शनिवार, 1 मई 2021

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली - वैदिक कालीन शिक्षा 2 (Ancient Indian Education System: Vedic Era 2)

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली - वैदिक कालीन शिक्षा 2
Ancient Indian Education System:  Vedic Era 2


वैदिक कालीन शिक्षा के लक्ष्य एवं उद्देश्य 

इस शिक्षा का एक मात्र उद्देश्य उस व्यक्ति को अज्ञान से मुक्त कराकर ज्ञान की प्राप्ति करवाना था। वह विवेकपूर्ण विद्या एवं अविद्या का भेद कर सके। सत्य एवं मिथ्या का अन्तर समझ सके और अपने आप में निहित अनन्त ज्ञान व शक्ति को पहचान सके। 

  • वैदिक कालीन समाज मुख्य रूप से परा तथा अपरा विद्या के प्रभाव में बटा हुआ था।
  • परा विद्या के लिए अलौकिक विषयों का अध्ययन करना होता था। जिनकी सहायता से ज्ञानए कर्म तथा उपासना के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती थी।
  • अपरा विद्या के लिए लौकिक विषयों का अध्ययन किया जाता था जिसकी सहायता से सामाजिक व्यवस्था का संचालन किया जाता था।
  • नैतिक चरित्र का निर्माण करना।
  • पवित्रता तथा धार्मिकता का विकास।
  • व्यक्तित्व का विकास।
  • संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार करना।

अध्यापक/गुरू/आचार्य

  • भारतीय शिक्षा में आचार्य का स्थान बड़ा ही गौरव का था। 
  • उनका बड़ा आदर और सम्मान होता था। 
  • आचार्य पारंगत विद्वान्‌ा, सदाचारी, क्रियावान्‌ा, निःस्पृह, निरभिमान होते थे और विद्यार्थियों के कल्याण के लिए सदा कटिबद्ध रहते थे। 
  • अध्यापक, छात्रों का चरित्र निर्माण, उनके लिए भोजनवस्त्र का प्रबंध, रुग्ण छात्रों की चिकित्सा, शुश्रूषा करते थे। 
  • कुल में सम्मिलित ब्रह्मचारी मात्र को आचार्य अपने परिवार का अंग मानते थे और उनसे वैसा ही व्यवहार रखते थे। 
  • आचार्य धर्मबुद्धि से निःशुल्क शिक्षा देते थे।

    ‘गुरू बिना ज्ञान अधूरा।‘ हमारे यहाँ गुरू का अत्यन्त महत्व है। उसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश और साक्षात् परब्रह्म का दर्शन कराने वाला और अज्ञान नष्ट करने वाला बताया गया है।

    अद्वैत वेदान्त के अनुसार शिक्षक ऐसा होना चाहिए, जिससे सत्ता की अनुभूति कर ली तथा जो स्वयं जीवन मुक्त हो। विद्यार्थी अध्यापक का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से अनुकरण करते है।

अतः अध्यापक की भाषा रहन-सहन व्यवहार आदि सभी बातों में छात्रों के लिए अनुकरणीय हातेे है।

स्मृतियों के अनुसार शिक्षक चार प्रकार के है-

कुलपति, आचार्य, गुरू व उपाध्याय

विद्यार्थी/शिष्य

  • विद्यार्थी गुरु का सम्मान और उनकी आज्ञा का पालन करते थे। 
  • आचार्य का चरणस्पर्श कर दिनचर्या के लिए प्रातःकाल ही प्रस्तुत हो जाते थे। 
  • गुरु के आसन के नीचे आसन ग्रहण करा, सुसंयत वेश में रहना, गुरु के लिए दातौन इत्यादि की व्यवस्था करना, उनके आसन को उठाना और बिछाना, स्नान के लिए जल ला देना, समय पर वस्त्र और भोजन के पात्र को साफ करना, ईधंन संग्रह करना, पशुओं को चराना इत्यादि छात्रों के कर्तव्य माने जाते थे।
  • विद्यार्थी ब्राह्ममुहूर्त में उठते थे और प्रातः कृत्यों से निवृत्त होकर, स्नान, संध्या, होम आदि कर लेते थे। फिर अध्ययन में लग जाते थे।
  • इसके उपरांत भोजन करते थे और विश्राम के पश्चात्‌ आचार्य के पाठ ग्रहण करते थे। 
  • सांयकाल समिधा एकत्र कर ब्रह्मचारी संध्या ओर होम का अनुष्ठान करते थे। 
  • विद्यार्थी के लिए भिक्षाटन अनिवार्य कृत्य था। भिक्षा से प्राप्त अन्न गुरु को समर्पित कर विद्यार्थी मनन औरनिदिध्यासन में लग जाते थे।

    अद्वेत वेदान्त के अनुसार प्रत्येक छात्र अनन्त ज्ञान एवं शक्ति का स्त्रोत है, उनमें तो शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक भिन्नता दिखाई देती है वह कर्म जनित है। यह भिन्नता उनका तटस्थ लक्षण है, स्वरूप लक्षण नहीं है। इस प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से सब छात्र समान है और व्यावहारिक दृष्टि से उनमें भिन्नता है।

शंकराचार्य के अनुसार ब्रह्म ज्ञान के इच्छुक छात्रों को साधन चातुष्टय का पालन करना चाहिए। इस साधन चातुष्टय में इन्द्रियाँ निग्रह मन में श्रद्वा का महत्त्व तो व्यावहारिक ज्ञान की दृष्टि से भी होता है। आज के छात्र यदि शंकराचार्य की यह बात मान लें तो शिक्षा जगत की सभी समस्याओं का अन्त हो जायेगा।

शिक्षा का पाठ्यक्रम

  • वेदों का अध्ययन श्रावण पूर्णिमा को उपाकर्म से प्रारंभ होकर पौष पूर्णिमा को उपसर्जन से समाप्त होता था। शेष महीनों में अधीत पाठों की आवृत्ति, पुनरावृत्ति होती रहती थी।
  • विद्यार्थी पृथक पृथक पाठ ग्रहण करते थे, एक साथ नहीं। प्रतिपदा और अष्टमी को अनध्याय होता था। 
  • गाँव, नगर अथवा पड़ोस मे आकस्मिक विपत्ति से और शिष्टजनों के आगमन से विशेष अनध्याय होते थे। 
  • अनध्याय में अधीत वेदमंत्रों की पुनरावृत्ति और विषयांतर का अध्ययन निषिद्ध न थे। 
  • विनय के नियमों का उल्लंघन करनेवाले विद्यार्थी को दंड देने की परिपाटी थी। 
  • पाठ्यक्रम के विस्तार के साथ वेदों ओर वेदांगों के अतिरिक्त साहित्य, दर्शन, ज्योतिष, व्याकरण और चिकित्साशास्त्र इत्यादि विषयों का अध्यापन होने लगा। 

