्मिलित होते हैं। इसके अंतर्गत अनेक खेलों का आयोजन, एनसीसी व स्काउटिंग का निर्धारण तथा विभिन्न पर्वों का विशेष महत्व के दिवसों का आयोजन किया जाता है।
जिसका उद्देश्य बालकों का चरित्र निर्माण एवं उचित नागरिकता का विकास करना है। इस प्रकार उचित पाठ्यचर्या चरित्र विकास में सहायक होता है। दूसरे शब्दों में चरित्र निर्माण व नागरिकता के लिए उत्तम गुणों का विकास पाठ्यचर्या के द्वारा ही संभव है।
6. व्यक्तित्व के विकास में सहायक
    बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने में पाठ्यचर्या अपना पूर्ण योगदान करता है। व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू होते हैं यथा शारीरिक मानसिक सामाजिक बौद्धिक नैतिक आध्यात्मिक व्यावसायिक तथा सांस्कृतिक आदि।
    पाठ्यचर्या विभिन्न खेलकूद की प्रवृत्तियों द्वारा शारीरिक विकास करता है। विभिन्न पाठ्य सहायक गतिविधियों द्वारा नैतिक आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विकास करता है तथा आवश्यक विषयों के ज्ञान एवं सही दिशा निर्देशन के द्वारा व्यावसायिक विकास करता है। इस प्रकार पाठ्यचर्या बालक के व्यक्तित्व के विकास में सहायता करता है।
7. अनुसंधान एवं आविष्कार में सहायक
    जैसा कि हमें पूर्वविदित है, पाठ्यचर्या केवल अध्ययन वस्तु तक ही सीमित न होकर एक व्यापक अवधारणा है। वर्तमान पाठ्यचर्या में बालक को केंद्र बनाकर भावी जीवन की तैयारी के उद्देश्य से सभी आवश्यक कार्यक्रमों को संगठित किया जाता है। यह जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करके उनके संतुलित विकास में सहायता करता है।
    पाठ्यचर्या उन अनुभवों क्रियाओं तथा जीवन की उन परिस्थितियों का योग है जिनके माध्यम से बालक ज्ञान अर्जित करता है। पाठ्यचर्या उच्च स्तर पर छात्रों का अनुसंधान एवं नित्य नवीन खोज करने के लिए विषय वस्तु, क्षमता एवं पूर्ण सहयोग प्रदान करता है।
8. दर्शन और शिक्षा की प्रवृत्तियों को दर्शाने में सहायक
    भारत देश में अनेकों दर्शन की धाराएं प्रचलन में रही है। अनेकों दार्शनिक शिक्षक भी रहे हैं। जिनमें महात्मा गांधी, अरविंदो, रविंद्र नाथ टैगोर आदि। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपने महत्वपूर्ण दार्शनिक विचार रखे। इन्होंने अपने विचारों द्वारा बालकों के लिए पाठ्यचर्या की अवधारणा का निरूपण किया, जिसमें इनके दार्शनिक विचारों की झलक प्राप्त होती है।
    इसी प्रकार वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक, गुलामी के समय तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शिक्षा व्यवस्था विभिन्न परिवर्तनों से गुजरी है, उन सब की भी झलक हमें पाठ्यचर्या द्वारा प्राप्त होती है। इस प्रकार पाठ्यचर्या शिक्षा की विभिन्न प्रवृत्तियों तथा विभिन्न दर्शनों के परिवर्तनों को दर्शाता है।
9. तत्कालीन घटनाओं के ज्ञान में सहायक
    वर्तमान युग में औद्योगिककरण का युग है। विज्ञान व तकनीकी अपने चरम पर है। देशों के मध्य की दूरियां घट रही हैं व उनके मध्य अनेकों संबंध व समझौते हो रहे हैं। विकसित व विकासशील दोनों ही प्रकार के देश अपने आप को सक्षम बनाने में जुटे हुए हैं। ऐसे में आज के युवक-युवतियों के लिए यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि उन्हें वर्तमान युग की तत्कालीन घटनाओं का पूर्ण व सटीक ज्ञान हो।
    उद्देश्यों की प्राप्ति वर्तमान पाठ्यचर्या के द्वारा की जा सकती है। अपने सामाजिक व भौतिक वातावरण की समझ प्रदान करने के लिए अनेकों विषयों व पाठ्येत्तर क्रियाओं का सहारा लिया जाता है, देश विदेश की विभिन्न घटनाओं से अवगत कराया जाता है, तथा पाठ्यचर्या के द्वारा उन्हें प्रत्येक भौतिक व सामाजिक परिस्थितियों से परिचित कराया जाता है। ताकि बालक अपने आप को तेजी से बदलते हुए भौतिक परिवेश में ढाल सके तथा भावी जीवन के लिए तैयार होकर अपने देश व समाज को सक्षम बना सके।

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ज्ञान के वर्गीकरण के आधार

ज्ञान के वर्गीकरण के आधार

 Basis of Categorization of Knowledge 




ज्ञान के वर्गीकरण की प्रक्रिया को किस आधार पर सम्पन्न किया जाय यह एक महत्त्वपूर्ण विषय है । ज्ञान का वर्गीकरण ज्ञान की भाँति एक व्यापक एवं जटिल प्रक्रिया है । इसके लिये उन आधारों का चुनाव करना चाहिये जिससे यह वर्गीकरण सफल माना जा सके । आज प्रत्येक अभिभावक विद्यालय एवं विद्यालयी ज्ञान से यह अपेक्षा करता है कि उसके बालक का सर्वांगीण विकास हो तथा बालक को समाज , राष्ट्र एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त हो । ज्ञान का वर्गीकरण उन सभी अपेक्षाओं एवं मान्यताओं के आधार पर होना चाहिये जिससे कि वह समग्र रूप में प्रस्तुत किया जा सके । ज्ञान के वर्गीकरण को समग्र एवं त्रुटिरहित बनाने के लिये ही इसमें समय - समय पर सुधार किये जाते हैं । इस प्रकार ज्ञान के वर्गीकरण को निम्नलिखित आधारों पर प्रस्तुत किया जाना चाहिये जिससे कि इस वर्गीकरण पर एक समग्र एवं सार्वभौमिक पाठ्यक्रम तैयार किया जा सके