शिक्षा के संस्थान

  • टोल पाठशाला, मठ ओर विहारों में पढ़ाई होती थी।
  • काशी, तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वलभी, ओदंतपुरी, जगद्दल, नदिया, मिथिला, प्रयाग, अयोध्या आदि शिक्षा के केंद्र थे। 
  • दक्षिण भारत के एन्नारियम, सलौत्गि, तिरुमुक्कुदल, मलकपुरम्‌ तिरुवोरियूर में प्रसिद्ध विद्यालय थे। 
  • अग्रहारों के द्वारा शिक्षा का प्रचार और प्रसार शताब्दियों होता रहा। कादिपुर और सर्वज्ञपुर के अग्रहार विशिष्ट शिक्षाकेंद्र थे। 

शिक्षण विधि

  • प्राचीन शिक्षा प्रायः वैयक्तिक ही थी।
  • कथा, अभिनय इत्यादि शिक्षा के साधन थे। 
  • अध्यापन विद्यार्थी के योग्यतानुसार होता था अर्थात्‌ विषयों को स्मरण रखने के लिए सूत्र, कारिका और सारनों से काम लिया जाता था। 
  • पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष पद्धति किसी भी विषय की गहराई तक पहुँचने के लिए बड़ी उपयोगी थी। 
  • भिन्न भिन्न अवस्था के छात्रों को कोई एक विषय पढ़ाने के लिए समकेंद्रिय विधि का विशेष रूप से उपयोग होता था सूत्र, वृत्ति, भाष्य, वार्तिक इस विधि के अनुकूल थे। 
  • कोई एक ग्रंथ के बृहत्‌ा और लघु संस्करण इस परिपाटी के लिए उपयोगी समझे जाते थे।
  • वेदकाल में हमें विभिन्न प्रकार की शिक्षा पद्धतियों का परिचय मिलता है। इसके लिए श्लोक है-

श्रवणं तु गुरोः पूर्व मननं तदन्तरम्।

निदिध्यासनमित्येनत्पूर्ण बोधस्य कारणाम्।।

    बृह अरण्यक उपनिषद् में ज्ञानार्जन की श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन इन तीन प्रकारों की व्याख्या मिलती है। इसके उपरान्त निम्नविधियांे का वर्णन भी मिलता हैः-

1. कथा-कथन विधिः- इसमें गुरू कथाएँ कहता फिर शिष्यों द्वारा उत्तर प्राप्ति करता की कथा का सार क्या है? जिससे शिष्यों की बुद्धिमता का पता चलता।

2. प्रश्नोत्तर विधि:- इसमें प्रश्नों द्वारा उत्तर प्राप्त किया जाता था। 

3. वाद-विवाद विधि:-  इसमंे शिष्यों में ज्ञान की वृद्धि की जाती थी।

4. शास्त्रार्थ विधि:- इसमें समस्त शिष्यों में से विद्धान को चुना जाता था।

5. परिचर्या विधि (सेमिनार्स):- इसमें गुरूओं के समक्ष शिष्य अपने ज्ञान का व्याख्यान करते थे।

6. उपगुरू (मौनीटोरियल प्रणाली):- विद्धान शिष्य अपने सहपाठियों में ज्ञान व शिक्षा को बांटा करता था।

वैदिक काल में शिक्षा का अनुशासन 

    अध्ययन सुचारू रूप से चलाने के लिए अनुशासन आवश्यक है। जब तक मन संयमित न हो तब तक एकाग्रता नही आ पाती है और बिना एकाग्रता के अध्ययन संभव नहीं है। वेंदात में बाल प्रकृति की चार अवस्था का विवेचन किया है।

1. क्षिप्तः- बालक अपनी इन्द्रियों के अधीन रहता है उसका अन्तकरण चंचल होता है।

2. विक्षिप्तः- इस अवस्था में बालक का इन्द्रियों पर सीमित रूप से नियंत्रण होने लगता है। बालक स्वेच्छापूर्वक अध्ययन में मन लगाने का प्रयत्न करता है।

3. मुधाः- यह वह अवस्था है, जिसमें बालक का अपनी इन्द्रियों पर काफी नियंत्रण हो जाता है परन्तु आलस्यवश पूर्ण रूप से अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाता है।

4. एकाग्रता:- यह वह अवस्था है, जिसमें बालक इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अंहकार और चित्त सभी पर आत्मा का नियंत्रण होता है।

वैदिक काल में गुरू शिष्य संबंध 

    प्राचीन भारत में किसी वर्ग, विद्यालय या विषय का शिक्षक नहीं होता था। वह छात्र विशेष का गुरू होता था । अभिभावक उपनयन सस्ंकार के पश्चात् अपने बालक कोे गुरू के पास ले आते थे।

    वैदिक शिक्षा में गुरू - शिष्य संबंध आदर्श थे। जिस प्रकार माता गर्भ में शिशु के पोषण, रक्षण और वर्धन का निर्वाह करती है, उसी प्रकार आचार्य गुरूकुल में प्रविष्ट हुए छात्र का पोषण, रक्षण एवं ज्ञानावर्द्धन करता था।

वैदिक काल में विद्यालय एवं परीक्षा पद्धति

1. घर:- माता का गर्भ ही प्रथम विद्यालय माना जाता था। जन्म के पश्चात् माता-पिता व परिवार से व्यवहार, आचार, सस्ंकार या अक्षर ज्ञान प्राप्त करता था।

2. पाठशाला:- यहाँ बालक अक्षर ज्ञान और सामान्य गणन क्रियाएँ सीखता था। ऐसी लगभग सभी गाँवों में पाठशालाएँ थी। इन्हें प्राथमिक शाला कह सकते है।

3. टोल:- ये लगभग उच्च प्राथमिक शालाओं जैसी थी। यहाँ एक से अधिक शिक्षक होते थे। विषयों में भी कुछ विविधता थी। दो-पाँच गाँवों के बीच आवास के साथ ऐसी शालाएँ थी। जो संपूर्ण निःशुल्क थी। शालाओं में वस्त्र, निवास, भोजन सभी की व्यवस्था वहाँ के आचार्य दान व भिक्षा माँग कर करते थे।

वैदिक काल में विद्यालय

1. घर:- माता का गर्भ ही प्रथम विद्यालय माना जाता था। जन्म के पश्चात् माता-पिता व परिवार से व्यवहार, आचार, सस्ंकार या अक्षर ज्ञान प्राप्त करता था।

2. पाठशाला:- यहाँ बालक अक्षर ज्ञान और सामान्य गणन क्रियाएँ सीखता था। ऐसी लगभग सभी गाँवों में पाठशालाएँ थी। इन्हें प्राथमिक शाला कह सकते है।

3. टोल:- ये लगभग उच्च प्राथमिक शालाओं जैसी थी। यहाँ एक से अधिक शिक्षक होते थे। विषयों में भी कुछ विविधता थी। दो-पाँच गाँवों के बीच आवास के साथ ऐसी शालाएँ थी। जो संपूर्ण निःशुल्क थी। शालाओं में वस्त्र, निवास, भोजन सभी की व्यवस्था वहाँ के आचार्य दान व भिक्षा माँग कर करते थे।

4. पाठशाला:- इन्हें माध्यमिक शाला कह सकते हैं। कोई लब्ध प्रतिष्ठित अध्यापक स्वयं या शासक की प्रार्थना पर बालकों को उच्चतर ज्ञान देने के लिए पाठशाला खोलता था। जिसमें व्याकरण, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, दर्शन, वेद तथा आयुर्वेद आदि विषयों का शिक्षण दिया जाता था। गुरू भी इन्ही पाठशालाओं में रहते थे। गुरूमाताएँ उनकी सहायता करती थी।

5. गुरूकुल या आवासी विद्यालय:- गुरूकुल या तो नदी या विस्तृत जलवायु, सरोवर के पास नगर के कोलाहल से दूर किसी ऐसे वन या उपवन में स्थापित किया जाता था। जहाँ आश्रम की गायों के चरने, कुश और समिधा प्राप्त करने तथा विद्यार्थियों के निवास अध्ययन, व्यायाम और धनुर्विद्या के अभ्यास आदि के लिए पर्याप्त स्थान तथा स्वच्छ जलवायु प्राप्त होता था।

वैदिक काल में स्त्री शिक्षा 

    वैदिक साहित्य के वर्णन के अनुसार स्त्रियाँ उच्चतम शिक्षा प्राप्त कर ब्रह्म-वादिनी या ऋषिका की संज्ञा प्राप्त करती थी।

    विशवारा, अपाला, होमशा, शाश्वती, घोषा आदि विदुषियाँ, ऋग्वेद की विभिन्न ऋचाओं की रचयित्री है। इस प्रकार ऋग्वेद के समय में स्त्री शिक्षा पूर्णतः प्रचलित थी। उनका ज्ञान उच्च कोटि का था। पुरूषों की भांति वे भी ब्रह्मचारिणी रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त करती था। जिसमें गार्गी का नाम प्रमुख है। अध्यापिकाओं के रूप में उपनिषदों में महिलाओं के रूप में उपनिषदों में महिलाओं का वर्णन है।

 

वैदिक शिक्षा पद्धति की विशेषताएँ 

1. वैदिक शिक्षा सबके लिए अनिवार्य थी वैदिक, क्षत्रिय और वैश्यों के लिए गुरूकुल में स्त्रियों के लिए पिता या श्वसुर के घर, और शुद्रों के लिए अपने घर या शिल्पी के यहाँ शिक्षा दी जाती थी।

2. समग्र शिक्षा निःशुल्क थी।

3. आवासीय विद्यालय थे, जहाँ गुरू शिष्य साथ रहते थे।

4. गुरूओं को महत्ता प्रदान की गई थी। शिष्य उन्हें देव स्वरूप मानकर उनकी सेवा करके उनकी कृपा पाना अपना ध्येय समझता था।

5. गुरू छात्रों को अपना पुत्र मानकर उसके विकास का प्रयत्न करता था।

6. आचरण व संस्कार को प्रधान माना जाता था।

7. शिक्षा परीक्षा मौखिक  थी। अध्यापक स्वतंत्र थे।

8. ऊँच-नीच, राजा-रंक का कोई भेद नहीं था।

9. अनेक विषयों के अध्ययन की सुविधा थी किन्तु किसी एक शास्त्र में पारंगत होना आवश्यक था।

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली - वैदिक कालीन शिक्षा 1(Ancient Indian Education System: Vedic Era 1)

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली - वैदिक कालीन शिक्षा 1
Ancient Indian Education System:  Vedic Era 1



    प्राचीन काल में शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया गया था। भारत ‘विश्वगुरू‘ कहलाता था। विभिन्न विद्वानों ने शिक्षा को प्रकाश स्त्रोत, अन्तर्दृष्टि, अन्र्तज्योति, ज्ञानचक्षु और तीसरा नेत्र आदि उपमाओं से विभूषित किया है। उस युग की यह मान्यता थी कि जिस प्रकार अन्धकार को दूर करने का साधन प्रकाश है, उसी प्रकार व्यक्ति के सब संशयों और भ्रमों को दूर करने का साधन शिक्षा है। प्राचीन काल में इस बात पर बल दिया गया कि शिक्षा व्यक्ति को जीवन का यथार्थ दर्शन कराती है तथा इस योग्य बनाती है कि वह भवसागर की बाधाओं को पार करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर सके जों कि मानव जीवन का चरम लक्ष्य हैं।
 

आधुनिक भारतीय शिक्षा की उत्पत्ति और विकास
5.6 हजार वर्ष पूर्व प्राचीन नगरीय सभ्यताओं का विकास हुआ।
हड़प्पा/सिन्धु घाटी सभ्यता

  • इन सभ्यताओं के लोग लिखने की कला जानते थे।
  • इन सभ्यताओं की मुद्राओं पर मनुष्य और विभिन्न पशुओं के चित्र पाये गये। 
  • लेख की इस लिपि को चित्र लिपि कहा गया।
  • यह लिपि दायी से बायी लिखी जाती थी।
  • इससे यह पता चलता है कि वैदिक काल पहले से ही शिक्षा का चलन रहा है।

 

आर्य सभ्यता

  • नगरीय सभ्यताओं के अन्त के पश्चात् आर्य सभ्यता का जन्म हुआ 
  • इस सभ्यता में वेदों के अनुसार शिक्षा पर बल दिया गया।
  • ऋग्वेद में इन्द्र को नगरों का नाश करने वाला बताया है।

   नगरों का निर्माण नगरीय सभ्यताओं जैसे हड़प्पा के लोंगों के ज्ञान को बताता है।

ऋग्वेद में - कुछ लोग शिक्षा की जानकारी रखते है 

  • सुनियोजित नगर
  • विकास व्यवस्था 
  • निपुण नागरिक प्रबंधन
  • सुन्दर व उपयोगी कला
  • विकसित धर्म में लोगों का विश्वास
  • पूजा के ढंग 
  • धार्मिक रीतियाँ
  • ये सभी आज के समाज के अंग भी है।
  • शिव व पृथ्वी माता की पूजा, पीपल पूजा, मूर्ति पूजा आदि हिन्दू धर्म का वर्तमान का अभिन्न अंग हैं।

भारतीय शिक्षा का इतिहास
(1) वैदिक कालः- (2500 ई.पू. से 500 ई. तक)
1. वेदों का निर्माण।
2. वेद आधारित शिक्षा व्यवस्था।
3. वैदिक, आरण्यक, उपनिषद् आदि ग्रन्थों की रचना।
 
(2) बुद्ध कालः- (500 ई.पू. से 1200 ई. तक)
1. बौद्ध धर्म की उत्पत्ति।
    2. अर्वाचीन प्रकार की शिक्षा व्यवस्था।
 
(3) मध्य कालः- (1200 ई.पू. से 1757 ई. तक)
1. 12वीें शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक।
2. मुसलमानों ने शासन किया।
3. उन्हीं की संस्कृति के आधार पर शिक्षा।
 