 1. दार्शनिक आधार ( Phisolosophical basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण का प्रमुख आधार दार्शनिक विचारधाराओं को माना जाता है । दार्शनिक विचारधाराओं का अस्तित्व समाज में हो या न हो परन्तु ज्ञान के विकास एवं संगठन में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है । वर्तमान में एक छात्राध्यापक को आदर्शवाद , प्रकृतिवाद एवं प्रयोजनवादी विचारधाराओं का ज्ञान प्रदान किया जाता है । इसका उपयोग करके छात्राध्यापक द्वारा छात्रों के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त किया जाता है । यदि एक छात्र से आदर्शों को निष्कासित कर दिया जाय तो उसका ज्ञान घातक सिद्ध होगा ; जैसे- आतंकवादी संगठनों के पास आदर्श रहित ज्ञान होता है जिसका उपयोग वह हिंसा के लिये करते हैं । यदि उनके ज्ञान में आदर्शों को डाल दिया जाय तो वही आतंकवादी ज्ञान का सदुपयोग करके गरीबों की रक्षा करेंगे । अतः प्रत्येक स्थिति में दार्शनिक विचारधाराओं को उनकी आवश्यकता , उपयोगतििा एवं समसामयिकता के आधार पर स्थान प्राप्त होना चाहिये । इससे ज्ञान का वर्गीकरण समग्र एवं सार्वभौमिक बन सकेगा । 

2. सामाजिक आधार ( Social basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण की प्रक्रिया सामाजिक

मान्यताओं एवं परम्पराओं के आधार पर सम्पन्न की जानी चाहिये ; जैसे- भारतीय समाज में प्रत्येक अभिभावक अपने बालकों को सामाजिक कुशलता प्रदान करने के लिये विद्यालय में भेजता है जिससे उसको समाज में सम्मान प्राप्त हो सके । इस आधार पर विद्यालय में पाठ्यक्रम का स्वरूप एवं विषयों का वर्गीकरण भी उस रूप में होना चाहिये जो कि सामाजिक नियम एवं परम्पराओं के अनुरूप हो । इस आधार पर ही पाठ्यक्रम में उन कहानियों , कविताओं एवं निबन्धों को सम्मिलित किया जाता है जो कि सामाजिक गुणों एवं मूल्यों की शिक्षा प्रदान करते हैं । अत : ज्ञान का वर्गीकरण सामाजिक सन्दर्भ में किया जाना चाहिये । 

3. राजनीतिक आधार ( Political basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण में राजनीतिक व्यवस्था एवं नीतियों को भी ध्यान में रखना चाहिये ; जैसे- भारतीय राजनीतिक व्यवस्था प्रजातान्त्रिक मूल्यों पर आधारित है तो भारतीय विद्यालयों में समानता एवं स्वतन्त्रता पर आधारित शिक्षा प्रदान की जाती है । शैक्षिक अवसरों की समानता एवं सार्वभौमीकरण शिक्षा की व्यवस्था सरकार द्वारा की जा रही है । इस आधार पर ही ज्ञान का वर्गीकरण एवं पाठ्यक्रम का स्वरूप निश्चित किया जा रहा है । राजनीतिक व्यवस्था में सभी व्यक्ति ज्ञान के व्यापक प्रचार - प्रसार के लिये वचनबद्ध है तो निश्चित रूप से इन सभी तथ्यों पर ज्ञान के वर्गीकरण में ध्यान देन की आवश्यकता होगी । 

4. प्राकृतिक आधार ( Natural basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण में प्राकृतिक व्यवस्था को भी सम्मिलित करना चाहिये । प्राकृतिक व्यवस्था में प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का उपयोग वर्गीकरण में उचित रूप में किया जाना चाहिये ; जैसे- प्राथमिक स्तर पर छात्रों को प्राकृतिक पर्यावरण सम्बन्धी ज्ञान प्रदान किया जाता है तथा उनको बताया जाता है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किस प्रकार करना चाहिये तथा ये संसाधन हमारे लिये किस प्रकार से उपयोगी हैं । इस प्रकार के ज्ञान को पृथक् विषय पर्यावरणीय शिक्षा , परिवेशीय शिक्षा एवं प्राकृतिक संसाधनों सम्बन्धी शिक्षा आदि रूपों में विभक्त करना चाहिये । इस प्रकार ज्ञान के वर्गीकरण में प्राकृतिक व्यवस्था पर पूर्ण ध्यान देना चाहिये । 

5. आर्थिक आधार ( Economic basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण को आर्थिक आधार पर प्रस्तुत करना चाहिये । ज्ञान के विविध रूप आर्थिक विकास से सम्बन्धित होते हैं । वर्तमान भौतिकवादी युग में अर्थ को प्रधानता प्रदान की जाती है । इसलिये विशेष औद्योगिक व्यवस्था के सन्दर्भ में ज्ञान को वर्गीकृत रूप में प्रस्तुत करना चाहिये ; जैसे- प्राथमिक स्तर पर छात्रों को विविध प्रकार के उद्योग - धन्धों का ज्ञान प्रदान किया जाता है जिससे वह समझ सके कि औद्योगिक विकास जीवन में रोजगार तथा धनार्जन के लिये आवश्यक है । इस आधार पर छात्र ज्ञान को रुचिपूर्ण ढंग से स्वीकार करेंगे । इसलिये ज्ञानात्मक पक्ष का वर्गीकरण औद्योगिक व्यवस्था एवं आर्थिक व्यवस्था के सन्दर्भ में व्यापक रूप से प्रस्तुत करना चाहिये ।

 6. नैतिक आधार ( Moral basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण का प्रमुख आधार नैतिकता को माना जाता है । समाज में नैतिकता की स्थिति सर्वोच्च रूप में होने पर समाज का कल्याण होता है । इसी आधार पर समाज का उन्नयन होता है ; जैसे- प्राचीनकाल में समाज में नैतिकता थी । समाज में भ्रष्टाचार कम था । आज समाज में नैतिकता का अभाव है तो भ्रष्टाचार अधिक है । इस आधार को ध्यान में रखते हुए आज भी छात्रों को प्राथमिक स्तर से ही नैतिक शिक्षा को अनिवार्य रूप से प्रदान किया जाता है जिसमें बालक के कोमल मन में नैतिक दायित्वों का समावेश सम्भव होता है । 

7. मानवीय आधार ( Human being basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण का प्रमुख आधार मानवीय आवश्यकता एवं विकास होना चाहिये । प्राय : इस आधार पर ही ज्ञान को वर्गीकृत रूप प्रदान किया जाता है जिससे मानव अपनी आवश्यकता एवं रुचि के अनुरूप ज्ञान की प्राप्ति कर सके ; जैसे - विज्ञान में रुचि रखने वाले छात्र विज्ञान विषय सम्बन्धी ज्ञान को प्राप्त कर सकें तथा दर्शन में रुचि रखने वाले छात्रों द्वारा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया जा सके । इसके साथ - साथ ज्ञान के वर्गीकरण का आधार मानवीय गुणों के विकास को भी माना जाता है । विश्व बन्धुत्व एवं भाईचारे के विकास से सम्बन्धित गुणों को ज्ञान वर्गीकरण का प्रमुख आधार बनाया जाता है । इस प्रकार ज्ञान वर्गीकरण का प्रमुख आधार मानव को माना जाता है । 

8. आध्यात्मिक आघार ( Spiritual basis ) - भारतीय समाज एवं संस्कृति में आध्यात्मिकता का महत्त्वपूर्ण स्थान है । किसी भी छात्र का सर्वांगीण विकास उस स्थिति में ही पूर्ण होता है जब उसका आध्यात्मिक विकास सम्भव होता है । इसलिये ज्ञान के वर्गीकरण में आध्यात्मिक विषयों की श्रृंखला एवं साहित्य को पृथक् स्थान दिया गया है । प्राथमिक स्तर पर छात्रों को योग शिक्षा एवं नैतिक शिक्षा प्रदान करना छात्रों के आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया से सम्बन्धित माना जाता है । आध्यात्मिक ज्ञान के प्राप्त होने के पश्चात् मानव पशु से मानव बनता है । अत : ज्ञान के वर्गीकरण का आधार आध्यात्मिक व्यवस्था होना चाहिये । 

9. सार्वभौमिक आधार ( Universal basis ) – ज्ञान के वर्गीकरण के सार्वभौमिक आधार की प्रक्रिया का आशय ज्ञान में उन सभी तथ्यों एवं मान्यताओं को समाहित करने से है जो कि सम्पूर्ण विश्व में समानता से स्वीकार की जाती हैं ; जैसे- विश्व शान्ति के लिये ज्ञान , विश्व संस्कृति के लिये ज्ञान , सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय के लिये ज्ञान , अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के लिये ज्ञान , अन्तर्राष्ट्रीय विकास के लिये ज्ञान तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये ज्ञान आदि । इन सभी तथ्यों को ज्ञान का वर्गीकरण करते समय ध्यान में रखा जाय तो ज्ञान का वर्गीकरण सार्वभौमिक आधार पर सम्भव हो सकेगा । 

10. सांस्कृतिक आधार ( Cultural basis ) - सांस्कृतिक आधार का आशय ज्ञान के वर्गीकरण में उन सभी तथ्यों को ध्यान में रखने से है जो कि राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति से सम्बन्ध रखते हैं , जैसे- बालकेन्द्रित शिक्षा व्यवस्था , विद्यालय संस्कृति , विद्यालय जलवायु , वैश्विक परम्पराएँ , वैश्विक व्यवहार , वैश्विक स्तर पर विचार - विमर्श एवं वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय सम्मेलन आदि । इन सभी तथ्यों को ज्ञान के वर्गीकरण के समय ध्यान में रखा जाय तो ज्ञान का वर्गीकरण प्रभावी एवं उपयोगी रूप में सम्भव हो सकेगा । 

11. धार्मिक आधार ( Religious basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण का आधार धर्म भी होना चाहिये । प्राचीनकाल में शिक्षा धर्म की सहगामिनी थी । इस काल में व्यक्ति ईमानदार एवं कर्त्तव्यनिष्ठ था । आज धर्म निरपेक्षता की स्थिति में भ्रष्टाचार एवं कर्त्तव्य विमुखता की स्थिति व्यापक रूप से देखी जाती है । अतः धर्म ज्ञान का मूल तत्त्व है । ज्ञान के वर्गीकरण में सदैव ज्ञान के मूल तत्त्वों को ध्यान में रखना चाहिये ; जैसे - नर सेवा नारायण सेवा , अहिंसा , सहिष्णुता , दरिद्र नारायण का रूप है , सभी मनुष्य आदि शक्ति की सन्तान हैं तथा मनुष्य को मनुष्य के लिये जीवन समर्पित करना चाहिये आदि । इन सभी आधारों को ध्यान में रखकर किया गया वर्गीकरण सर्वश्रेष्ठ रूप में होगा । 

12. वैज्ञानिक आधार ( Scientific basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण में रूढ़िवादिता , अन्ध विश्वास एवं सामाजिक बुराइयों के पूर्ण समापन की व्यवस्था होनी चाहिये तथा स्वस्थ परम्पराओं एवं वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश होना चाहिये ; जैसे- प्राथमिक स्तर पर छात्रों के समक्ष सूर्य एवं चन्द्र को ग्रह के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तथा सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण को खगोलीय घटनाओं के रूप में स्वीकार किया जाता है । इससे सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण के सन्दर्भ में विविध प्रकार के भ्रमों को दूर किया जाता है । इस प्रकार छात्रों में प्रत्येक घटना के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करने वाले प्रसंगों को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करना चाहिये जिससे छात्रों में वैज्ञानिक अनुसन्धानों के प्रति रुचि उत्पन्न हो सके । 