(4) ब्रिटिश कालः-
1. 18वीं शताब्दी से 1947 ई.,
2. पाश्चात्य आधारित शिक्षा।
 
(5) स्वतंत्रता पश्चात् भारतीय शिक्षा।




    भारत की प्राचीन शिक्षा आध्यात्मिमकता पर आधारित थी। शिक्षा, मुक्ति एवं आत्मबोध के साधन के रूप में थी। यह व्यक्ति के लिये नहीं बल्कि धर्म के लिये थी। भारत की शैक्षिक एवं सांस्कृतिक परम्परा विश्व इतिहास में प्राचीनतम है। 
डॉ॰ अल्टेकर के अनुसार,
वैदिक युग से लेकर अब तक भारतवासियों के लिये शिक्षा का अभिप्राय यह रहा है कि शिक्षा प्रकाश का स्रोत है तथा जीवन के विभिन्न कार्यों में यह हमारा मार्ग आलोकित करती है।

 

  • प्राचीन काल में शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया गया था। 
  • भारत विश्वगुरु कहलाता था।
  • विभिन्न विद्वानों ने शिक्षा को प्रकाशस्रोत, अन्तर्दृष्टि, अन्तर्ज्योति, ज्ञानचक्षु और तीसरा नेत्र आदि उपमाओं से विभूषित किया है। 
  • उस युग की यह मान्यता थी कि जिस प्रकार अन्धकार को दूर करने का साधन प्रकाश है, उसी परकार व्यक्ति के सब संशयों और भ्रमों को दूर करने का साधन शिक्षा है। 
  • प्राचीन काल में इस बात पर बल दिया गया कि शिक्षा व्यक्ति को जीवन का यथार्थ दर्शन कराती है। तथा इस योग्य बनाती है कि वह भवसागर की बाधाओं को पार करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर सके जो कि मानव जीवन का चरम लक्ष्य है।
  • प्राचीन भारत की शिक्षा का प्रारंभिक रूप हम ऋग्वेद में देखते हैं। ऋग्वेद युग की शिक्षा का उद्देश्य था - तत्वसाक्षात्कार
  • ब्रह्मचर्य, तप और योगाभ्यास से तत्व का साक्षात्कार करनेवाले ऋषि, विप्र, वैघस, कवि, मुनि, मनीषी के नामों से प्रसिद्ध थे। 
  • साक्षात्कृत तत्वों का मंत्रों के आकार में संग्रह होता गया वैदिक संहिताओं में, जिनका स्वाध्याय, सांगोपांग अध्ययन, श्रवण, मनन और निदिध्यासन वैदिक शिक्षा रही।

 

 

  • विद्यालय ‘गुरुकुल‘, ‘आचार्यकुल‘, ‘गुरुगृह‘ इत्यादि नामों से विदित थे। 
  • आचार्य के कुल में निवास करता हुआ, गुरुसेवा और ब्रह्मचर्य व्रतधारी विद्यार्थी षडंग वेद का अध्ययन करता था। 
  • शिक्षक को ‘आचार्य‘ और ‘गुरु‘ कहा जाता था और विद्यार्थी को ब्रह्मचारी, व्रतधारी, अंतेवासी, आचार्यकुलवासी। मंत्रों के द्रष्टा अर्थात्‌ साक्षात्कार करनेवाले ऋषि अपनी अनुभूति और उसकी व्याख्या और प्रयोग को ब्रह्मचारी, अंतेवासी को देते थे। 
  • गुरु के उपदेश पर चलते हुए वेदग्रहण करनेवाले व्रतचारी श्रुतर्षि होते थे। वेदमंत्र कंठस्थ किए जाते थे।

 

  • आचार्य स्वर से मंत्रों का परायण करते और ब्रह्मचारी उनको उसी प्रकार दोहराते चले जाते थे। इसके पश्चात्‌ा् अर्थबोध कराया जाता था।
  • ब्रह्मचर्य का पालन सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य था।
  • स्त्रियों के लिए भी आवश्यक समझा जाता था। 
  • आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करने वाले विद्यार्थी को नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहते थे। ऐसी विद्यार्थिनी ब्रह्मवादिनी कही जाती थी।
  • वेद, शिक्षा, कल्प, व्यकरण, छंद, ज्योतिष और निरुक्त उनके पाठ्य होते थे। पाँच वर्ष के बालक की प्राथमिक शिक्षा आरंभ कर दी जाती थी। 
  • गुरुगृह में रहकर गुरुकुल की शिक्षा प्राप्त करने की योग्यता उपनयन संस्कार से प्राप्त होती थी।
  • 8 वें वर्ष में ब्राह्मण बालक के, 11 वें वर्ष में क्षत्रिय के और 12 वें वर्ष में वैश्य के उपनयन की विधि थी। 
  • अधिक से अधिक यह 16, 22 और 24 वर्षों की अवस्था में होता था। 
  • ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्यार्थी गुरुगृह में 12 वर्ष वेदाध्ययन करते थे। तब वे स्नातक कहलाते थे। 
  • समावर्तन के अवसर पर गुरुदक्षिणा देन की प्रथा थी। समावर्तन के पश्चात्‌ा् भी स्नातक स्वाध्याय करते रहते थे। 
  • नैष्ठिक ब्रह्मचारी आजीवन अध्ययन करते थे। समावर्तन के सम ब्रह्मचारी दंड, कमंडलु, मेखला, आदि को त्याग देते थे। ब्रह्मचर्य व्रत में जिन जिन वस्तुओं का निषेध था अब से उनका उपयोग हो सकता था।

  • प्राचीन भारत में किसी प्रकार की परीक्षा नहीं होती थी और न कोई उपाधि ही दी जाती थी।
  •  
  • ब्रह्मचारी अध्ययन और अनुसंधान में सदा लगे रहते थे तथा बाद विवाद और शास्त्रार्थ में संम्मिलित होकर अपनी योग्यता का प्रमाण देते थे।

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बुधवार, 28 अप्रैल 2021

ज्ञान के निर्माण में समावेशित घटक या तत्त्व

ज्ञान के निर्माण में समावेशित घटक या तत्त्व
Factors involved in construction of knowledge



    सामान्य रूप से बालक अपने जीवन में दो प्रकार की ज्ञानात्मक व्यवस्था से परिचित होता है। उसको विद्यालय की व्यवस्था से तथा स्वयं के अनुभव द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है। अनेक अवसरों पर दोनों प्रकार के ज्ञान में सामंजस्य उपस्थित हो जाता है; जैसे- आग से दूर रहना चाहिये। यह ज्ञान छात्र को विद्यालय में बताया गया। इसके उपरान्त बालक ने जब आग को छूने। अतः विद्यालय के ज्ञान तथा का प्रयास किया तो उसे पता चला कि वह उससे जल सकता अनुभवजन्य ज्ञान में एकता सिद्ध हो गयी। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि बालक का विद्यालयी ज्ञान उसके लिये तब तक सामान्य तथ्य था जब तक कि उसने इसे अनुभव नहीं किया था परन्तु जैसे ही बालक ने इसकी सत्यता एवं प्रभावशीलता को अपने अनुभव के द्वारा सत्य सिद्ध पाया तो यह ज्ञान स्थायित्वता से परिपूर्ण हो गया तथा बालक द्वारा आत्मसात् किया गया। इस प्रकार विद्यालयी ज्ञान एवं अनुभवजन्य ज्ञान दोनों ही महत्त्व होते हैं।