13. विकासात्मक आधार ( Developmental basis ) -ज्ञान के वर्गीकरण का प्रमुख आधार विकास होना चाहिये । छात्रों के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया में ज्ञान की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है । जब छात्रों के लिये विद्यालय में सभी पक्षों के विकास से सम्बन्धित ज्ञान उपलब्ध होगा निश्चित रूप से छात्रों का सर्वांगीण विकास हो सकेगा । प्राथमिक स्तर से ही छात्रों के समक्ष उन गतिविधियों को प्रस्तुत किया जाता है जो कि उसके सर्वांगीण विकास से सम्बन्धित होती हैं .ज्ञान के स्वरूप और विद्यालयों में इनका संगठन जैसे - नैतिक शिक्षा , परिवेशीय शिक्षा , विज्ञान , गणित , योग शिक्षा एवं सांस्कृतिक शिक्षा आदि के विषय सम्बन्धी ज्ञात से सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त होता है । 

14. सृजनात्मकता सम्बन्धी आधार ( Creativity related basis ) - ज्ञान के वर्गीकरण का प्रमुख आधार सृजनात्मकता होनी चाहिये ज्ञान का प्रयोग सृजन के लिये ही किया जाता है । इसी आधार पर बालकों के अध्ययन के क्षेत्र का निर्माण किया जाता है । प्राथमिक स्तर पर ही बालकों को समाजोपयोगी उत्पादक कार्यों के रूप में मिट्टी के खिलौने बनाना सिखाया जाता है । वृक्षारोपण , उद्यान में स्वच्छता , विद्यालयी स्वच्छता तथा परिवेशी स्वच्छता से सम्बन्धित ज्ञान बालकों को प्रदान किया जाता है । इस प्रकार ज्ञान के माध्यम से बालकों में सृजनात्मकता का बीजारोपण किया जाता है । उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञान के वर्गीकरण के प्रमुख आधार प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा के उद्देश्यों एवं मानव के सर्वांगीण विकास से सम्बन्धित हैं । ज्ञान के क्षेत्र का वर्गीकरण इन आधारों पर करने से ज्ञान का स्वरूप उपयोगी एवं निरन्तर विकास की प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करेगा । ज्ञान के वर्गीकरण के आधारों में समसामयिक एवं आधुनिक तथ्यों के आधार पर परिवर्तन भी हो जाते हैं । 