1. विद्यालयी ज्ञान (School based knowledge) - विद्यालयी ज्ञान का आशय तथ्यात्मक ज्ञान की व्यवस्था से जिसमें बालक को औपचारिक एवं क्रमबद्ध रूप में शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के माध्यम से ज्ञान सिखाया जाता है । विद्यालयी व्यवस्था में ज्ञान एक निश्चित समय • सीमा के अन्तर्गत एक निश्चित ज्ञानात्मक व्यवस्था में परिपूर्ण किया जाता है । विद्यालयी व्यवस्था पूर्ण रूप से औपचारिक ज्ञान का केन्द्र है जिसमें विभिन्न प्रकार के प्रयासों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है । विद्यालय ज्ञान की प्रक्रिया एवं व्यवस्था को निम्नलिखित रूप में समझाया जा सकता है- 

(1) तथ्यात्मक ज्ञान (Factorial knowledge) - विद्यालगी जान प्रमुख रूप से तथ्यात्मक ज्ञान पर आधारित होता है । इसमें विभिन्न प्रकार के विषयों का तथ्यात्मक ज्ञान प्रदान किया जाता है । अनेक अवसरों पर प्रयोग प्रदर्शन के माध्यम से विद्यालयी ज्ञान प्रदान किया जाता है । इस प्रकार का ज्ञान विज्ञान आदि विषयों के क्षेत्र में सम्पन्न होता है ; जैसे गैस के बारे में तथ्यात्मक ज्ञान भी प्रदान किया जाता है तथा उसको प्रयोगशाला में बनाकर भी सिद्ध किया जा सकता है ।

(2) क्रमबद्ध ज्ञान (Systematic knowledge)- क्रमबद्ध रूप में ज्ञान प्रदान करना विद्यालयी ज्ञान की प्रमुख विशेषता है । विद्यालयी ज्ञान में एक निश्चित समय तालिका के अनुसार ज्ञान प्रदान किया जाता है जिसमें विद्यालय में महत्त्वपूर्ण विषयों के अध्ययन को स्थान प्रदान किया जाता है जो कि बालक के सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यक है ; जैसे- प्राथमिक स्तर पर हिन्दी , गणित एवं विज्ञान के ज्ञान को प्राथमिकता प्रदान की जाती है तथा वर्तमान में पर्यावरणीय अध्ययन को भी महत्त्वपूर्ण विषय के रूप में स्वीकार किया जाता है । 

(3) औपचारिक व्यवस्था (Formal arrangement)- विद्यालयी ज्ञान के अन्तर्गत सभी व्यवस्थाएँ पहले से ही निर्धारित एवं औपचारिक होती हैं । इस औपचारिक व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक कक्षा के स्तर के अनुसार बालकों को ज्ञान प्रदान करने की विधियों का निश्चय किया जाता है । विद्यालयी ज्ञान में बालकों के शारीरिक एवं मानसिक विकास को ध्यान में रखकर सम्पूर्ण शैक्षिक व्यवस्था का निर्धारण किया जाता है । इसमें बालकों के स्तर का ध्यान रखा जाता है । 

(4) सैद्धान्तिक ज्ञान (Theoritical knowledge) - विद्यालयी व्यवस्था में छात्रों को सैद्धान्तिक ज्ञान को प्रदान करने की अधिकता पायी जाती है। वर्तमान समय में सरकार एवं शिक्षाशास्त्रियों द्वारा व्यावहारिक ज्ञान पर अधिक बल दिया जा रहा है परन्तु भारतीय विद्यालयों में सभी सुविधाओं के उपलब्ध न होने के कारण सैद्धान्तिक ज्ञान की अधिकता पायी जाती है तथा व्यावहारिक ज्ञान की कमी पायी जाती है। 

(5) अमूर्त ज्ञान (Virtual knowledge)- विद्यालयी व्यवस्था में अमूर्त विषयों के ज्ञान की अधिकता पायी जाती है। वर्तमान समय में अमूर्त ज्ञान को मूर्त बनाने का प्रयास भी किया जा रहा है; जैसे- वर्णाक्षरों के ज्ञान को चित्रों के माध्यम से पढ़ाया जाता है जिससे बालक रूचि पूर्ण ढंग से ज्ञान प्राप्त कर सकें। अमूर्त ज्ञान को प्राप्त करने में प्रतिभाशाली बालक तो सक्षम हो जाते हैं। परन्तु सामान्य बुद्धि लब्धि के बालक इसको प्राप्त करने में कठिनाई का अनुभव करते हैं। 

(6) निश्चित विधियाँ (Fixed methods)- विद्यालयी ज्ञान में ज्ञान प्रदान करने की विधियाँ भी निश्चित होती हैं जिनके अनुसार ही बालकों को ज्ञान प्राप्त करना होता है तथा शिक्षक को ज्ञान प्रदान करना होता है। इन विधियों का प्रयोग प्रभावी भी हो सकता है तथा अनेक स्थितियों में प्रभावहीन भी हो सकता है। वर्तमान समय में अनेक वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करके ज्ञान प्रदान करने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाया जाता है जैसे- दल शिक्षण प्रायोजना विधि, समस्या समाधान विधि तथा भ्रमण विधि आदि । 

(7) सीमित विषय (Limited subjects)- विद्यालयी ज्ञानात्मक व्यवस्था में विषयों का क्षेत्र भी सीमित होता है। सीमित विषय भी छात्रों की योग्यता एवं स्तर के अनुसार निश्चित किये जाते होता है। इन विषयों में छात्रों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखा जाता है। 

(8) सीमित क्षेत्र (Limited field)- विद्यालयी ज्ञान के अन्तर्गत ज्ञान का क्षेत्र सीमित होता है। उसको आवश्यकता के अनुसार एक निश्चित समिति द्वारा ही विस्तृत रूप प्रदान किया जाता है। दूसरे शब्दों में विद्यालयी ज्ञान का परिदृश्य एक निश्चित क्षेत्र के आसपास ही घूमता है क्योंकि ये सामान्य बालकों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। विद्यालयी ज्ञानात्मक व्यवस्था को इस क्षेत्र से बाहर जाने का प्रयास नहीं होता। 

(9) निश्चित मूल्यांकन (Fixed evaluation)- सीमित मूल्यांकन प्रक्रिया के अन्तर्गत विद्यालय में परीक्षा की व्यवस्था में समानता एवं एकता पायी जाती है। इस मूल्यांकन प्रक्रिया में किसी विशेष छात्र के लिये कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया जा सकता। सामान्य रूप से विद्यालयों में ज्ञान के मूल्यांकन की प्रक्रिया भी सामान्य रूप से एक प्रकार की पायी जाती है उसमें विशेष कारणों से ही परिवर्तन किया जाता है। 