जानने में संस्कृति की भूमिका

जानने में संस्कृति की भूमिका 
The role of culture in knowing




        Culture शब्द के अर्थ पर विचार किया जाय तो इसका सम्बन्ध संस्कृति, शिष्टता, सम्वर्द्धन, संस्कार एवं सामूहिक व्यवस्था आदि से लिया जाता है। Knowing शब्द के अर्थ का विचार किया जाय तो इसका अर्थ सुविचारित, जानकार, जानते हुए, सुशिक्षित , जानना, जान - बूझकर की गयी क्रिया एवं भिज्ञ आदि से लिया जाता है। दोनों ही शब्द व्यापक रूप में अपने अर्थ को प्रकट करते हैं। वास्तविक रूप से संस्कृति का सम्बन्ध जानने की प्रक्रिया या ज्ञान की प्रक्रिया से होता है क्योंकि जानने की प्रक्रिया का प्रमुख आधार संस्कृति ही होती है।
आज भले ही बालकेन्द्रित शिक्षा व्यवस्था का युग हो परन्तु भारतीय संस्कृति में शिक्षक को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया जाता है। अतः ज्ञान की प्रक्रिया या जानने की प्रक्रिया हमारे मानवीय मूल्यों, सामाजिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित होती है। संस्कृति के अन्तर्गत विद्यालयी संस्कृति को भी सम्मिलित किया जाता है। विविध प्रकार की सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के जानने की प्रक्रिया या ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया पर निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं- 
1- जानने की प्रक्रिया में सामाजिक संस्कृति की भूमिका 
(Role of social culture in knowing)- 
जानने की प्रक्रिया में सामाजिक संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि विद्यालयी व्यवस्था, शिक्षा के उद्देश्य एवं शिक्षा के विषयों का निर्धारण सामाजिक संस्कृति पर निर्भर करता है। प्राचीनकाल में समाज का सम्बन्ध वेदों से था तो छात्रों को वेदों को जानने के लिये प्रेरित किया जाता था। इसी क्रम में धर्म की शिक्षा को महत्त्व दिया जाता था। वर्तमान समय में विद्यालयों में धर्म की शिक्षा वर्जित है क्योंकि सामाजिक व्यवस्था में धर्म के स्थान पर भौतिकता का प्रभाव है। अत : सामाजिक संस्कृति अपने स्वरूप की पहचान कराने के लिये शिक्षा एवं शिक्षालयों का सहारा लेती है। इसका एक उदाहरण यह भी है कि वर्तमान समय में वह ज्ञान श्रेष्ठ माना जाता है जो कि धन कमाने से सम्बन्धित होता है तथा भौतिक विकास के उपयोग में आता है।  
2. जानने की प्रक्रिया में विषयगत संस्कृति की भूमिका 
( Role of subject culture in knowing ) –
विषयगत संस्कृति का आशय विषय की प्रकृति से होता है; जैसे - विज्ञान विषय की संस्कृति में प्रयोग द्वारा विचार, परिकल्पना एवं मान्यताओं को सत्य सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है जबकि दार्शनिक विषय में मान्यताओं, परम्पराओं एवं सूत्रों को प्रमुख स्थान प्रदान किया जाता है। दर्शनशास्त्र एवं विज्ञान दोनों विषयों के उद्देश्य, शिक्षण विधियाँ एवं शिक्षण सामग्री पृथक् - पृथक् रूप में होती है। इसलिये इनके अधिगम या ज्ञान से सम्बन्धित गतिविधियाँ भी पृथक् - पृथक् रूप में होंगी। इस प्रकार विषयगत संस्कृति द्वारा भी ज्ञान की प्रक्रिया का स्वरूप एवं उससे सम्बन्धित विविध गतिविधियों का निर्धारण किया जाता है।  
3. विद्यालय संस्कृति की भूमिका ( Role of school culture ) –
विद्यालय संस्कृति का प्रभाव जानने की प्रक्रिया पर व्यापक रूप से देखा जाता है । विद्यालय की संस्कृति यदि आधुनिक शैक्षिक मूल्यों से प्रेरित है , शिक्षक की भूमिका छात्रों के लिये सुविधादाता के रूप में है , शिक्षक द्वारा छात्रों की शैक्षिक एवं अशैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है तथा छात्रों एवं शिक्षकों के मध्य उचित सम्प्रेषण व्यवस्था पायी जाती है तो ऐसी स्थिति में ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया या जानने की प्रक्रिया प्रभावी रूप में सम्पन्न होगी क्योंकि विद्यालय की संस्कृति से ही विद्यालय का वातावरण निर्मित होता है । जब विद्यालयी संस्कृति में ज्ञान प्राप्त का उद्देश्य निहित होगा तो निश्चित रूप से छात्रों को ज्ञान की प्राप्ति सरल एवं स्वाभाविक रूप में हो सकेगी । 
4. राजनीतिक संस्कृति की भूमिका ( Role of political culture ) – 
शिक्षा का अधिकार, 6 से 14 वर्ष के बालक - बालिकाओं के लिये निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा, बालिकाओं की शिक्षा व्यवस्था के अतिरिक्त सुविधा तथा शिक्षा का सार्वभौमीकरण उस राजनीतिक संस्कृति की ओर संकेत करते हैं जो कि शैक्षिक मूल्य एवं शैक्षिक व्यवस्था से प्रेरित है। इस प्रकार राजनीतिक संस्कृति जो कि शिक्षा से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित है जानने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है क्योंकि इस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति में नेतागण शिक्षित एवं समर्पित होते हैं। इस स्थिति में छात्रों को ज्ञान प्राप्ति के लिये समान एवं अधिकाधिक अवसरों की प्राप्ति होती है। 
5. आर्थिक संस्कृति की भूमिका ( Role of economic culture ) – 
आर्थिक संस्कृति के समाज में विविध प्रकार के रूप पाये जाते हैं। कुछ सामाजिक व्यवस्थाएँ अर्थ प्रधान होती हैं तथा भौतिक विकास को मान्यता देती है। कुछ सामाजिक व्यवस्थाएँ धन को मात्र साधन समझती हैं तथा ज्ञान को सर्वोच्च स्थान देती हैं। 'धन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग शिक्षा के लिये' जिस सामाजिक संस्कृति का मूल मन्त्र होता है उस समाज में ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया प्रभावी रूप में सम्पन्न होती है। जो संस्कृति शिक्षा या ज्ञान को धन कमाने का साधन मानती है उसमें जानने की प्रक्रिया उचित रूप में सम्पन्न नहीं हो पाती क्योंकि वहाँ ज्ञान का सम्बन्ध भौतिक विकास से होता है।
6. शैक्षिक संस्कृति की भूमिका ( Role of educational culture ) – 
शैक्षिक संस्कृति का स्वरूप भी जानने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है, जैसे- भारतीय समाज में शिक्षा का स्वरूप आदर्शवादी, नैतिकतावादी एवं मानवतावादी मूल्यों पर आधारित है। इसलिये शिक्षालयों में सभी बालक - बालिकाओं को समानता के साथ शिक्षा प्रदान की जाती तथा पाठ्यक्रम का स्वरूप आदर्श, मानवता एवं नैतिकता के आधार पर निर्धारित किया गया है। समाज का वातावरण भी शिक्षा के उद्देश्यों के अनुरूप होता है। इसलिये शिक्षा एवं समाज में सहयोग की स्थिति पायी जाती है क्योंकि इसके मूल में शैक्षिक संस्कृति की व्यापकता है।
7. धार्मिक संस्कृति की भूमिका ( Role of religious culture ) – 
जिस समाज में धार्मिक मान्यताओं एवं व्यवस्थाओं पर आधारित होती है, जैसे- भारतीय सांस्कृतिक व्यवस्था में धर्म का संस्कृति का प्रभाव होता है उस समाज में जानने की प्रक्रिया या ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया धार्मिक महत्त्वपूर्ण स्थान है इसलिये आज भी ज्ञान प्राप्ति के लिये गुरु का आवश्यकता होती है। गुरु का स्थान आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ईश्वर के समकक्ष माना जाता है। इस स्थिति में ज्ञान की प्रक्रिया में विविध प्रकार की कल्पनाओं एवं मान्यताओं का समावेश हो जाता है जो कि आधुनिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं होती हैं। 
8. दार्शनिक संस्कृति की भूमिका ( Role of philosophical culture ) – 
दार्शनिक संस्कृति की ज्ञान प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है; जैसे- भारतीय शिक्षा में अनेक प्रकार की दार्शनिक विचारधाराओं का समावेश है। इन विचारधाराओं में कुछ विचारधाराएँ प्रयोजनवादी दृष्टिकोण एवं वैज्ञानिक विचारों से सम्बन्धित हैं तो कुछ विचारधाराएँ आदर्शवादिता से सम्बन्धित हैं। प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा के अनुसार ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया पृथक् - पृथक् रूप में होती है, जैसे- प्रयोजनवाद के अनुसार, करके सीखने तथा प्रयोग के आधार पर छात्रों को ज्ञान प्रदान किया जाता है जबकि आदर्शवाद में शिक्षक द्वारा विविध आदशों को प्राप्त करने के लिये ज्ञान प्रदान किया जाता है। इस प्रकार विविध दार्शनिक संस्कृतियाँ ज्ञान प्राप्ति या जानने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। 
9. वैश्विक संस्कृति की भूमिका ( Role of global culture ) – 
वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व एक मंच पर एकत्रित हो गया है । इस स्थिति में ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में भी एकीकृत रूप उपस्थित हो गया है । आज एक देश में शिक्षण अधिगम प्रक्रिया सम्बन्धी अनुसन्धानों का कोई परिणाम प्राप्त होता है तो वह सम्पूर्ण विश्व में फैल जाता है । इसी आधार पर ज्ञान प्राप्ति की गतिविधियों में तथा ज्ञान प्राप्ति के साधनों में समेकित रूप देखा जाता है । आज शिक्षा के अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के उद्देश्य को सभी देशों के शिक्षाशास्त्रियों एवं मनोवैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार किया जाता है ।
10. आधुनिक संस्कृति की भूमिका ( Role of modern culture ) – 
वर्तमान सांस्कृतिक व्यवस्था विज्ञान एवं तकनीकी पर आधारित है। आज के समय में विज्ञान, सूचना संचार एवं तकनीकी क्रान्ति के कारण जानने की प्रक्रिया में भी परिवर्तन हो गया है। आज का छात्र किसी भी ज्ञान प्राप्ति के लिये शिक्षक की प्रतीक्षा नहीं करता वरन् ज्ञान के लिये कम्प्यूटर एवं इण्टरनेट का प्रयोग करता है तथा विविध प्रकार की सूचनाओं को प्राप्त कर लेता है।
    वर्तमान संस्कृति शिक्षक को भी उन गतिविधियों एवं उपायों को व्यवहार में लाना चाहिये जो कि छात्रों की रुचि एवं इच्छा के अनुरूप हों। इस प्रकार की संस्कृति का प्रभाव यह है कि छात्रों के ज्ञान का स्तर उच्च एवं स्थायी हुआ है। इस संस्कृति में शिक्षक की भूमिका मात्र दिशा - निर्देश देने की है । वह छात्र की रुचि एवं क्रियाओं को उचित मार्ग पर ले जाता है जिससे छात्र अधिक से अधिक ज्ञान सरल एवं स्वाभाविक रूप में प्राप्त कर सके।
    अत: यह स्पष्ट हो जाता है कि विविध सांस्कृतिक व्यवस्थाओं एवं उनसे सम्बन्धित मान्यताएँ , सिद्धान्त एवं परम्पराएँ ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया का निर्धारण करती हैं । इसके लिये सभी शिक्षकों एवं छात्रों द्वारा संयुक्त रूप से अपनी रुचि एवं आवश्यकता के अनुरूप ज्ञान प्राप्ति की विधियों का चुनाव करना चाहिये जिससे आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया जा सके ।


शनिवार, 15 मई 2021

शैक्षिक प्रबन्धन

शैक्षिक प्रबन्धन
Educational Management


प्र्बन्धन की अवधारण
 
    प्रबन्धन के द्वारा समस्त मानवीय एवं भौतिक संसाधनों की व्यवस्था तथा उनकी अधिकतम उपयोग किया जाता है। इससे कार्य प्रणाली में गति आ जाती हैं, साधनों का मितव्ययता पूर्ण उपयोग होता हैं। तथा उद्देश्यों की पूर्ति सहजता के साथ हो जाती है। प्रबन्धन ही वह तत्त्व हैं जिसके द्वारा हम पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को कम से कम समय तथा परिश्रम के साथ प्राप्त कर सकते हैं। वर्तमान में हमारे चारों ओर अनेक औपचारिक, अनौपचारिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक संगठन फैले हुए है। ऐसे संगठनों कों निर्देशित, समान्वित तथा एकीकृत करने हेतु प्रबन्धन की आवश्यकता पड़ती हैं।
 
    औद्योगिक जगत में प्रबन्ध का स्थान एवं महत्त्व निरन्तर बढ़ता गया तथा उसका एक पृथ्क शास्त्र का विकास हुआ। आज विश्व में प्रबन्ध का महत्त्वपूर्ण स्थान हैं। प्रबन्धन के द्वारा नियोजन का कार्य किया जाता हैं। नियोजन के कारण हम शिक्षण मेें अनिश्चितता तथा को दूर कर अपनें कार्योे  तथा उद्देश्यों में स्पष्टता तथा सोदेश्यता लाते हैं। प्रबन्धन से नेता की कार्य-दक्षता  में वृद्धि होती हैं ’’प्रबन्धन मंें केवल अधिकारत्व भी शामिल नही हैं अपितु इसमें वैज्ञानिक चिन्तन व्यवस्थापन, दिशा-निर्देशन तथा नियंत्रण आदि भी शामिल होते है।’’ इस प्रकार कार्य को व्यवस्थित ढंग से सम्पन्न कराने को प्रबन्धन कहा जाता है। 
 
प्रबन्धन का अर्थ 
 
प्रबन्धन एक व्यापक अवधारणा है। प्रबन्ध की विचारधारा इतनी जटिल हैं कि विद्वान इसे अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं और उद्देश्य कों ध्यान में रखकर समझाने की कोशिश करते है। कार्य को व्यवस्थित ढंग से करानें की कला, परन्तु इस अर्थ का प्रयोग प्रत्येक क्षेत्र में नही किया जाता चूंकि प्रबन्ध मानवीय संगठन में किसी न किसी रूप में पाया जाता हैं, चाहे विद्यालय, सरकार, संगठना, सेना, परिवार।
 
प्रबन्धन की परिभाषा 
 
एफ. डब्ल्यू टेलर के अनुसार’’ प्रबन्धन यह जानने की कला हैं कि आप व्यक्तियो से वास्तव में क्या काम लेना चाहते हैं? तथा यह देखना कि वे उसकों मितव्ययी तथा उत्तम ढंग से पूरा करते हैं।’’
         “Management is an art of knowing exacty what you want man to do and then seeing they do it in the best and economical way.”
 
जैक डंकन के अनुसार ’’प्रबन्धन में उन सभी संगठनात्मक क्रियाओ को सम्मिलित किया जाता हैं जो उद्देश्यपूर्ति तथा प्राप्ति कार्य-मूल्याकंन तथा उस कार्यात्मक दर्शन के विकास से सम्बन्धिन हैं, जों सामाजिक प्रणाली में संगठन के  अस्तित्व कों सुनिश्चित करती है।’’
 
सी. डब्लयू. विलसन के अनुसार ’’प्रबन्ध एक निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मानवीय शक्तियों के प्रयोग एवं निर्देशन की प्रकिया हैं।’’
“Management is a process of relasing and directing human energies towards attaining a definite goal.”
 