(10) रुचिपूर्ण शिक्षण (Interest teaching)- रुचिपूर्ण शिक्षण व्यवस्था विद्यालयी ज्ञान का प्रमुख अंग है। विद्यालयी व्यवस्था में शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी एवं रुचिपूर्ण बनाने के लिये शिक्षकों द्वारा उचित प्रयास किये जाते हैं। इसके लिये शिक्षण अधिगम सामग्री का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाता है तथा छात्रों की सहभागिता की प्रक्रिया को निश्चित रूप प्रदान किया जाता है। रुचिपूर्ण शिक्षण व्यवस्था के अन्तर्गत छात्रों के मानसिक एवं योग्यता के स्तर के साथ-साथ रुचियों का भी ध्यान रखा जाता है। 


2. अनुभवजन्य ज्ञान ( Experience based knowledge ) – अनुभवजन्य ज्ञान , ज्ञान प्राप्ति की एक महत्त्वपूर्ण व्यवस्था है जिसमें छात्र अपने स्वप्रयासों से तथा शिक्षक के सहयोग से ज्ञान प्राप्त करता है। अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त करने में बालक स्वतन्त्र होता है उस पर किसी प्रकार का कोई नियन्त्रण नहीं होता; जैसे- बालक आम खाने की अपेक्षा दूध पीकर दूध के बारे में ज्ञान प्राप्त करना चाहता है तो उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। इस प्रकार अनुभवजन्य ज्ञान में ज्ञान प्राप्त करना पूर्ण स्वतन्त्र होता है उसको किसी प्रकार के विशेष औपचारिक नियमों में नहीं बाँधा जा सकता। अनुभवजन्य ज्ञान को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जाता है-

(1) पारिवारिक एवं सामाजिक ज्ञान (Familial and social knowledge)- अनुभवजन्य ज्ञान के अन्तर्गत बालक द्वारा विद्यालय से बाहर प्राप्त ज्ञान भी सम्मिलित किया जा सकता है। इसमें बालक अपने परिवार में जो अनुभव करता है तथा विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का अवलोकन करता है उस ज्ञान को सम्मिलित किया जाता है। अतः परिवार एवं समाज के विभिन्न प्रकार के अनुभव अनुभवजन्य ज्ञान की श्रेणी में आते हैं। इस ज्ञान का क्षेत्र विद्यालयी भी इसमें समाहित किया जा सकता है। 

(2) परिचयात्मक ज्ञान की अधिकता (More identified knowledge)- प्रत्येक वस्तु से ज्ञाता का प्रत्यक्ष परिचय होता है, जैसे- एक बालक गाय को देखता है तो उसके अनुभवजन्य ज्ञान में परिचयात्मक ज्ञान की अधिकता होती है क्योंकि इस ज्ञान की प्रक्रिया में रंगरूप एवं आकार को आँखों से देखता है। अपने हाथों से उसको छूकर अनुभव करता है। उसके दूध को पीकर अनुभव करता है कि उसका स्वाद कैसा है? इस प्रकार अनुभवजन्य ज्ञान में परिचयात्मक ज्ञान की अधिकता होती है। 

(3) क्रमबद्धता का अभाव (Lack of system) - अनुभवजन्य ज्ञान में क्रमबद्धता का अभाव पाया जाता है। इस ज्ञान के लिये कोई निश्चित समय तालिका या किसी निश्चित व्यवस्था का सृजन नहीं होता। इस ज्ञान की प्राप्ति के सन्दर्भ में ज्ञाता की प्रमुख भूमिका होती है। ज्ञाता अपनी इच्छा के अनुसार भिन्न- भिन्न रुचियों के आधार पर ज्ञान प्राप्त करता है। इसमें ज्ञाता ज्ञान प्राप्त करने में पूर्ण स्वतन्त्र होता है। 

(4) अमूर्त ज्ञान की अधिकता (More trial knowledge)- अमूर्त ज्ञान को प्राप्त करने में अनुभवजन्य ज्ञान की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यह ज्ञान सामान्य रूप से मूर्त वस्तुओं से ही सम्बन्धित होता है। इसमें मूर्त वस्तु के सन्दर्भ में ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा अनुभव किया जाता है; जैसे- विभिन्न प्रकार की उपयोगी वस्तुओं के सन्दर्भ में प्राप्त ज्ञान अनुभवजन्य की श्रेणी में ही आता है। 

(5) व्यावहारिकता की अधिकता (More practicability)- अनुभवजन्य ज्ञान में व्यावहारिकता की अधिकता पायी जाती है। इसमें सैद्धान्तिकता का अभाव पाया जाता है। अनुभवजन्य ज्ञान का सम्बन्ध व्यावहारिक क्षेत्र से ही पाया जाता है; जैसे- योग के पश्चात् व्यक्ति का शारीरिक थकान से मुक्ति का अनुभव, गर्मी में छाया एवं ठण्डे जल का अनुभव आदि। इस प्रकार अनुभवजन्य ज्ञान में मूर्त वस्तुओं से ज्ञाता का सम्पर्क होता है। 

(6) व्यापक क्षेत्र (Broad field)- अनुभवजन्य ज्ञान का कोई निश्चित पाठ्यक्रम नहीं होता और न ही इसकी कोई सीमा होती है। इस ज्ञान म वस्तु का सम्बन्ध ज्ञाता से होता है तथा ज्ञाता जिन-जिन वस्तुओं के सम्पर्क में आता है उसके ज्ञान में वृद्धि होती है। इस प्रकार वह अनेक वस्तुओं के सम्पर्क में आता है तथा अपने अनुभवजन्य ज्ञान में वृद्धि करता है। 

(7) स्वमूल्यांकन (Self-evaluation)- अनुभवजन्य ज्ञान का मूल्यांकन भी स्वयं छात्र द्वारा अर्थात् ज्ञाता द्वारा किया जाता है। प्रत्येक छात्र जो भी ज्ञान वस्तु के सन्दर्भ में प्राप्त करता है वह उसे सत्य एवं वैध मानकर स्वयं ही उसका मूल्यांकन करता है। अर्थात् जिस वस्तु के सन्दर्भ में ज्ञाता जो ज्ञान का अनुभव करता है वही उसकी वैधता एवं विश्वसनीयता को प्रमाणित करता है। 

(8) स्वअधिगम प्रक्रिया (Self learning process)- इस प्रकार के ज्ञान में शिक्षक द्वारा किसी प्रकार के शिक्षण की आवश्यकता नहीं होती । इसमें ज्ञान प्राप्त करने वाला स्वयं इन्द्रियों की सहायता से अनुभव द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है। उदाहरणार्थ, एक बालक अपने घर में पालतू कुत्ते को देखता है तो वह उसकी विशेषताओं एवं गतिविधियों का अनुभव स्वयं करता है तथा उसके सन्दर्भ में अवधारणा का निर्माण करता है। इस प्रकार अनुभवजन्य ज्ञान में स्व- अधिगम प्रक्रिया सम्पन्न होती है। 