शैक्षिक प्रबन्ध की अवधारणा
 
    शैक्षिक प्रबन्धन के क्षेत्र में वंछित शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए की जाने वाली प्रक्रिया हैं जिससे शिक्षण एवं अधिकतम की प्रक्रिया को ध्यान में रखा जाता हैं। लोककल्याणी राज्य में शिक्षा की व्यवस्था व्यापक रूप से सामनें आई इस बढती विधार्थियों की संख्या एवं उदेश्यों की विस्तृता के कारण  शैक्षिक प्रबन्ध आवश्यक हो गया। शैक्षिक प्रबन्ध से तात्पर्य शिक्षा से सम्बन्धित सारी व्यवस्थाओं में कार्य करने की कला व्यवस्था एवं प्रबन्ध से हैं।
 
    विधालय में इस प्रकार का प्रबन्ध हो कि उसे उचित संरक्षण एवं शिक्षा भली भाॅति प्राप्त करने के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। सम्पूर्ण प्रक्रिया प्रबन्धन की ओर संकेत करती हैं क्योंकि शैक्षिक प्रबन्धन के अभाव से छात्रों को सर्वांगीण विकास के अवसर विधालय में उपलब्ध नहीं हो सकते हैं।

शैक्षिक प्रबन्ध का अर्थ एवं परिभाषाए
 
    शैक्षिक प्रबन्ध दो शब्दों का सयुक्त है - शैक्षिक (शिक्षा) एक प्रबन्ध (व्यवस्था) अतः शैक्षिक प्रबन्ध का अर्थ हुआ शिक्षा प्रक्रिया की व्यवस्था (प्रबन्ध) करना। विद्यालय में इस प्रकार का प्रबन्ध हो कि उसे उचित संरक्षण एवं शिक्षा भली-भाति प्राप्त करने के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करायी जानी चाहिए। सम्पूर्ण प्रक्रिया शैक्षिक प्रबन्धन की और संकेत करती है क्योकि शैक्षिक प्रबन्धन के अभाव से छात्रों को सर्वागीण विकास के अवसर विद्यालय में उपलब्ध नही हो सकते है।
 
    शिक्षा प्रबन्धन का आशय सामान्या बांलचाल की भाषा में इस प्रकार निकलते है। कि मनुष्य अन्तनिर्हित शक्तियों का विकास किस माध्यम से कर सकता है। उन माध्यमों को व्यवस्थित क्रमबद्ध एवं एकीकृत करना। यह शिक्षा प्रबन्धन की नवीनतम अवधारणा है। जिसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का संतुलित विकास एवं समाज में समायोजित करने का अधिकतम अवसर प्रदान करना। तथा शिक्षा को जीवन से धनिष्ठ रूप से जोडने की आवश्यकता को ध्यान में रखकर शिक्षा के उद्धेश्यों को ध्यान में रखा गया।
 
    विद्यालयी प्रबन्ध में मानव (शिक्षक व छात्र), मशीन (विद्यालय), साधन (उपकरण), माल (शैक्षिक प्रक्रिया), निष्पति, मुद्रा बाजार (शुल्क) अर्थव्यवस्था तथा मानव शक्ति नियोजक तथा संगठन (प्रबन्धक, प्रधानाचार्य शिक्षक, छात्र, कर्मचारी, अभिभावक) इन सबको गतिशील बनाए रखता है अर्थात् शिक्षण एक व्यवसाय है। इसमें शिक्षक अपने ज्ञान तथा कौशल की सेवाएॅ धन के बदले छात्रों को देता है। इस प्रक्रिया की सफलता उत्तम प्रबन्ध पर निर्भर करती है।
 
शिक्षण-अधिगम के प्रबन्धन का कार्य प्रमुख रूप से अध्यापक का होता है। इस हेतु शिक्षक ही प्रबन्ध कर्ता की भूमिका अदा करता है। शिक्षण अधिगम के प्रबन्धन के लिए वह योजना बनाता है। व्यवस्था करता है। अग्रेषित करता है। तथा नियंत्रण करता है। अध्यापक इन विभिन्न प्रकार के शेैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार की शैक्षिक क्रियाएँ करते है। 

“ प्रबन्ध यह जानने की कला है कि क्या करना है। तथा इसे करने का सर्वोतम तरीका क्या है।“ -एफ. डब्ल्यू. टेलर। 
 
शैक्षिक प्रबन्ध शिक्षा के क्षेत्र मेे वांछित शासकीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए की जाने वाली प्रक्रिया है। इसका सम्बन्ध शिक्षा संस्थाओं से हैं जिसमें शिक्षण एवं अधिगम की प्रक्रिया एवं उसके परिणामों को ध्यान में रखा जाता र्है। और आज शैक्षिक प्रबन्ध ने एक विस्तृत एवं गतिशील अवधारणा का रूप ले लिया और उसके कार्यक्षेत्र का भी विस्तार हुआ।

 POSDCORB

लूथर-गुलिक ने शैक्षिक प्रबन्ध के कार्य को “POSDCORB” के प्रबन्ध सूत्र मे पिरोया है। 



परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्ष -

  1. शैक्षिक प्रबन्ध अमुर्त होता है। 
  2. शैक्षिक प्रबन्ध अनवरत चलनें वाली प्रक्रिया है। 
  3. शैक्षिक प्रबन्ध सामूहिक योगदान पर सफल होता है। 
  4. शैक्षिक प्रबन्ध उपलब्ध साधनों का अधिकतम प्रयोग करता है। 
  5. समन्वित दृष्टिकोण होता है। 
  6. शैक्षिक प्रबन्ध एक व्यवसाय के रूप में धंसा जा रहा हैं ।
  7. शैक्षिक प्रबन्ध एक  उद्देश्य पूर्ण क्रिया है।
  8. शैक्षिक प्रबन्ध एक सामाजिक क्रिया है। 
  9. प्रबन्ध का दायित्व काम करवाना है। 
  10. शैक्षिक प्रबन्ध कला और विज्ञान दोनों है। 
  11. शैक्षिक प्रबन्ध एक समूह संज्ञा है। 
  12. शैक्षिक प्रबन्ध में नियोजित एवं क्रमबद्ध रूप में कार्य होते है। 
  13. शैक्षिक प्रबन्ध में सहयोग की भावना निहित होती है। 

शैक्षिक प्रबन्ध की विशेषताए 

 CHARACTERISTICS OF EDUCATIONAL MANAGEMENT

1. नियोजित व्यवस्था - शैक्षिक प्रबन्ध  की महत्त्वपूर्ण व्यवस्था नियोजन से सम्बन्धित है। विद्यालय मे सम्पूर्ण व्यवस्था पूर्ण नियोजन होती हैं । सम्पूर्ण शैक्षिक कार्यों को कमबद्ध तरीके से किया जाता हैं ं। यह प्रबन्ध के क्षेत्र की सबसे आधारभूत विशेषता मानी जाती है। 