(9) वैधता का समावेश (Inclusion of validity)- अनुभवजन्य ज्ञान में वैधता का पूर्ण प्रभाव पाया जाता है क्योंकि ज्ञाता द्वारा इसको स्वयं प्राप्त किया जाता है इसलिये ज्ञाता इस ज्ञान की वैधता पर कोई सन्देह नहीं करता। उदाहरणार्थ, जब बालक अपने घर में देखता है कि मेज हरे रंग की है तो इस प्राप्त ज्ञान को सदैव वह वैध ज्ञान के रूप में स्वीकार करेगा क्योंकि उसने मेज के हरे रंग को अपनी आँखों से देखा है।

 (10) विश्वसनीयता का समावेश (Inclusion of reliability)- अनुभवजन्य ज्ञान में विश्वसनीयता का समावेश होता है क्योंकि अन्य किसी के द्वारा कहे गये ज्ञान या कथन के बारे में अविश्वास किया जा सकता है परन्तु ज्ञाता जिन तथ्यों का स्वय अनुभव करता है उनको वह अविश्वसनीय नहीं मान सकता। उदाहरणार्थ, एक बालक जब यह अनुभव करता है कि आग जलाने का कार्य करती है तो वह इस ज्ञान को विश्वसनीय रूप में ही स्वीकार करेगा क्योंकि उसने आग से जलने का अनुभव प्राप्त किया है।

 

फ्रेडरिक फ्रोबेल (Frobel)

फ्रोबेल
Frobel



    फ्रेडरिक फ्रोबेल का जन्म 21, अप्रैल, 1782 को दक्षिणी जर्मनी के एक गाँव में हुआ था। जब वह नौ महीने का ही था उसकी माता का देहान्त हो गया। पिता से बालक फ्रोबेल को उपेक्षा मिली। विमाता उससे घृणा करती थी। इससे फ्रोबेल प्रारम्भ से ही नितान्त एकाकी हो गया। फ्रोबेल पर इस एकाकीपन का प्रभाव पड़ा और वह आत्मनिष्ठ हो गया। वह प्रकृति के सान्निध्य में अपना समय व्यतीत करने लगा।
 
    इसके दो परिणाम हुए: पहला, उसमें अन्तदर्शन की क्षमता विकसित हो गई। दूसरा, जड़ और प्रकृति में भी उसे अपना स्वरूप दिखने लगा। इसी के आधार पर उसने ‘अनेकता में एकता’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।कुछ समय फ्रोबेल ने अपने मामा के साथ बिताये। इस दौरान उसे विद्यालय जाने का अवसर मिला पर शिक्षा में उसकी प्रगति असन्तोषजनक रही। पन्द्रह वर्ष की अवस्था में एक फोरेस्टर के अधीन कार्य सीखने का अवसर मिला पर    प्रकृति-प्रेम के अतिरिक्त वह कोई प्रशिक्षण नहीं ले सका। 
 
    सत्रह वर्ष की अवस्था में फ्रोबेल ने जेना विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया पर अपनी निर्धनता के कारण वह शिक्षा पूरी नहीं कर पाया। घर वापस आकर कृषि-कार्य में हाथ बटाँने लगा। 1802 में पिता की मृत्यु के बाद फ्रोबेल ने इधर-उधर भटकते हुए विभिन्न तरह की नौकरियाँ की पर वह सफल नहीं हुआ। अंततः फ्रेंकफर्ट में हेर ग्रूनर के निमन्त्रण पर एक नार्मल स्कूल में ड्राइंग का अध्यापक बन गया। 
 
    सन् 1808 में फ्रोबेल पेस्टोलॉजी की शिक्षा व्यवस्था के अवलोकन हेतु वरडेन पहुँचा। उसने वहाँ बच्चों के संदर्भ में दो बातों को गहराई से महसूस किया। पहला, बच्चों के आत्मभाव प्रकाशन हेतु संगीत आवश्यक है, तथा, दूसरा, बच्चों की ड्राइंग में विशेष रूचि होती है।फ्रोबेल की रूचि वैज्ञानिक सिद्धान्तों में बढ़ती जा रही थी। उसने गणित और खनिज विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु पहले गोरिन्जन विश्वविद्यालय और बाद में बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। 
 
    बर्लिन में उन्होंने प्रख्यात विद्वान प्रोफेसर वीज के संरक्षण में गहन अध्ययन किया। नेपोलियन ने जब जर्मनी पर आक्रमण किया तो फ्रोबेल उसके विरूद्ध जर्मनी की सेना में भर्ती हुआ। 1814 ई0 में फ्रोबेल बर्लिन म्यूजियम का सहायक क्यूरेटर नियुक्त हुआ। वह खनिज-विज्ञान का अध्यापक नियुक्त हुआ।
 
    फ्रोबेल के जीवन का सर्वाधिक रचनात्मक काल की शुरूआत 1817 ई0 में होती है जब उसने अपने दो भतीजों एवं कुछ अन्य लड़को को लेकर कीलहाऊ में एक विद्यालय की स्थापना की। 
 
    यहीं पर 1826 ई0 में फ्रोबेल ने विल्हेमिन होफमिस्टर नामक सम्पन्न महिला से विवाह किया। इससे फ्रोबेल के सारे आर्थिक संकट समाप्त हो गए। कीलहाऊ में ही उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एडुकेशन ऑफ मैन’ की रचना की। इसके उपरान्त स्विटजरलैंड में फ्रोबेल ने कई संस्थाओं का संचालन किया। अब फ्रोबेल पूर्व विद्यालय शिक्षा में सुधार हेतु व्यावहारिक कार्य करना चाहता था। इस उद्देश्य से 1837 ई0 में जर्मनी के पहाड़ी क्षेत्र के ब्लैकनवर्ग नामक गाँव में प्रथम ‘किण्डरगार्टेन’ की स्थापना की। इसके उपरान्त फ्रोबेल जीवन पर्यन्त ‘किण्डरगार्टेन’ के आन्दोलन को आगे बढ़ाने में लगा रहा। अन्ततः 1852 में इस महान शिक्षाशास्त्री की मृत्यु हो गई।

फ्रेडरिक फ्रोबेल के दार्शनिक विचार  
 
दार्शनिक विचारधारा के विकास के इस बिन्दु पर फ्रोबेल के विचारों का प्रादुर्भाव हुआ। शैलिंग एवं हीगल के दर्शन के आधार पर फ्रोबेल ने अपना ‘एकता का सिद्धान्त’ का विकास किया। वह ‘एडुकेशन ऑफ मेन’ में लिखता है ‘‘यह एकता का सिद्धान्त बाह्य-प्रकृति एवं आत्म-प्रकृति में एक-सा ही व्यक्त है। जीवन भौतिक एवं आत्मन् के समन्वय का परिणाम है। बिना पदार्थ के आत्मन् आकारहीन है और बिना मनस् के पदार्थ प्राणहीन है।’’
 