2. शैक्षिक प्रबन्ध  एक समन्वयकारी संसाधन है- शैक्षिक प्रबन्ध  के माध्यम से शिक्षा के विभिन्न साधनों में समन्वय स्थापित करता है। प्रबन्ध एक जटिल अर्थ वाली प्रक्रिया है, इसका सम्बन्ध अधिकारियों से है। यह एकीकरण की प्रक्रिया द्वारा वह शिक्षा की प्रक्रिया को सफल बनाता है।

3. अनवरत चलने वाली प्रक्रिया-शैक्षिक प्रबन्ध अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। इसमेें योजना बनाने, निर्णय करने, संगठन करने, निर्देशन, समन्वय आदि के बारे में निरन्तर कार्य किए जाते है। इसका सम्बन्ध प्रबन्धक की नीतियों को क्रियान्वित करने से है।

4. सामूहिकता- शैक्षिक प्रबन्ध में प्रधानाध्यापक, अध्यापक, विधार्थी अभिभावक सभी में सामूहिक उतरदायित्व की भावना पर बल दिया जाता है। इसीलिए विद्यालयों मेे अध्यापक-अभिभावक परिषद् बनाई जाती है। और समय पर अभिभावको से सम्पर्क किया जाता है। सभी के सामूहिक योगदान पर ही शैक्षिक प्रबन्ध सफल हो सकता  है।

5. उद्धेश्यपूर्ण- प्रबन्ध के प्रत्येक क्षेत्र में प्रबन्ध का उद्धेश्यपूर्ण होना चाहिए शैक्षिक उद्धेश्य की प्राप्ति ही शैक्षिक प्रबन्ध का मुख्य उद्धेश्य हैं । शैक्षिक प्रबन्ध का मुख्य विधार्थियों का सर्वागीण विकास करना है। तथा शिक्षा से जुडे सम्बन्धित महत्वपूर्ण अधिकारियों के सूझावों को भी स्थान दिया गया है। 

6. प्रबन्ध एक सामाजिक क्रिया हैं- मनुष्य के समाजीकरण में जो स्थान समाज को प्राप्त  है। वही स्थान शिक्षा के क्षेत्र में प्रबन्ध का हैं 

7. उपलब्ध साधनों का उपयोग- शैक्षिक प्रबन्ध में उपलब्ध साधनों का अधिाकतम उपयोग किया जाता हैै आज हमारे विद्यालय में सीमित मात्रा मे साधन उपलब्ध है। और शैक्षिक प्रबन्ध के द्वारा इन उपलब्ध साधनों का उपयोग अधिकतम लाभ के लिए किया जाता है। 

8. प्रबन्ध एक सार्वभौमिक क्रिया है।- शैक्षिक प्रबन्ध के द्वारा पूर्व निर्धारित शैक्षिक लक्ष्योे को आसानी से पूरा किया जा सकता है। क्योकि यह एक सार्वभौमिक प्रक्रिया होने से किसी भी शैक्षिक लक्ष्य तक पहुचने के लिए समुचित दिशा मिल जाती हैं नियोजन, संगठन, नियंत्रण तथा निर्दंेशन आदि सभी सार्वभौमिक प्रकृति के कार्य है।

9. कला एवं विज्ञान- शैक्षिक प्रबन्ध को कला एवं विज्ञान दोनों ही माना गया है। शैक्षिक प्रबन्ध को कला मानवीय सम्बन्धों पर आधारित होने के कारण आधारित होने के कारण तथा इसमें वैज्ञानिक की तरह निष्पक्ष रहकर अध्ययन किया जाता है। अतः यह विज्ञान एवं कला दोनोे की श्रेणी मे आता है।

10. व्यवसाय के रूप में -वर्तमान मेे वैज्ञानिको द्वारा औधोगिक क्षेत्रों मंे नमी जान देने से प्रबन्ध का दबदबा प्रत्येक क्षेत्र मेे बढ गया है। इस प्रकार आज के समय में शैक्षिक क्षेत्र बहुत विस्तृत एवं जटिल होता जा रहा हैं इसलिए शैक्षिक प्रबन्ध भी एक व्यवसाय के रूप में प्रतिष्ठित होता जा रहा है।

11. समन्वित-दृष्टिकोण- शिक्षण संस्थानों की प्रगति मानवीय एवं समन्वित दृष्टिकोण पर निर्भर करती हैं, इसके द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति भली-भाॅति सम्भव हैं। शेैक्षिक प्रबन्ध से छात्र-छात्राएं, शिक्षको आदि से सम्बधिंत व्यवस्थाएं होती है। प्रबन्ध के अन्य क्षेत्रों की तुुलना में इस शैक्षिक प्रबन्ध के ज्यादा समन्वित माना गया है। 

12. अमूर्त- शैक्षिक प्रबन्ध में हमारें कार्यो की सफलता का ज्ञान बहुुत समय बाद लगता है। शैक्षिक प्रबन्ध में बालकों को इतनी सफलता मिली, इसका ज्ञान काफी समय बाद चला पाता हैं, अतः शैक्षिक प्रबन्ध अमूर्त माना जाता है। 

13. वैज्ञानिक दृष्टिकोण- वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तात्पर्य यही है कि हम सभी निर्णय पूर्व धारणाओं  से दूर रहकर करें। पूर्व धारणाओं या परम्परागत अवधारणाओं  के  आधार पर किए गए निर्णय सही नही होते हैं इसलिए विज्ञान में कार्य- कारण सम्बन्धों  पर आधारिक ज्ञान को स्थान दिया जाता है जिसमें किसी भी तरह का सन्देह नही किया जाता हैं। इस प्रकार शैक्षिक प्रबन्ध के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यक हैं।

14. प्रबन्ध एक जन्मजात प्रतिभा- व्यक्ति के वंशानुगत प्रभाव उनकी कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं यही प्रबन्ध व्यक्ति को नेतृत्व प्रदान करता हैं जिसका प्रभाव आनें वाली भावी पीढियों पर भी पड़ता है। 














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