फ्रोबेल पर हीगल के द्वन्द्वात्मक विचारों का भी प्रभाव दिखता है। फ्रोबेल कहते हैं ‘‘प्रत्येक सत्ता तभी प्रत्यक्ष होती है जब वह अपने से भिन्न सत्ता के साथ उपस्थित होती है और जब उस तत्व से उसकी समानता-असमानता स्पष्ट हो चुकी होती है।’’ फ्रोबेल पर जर्मन दार्शनिक के0सी0एफ0 क्राउस का भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। जिसने ज्ञान की विभिन्न विधियों एवं क्षेत्रों में समन्वय स्थापित किया। क्राउस प्रकृति एवं तर्क (विचार) दोनों में ही ईश्वर का दर्शन करता है।
 
विकास का सिद्धान्त
फ्रोबेल के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति विकास की पाँच भिन्न-भिन्न अवस्थाओं से गुजरता है। ये हैं-
 
शैशव काल (जन्म से तीन वर्ष की अवधि)- इस काल में बच्चे के इन्द्रिय या संवेदी विकास पर जोर दिया जाना चाहिए। 
बाल्यकाल (तीन से पाँच वर्ष तक की अवधि)- इस काल में भाषा का विकास होता है। शरीर की जगह मस्तिष्क पर ध्यान दिया जाने लगता है। सभी वस्तुओं का सही नाम बच्चों को इस काल में बताया जाना चाहिए। साथ ही सही उच्चारण का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। 
कैशोर्य (छह से चैदह वर्ष तक की अवधि), 
तरूण (चैदह से अठारह वर्ष तक की कालखंड), तथा 
प्रौढ़ (अठारह वर्ष के बाद की अवधि)। प्रत्येक भावी स्तर का विकास बहुत हद तक पिछले स्तर के विकास पर निर्भर करता है।

फ्रेडरिक फ्रोबेल का शिक्षा-दर्शन 
फ्रोबेल इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि सारी संभावनायें, क्षमतायें एवं शक्तियाँ बालक के अन्दर निहित है। शिक्षा व्यवस्था का कार्य विद्यार्थियों को उपयुक्त वातावरण एवं अवसर प्रदान करता है ताकि विद्यार्थी अन्तर्निहित संभावनाओं एवं क्षमताओं के अनुरूप अधिक से अधिक विकास कर सके। विकास वस्तुतः अन्दर से आरम्भ होता है। बाहर से इसे थोपा नहीं जा सकता है। शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में बालक को बाहर से उतना नहीं देना पड़ता है जितना अन्तर्निहित शक्तियों का प्रकाशन करना। बिना आवश्यकता अनुभव किए बालक शायद ही कुछ सीख सके। 
 
शिक्षा का उद्देश्य 
  • एकता या सामन्जस्य का बोध
  • व्यक्ति में आध्यात्मिक प्रकृति को जागृत करना
  • स्वतंत्रता एवं आन्तरिक संकल्प शक्ति का विकास
  • सामाजिक भावना का विकास
  • चरित्र निर्माण

शिक्षा की योजना 
    फ्रोबेल ने बच्चों की शिक्षा के लिए व्यापक योजना बनाई। अपनी शैक्षिक योजना में फ्रोबेल ने बच्चे की आत्म-क्रिया एवं खेल को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना।

शैक्षिक प्रक्रिया में क्रिया का स्थान 
फ्रोबेल ने शिक्षा में तीन प्रकार की क्रियाओं का उल्लेख किया है:-
  • आवश्त्यात्मक या लयात्मक क्रियायें 
  • वस्तुओं पर आधारित क्रियायें 
  • कार्य एवं व्यवसाय 

खेल 
    फ्रोबेल खेल को बालक की शिक्षा का एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। फ्रोबेल ने खेल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा ‘‘खेल मनुष्य के लिए, विशेषतः बालक के लिए उसके अन्तःजगत एवं बाह्य-जगत का दर्पण है और इस दर्पण की भीतर से आवश्यकता है। अतः यह जीवन एवं लगन-शक्ति को व्यक्त करने वाली प्रवृति है।’’ इस प्रकार मानव-शिक्षा के इतिहास में फ्रोबेल पहला व्यक्ति है जिसने खेल के शैक्षिक महत्व को समझा और इसे शिक्षा का माध्यम बना दिया। फ्रोबेल ने खेल को आत्मप्रेरित, आत्मनियन्त्रित एवं स्वचालित क्रिया माना। ‘उपहार’ भी खेल साम्रगी है। 

विद्यालयी पाठ्यक्रम 
    फ्रोबेल पाठ्यक्रम का विभाजन चार प्रमुख भागों में करते हैंः (अ) धर्म एवं धार्मिक शिक्षा (ब) प्राकृतिक विज्ञान एवं गणित (स) भाषा एवं (द) कला एवं कलात्मक वस्तु। इन विषयों के अध्ययन से छात्रों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास संभव हो सकता है। शिक्षा के इतिहास में फ्रोबेल पहला व्यक्ति था जिसने ‘क्रिया’ को पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान दिया।

किण्डरगार्टन
    ‘किण्डरगार्टन’ नाम फ्रोबेल के मस्तिष्क में 1840 ई0 में आया जब वह बसन्त ऋतु में एक दिन अपने मित्रों के साथ किलहाउ से बेन्कनड्रग जा रहा था। उसने एक पहाड़ी से रीने नदी की घाटी को देखा जो उसे एक अतिसुन्दर बगीचे की तरह मनमोहक लगी। वह चिल्ला उठा ‘‘मुझे मिल गया। मेरी संस्था का नाम किण्डरगार्टन होगा।’’ यद्यपि वास्तविक रूप में 1843 ई0 के पहले किण्डरगार्टन की स्थापना नहीं की गई पर उपर्युक्त घटना के आधार पर किण्डरगार्टन की स्थापना का वर्ष 1840 बताया जाता है।

शिक्षण-विधि 
  • खेल विधि 
  • आत्मक्रिया विधि 
  • स्वतंत्र एवं निरन्तर सीखने की विधि 
  • वस्तुओं से सीखने की विधि 

अध्यापक का कार्य  
    फ्रोबेल के अनुसार बालक की खेल प्रवृतियों का ठीक दिशा में संचालन किया जाना चाहिए। समुचित निर्देशन के आभाव में खेल एक उद्देश्यहीन क्रिया बनकर रह जाती है। खेल का उचित दिशा में संचालन में अध्यापकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। 
 
    फ्रोबेल ने आन्तरिक विकास पर बहुत अधिक जोर दिया है। इससे बाह्य विकास की उपेक्षा हुई। वस्तुतः आन्तरिक एवं बाह्य दोनों पक्षों का ही समन्वित विकास होना चाहिए।
    किण्डरगार्टन के गीत, खेल उपहारों के प्रयोग में अनुकरण एवं निर्देश पर काफी जोर है। वस्तुतः बच्चों को स्वतः क्रिया करने का अवसर मिलना चाहिए।

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