बुधवार, 28 अप्रैल 2021

फ्रेडरिक फ्रोबेल (Frobel)

फ्रोबेल
Frobel



    फ्रेडरिक फ्रोबेल का जन्म 21, अप्रैल, 1782 को दक्षिणी जर्मनी के एक गाँव में हुआ था। जब वह नौ महीने का ही था उसकी माता का देहान्त हो गया। पिता से बालक फ्रोबेल को उपेक्षा मिली। विमाता उससे घृणा करती थी। इससे फ्रोबेल प्रारम्भ से ही नितान्त एकाकी हो गया। फ्रोबेल पर इस एकाकीपन का प्रभाव पड़ा और वह आत्मनिष्ठ हो गया। वह प्रकृति के सान्निध्य में अपना समय व्यतीत करने लगा।
 
    इसके दो परिणाम हुए: पहला, उसमें अन्तदर्शन की क्षमता विकसित हो गई। दूसरा, जड़ और प्रकृति में भी उसे अपना स्वरूप दिखने लगा। इसी के आधार पर उसने ‘अनेकता में एकता’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।कुछ समय फ्रोबेल ने अपने मामा के साथ बिताये। इस दौरान उसे विद्यालय जाने का अवसर मिला पर शिक्षा में उसकी प्रगति असन्तोषजनक रही। पन्द्रह वर्ष की अवस्था में एक फोरेस्टर के अधीन कार्य सीखने का अवसर मिला पर    प्रकृति-प्रेम के अतिरिक्त वह कोई प्रशिक्षण नहीं ले सका। 
 
    सत्रह वर्ष की अवस्था में फ्रोबेल ने जेना विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया पर अपनी निर्धनता के कारण वह शिक्षा पूरी नहीं कर पाया। घर वापस आकर कृषि-कार्य में हाथ बटाँने लगा। 1802 में पिता की मृत्यु के बाद फ्रोबेल ने इधर-उधर भटकते हुए विभिन्न तरह की नौकरियाँ की पर वह सफल नहीं हुआ। अंततः फ्रेंकफर्ट में हेर ग्रूनर के निमन्त्रण पर एक नार्मल स्कूल में ड्राइंग का अध्यापक बन गया। 
 
    सन् 1808 में फ्रोबेल पेस्टोलॉजी की शिक्षा व्यवस्था के अवलोकन हेतु वरडेन पहुँचा। उसने वहाँ बच्चों के संदर्भ में दो बातों को गहराई से महसूस किया। पहला, बच्चों के आत्मभाव प्रकाशन हेतु संगीत आवश्यक है, तथा, दूसरा, बच्चों की ड्राइंग में विशेष रूचि होती है।फ्रोबेल की रूचि वैज्ञानिक सिद्धान्तों में बढ़ती जा रही थी। उसने गणित और खनिज विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु पहले गोरिन्जन विश्वविद्यालय और बाद में बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। 
 
    बर्लिन में उन्होंने प्रख्यात विद्वान प्रोफेसर वीज के संरक्षण में गहन अध्ययन किया। नेपोलियन ने जब जर्मनी पर आक्रमण किया तो फ्रोबेल उसके विरूद्ध जर्मनी की सेना में भर्ती हुआ। 1814 ई0 में फ्रोबेल बर्लिन म्यूजियम का सहायक क्यूरेटर नियुक्त हुआ। वह खनिज-विज्ञान का अध्यापक नियुक्त हुआ।
 
    फ्रोबेल के जीवन का सर्वाधिक रचनात्मक काल की शुरूआत 1817 ई0 में होती है जब उसने अपने दो भतीजों एवं कुछ अन्य लड़को को लेकर कीलहाऊ में एक विद्यालय की स्थापना की। 
 
    यहीं पर 1826 ई0 में फ्रोबेल ने विल्हेमिन होफमिस्टर नामक सम्पन्न महिला से विवाह किया। इससे फ्रोबेल के सारे आर्थिक संकट समाप्त हो गए। कीलहाऊ में ही उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एडुकेशन ऑफ मैन’ की रचना की। इसके उपरान्त स्विटजरलैंड में फ्रोबेल ने कई संस्थाओं का संचालन किया। अब फ्रोबेल पूर्व विद्यालय शिक्षा में सुधार हेतु व्यावहारिक कार्य करना चाहता था। इस उद्देश्य से 1837 ई0 में जर्मनी के पहाड़ी क्षेत्र के ब्लैकनवर्ग नामक गाँव में प्रथम ‘किण्डरगार्टेन’ की स्थापना की। इसके उपरान्त फ्रोबेल जीवन पर्यन्त ‘किण्डरगार्टेन’ के आन्दोलन को आगे बढ़ाने में लगा रहा। अन्ततः 1852 में इस महान शिक्षाशास्त्री की मृत्यु हो गई।

फ्रेडरिक फ्रोबेल के दार्शनिक विचार  
 
दार्शनिक विचारधारा के विकास के इस बिन्दु पर फ्रोबेल के विचारों का प्रादुर्भाव हुआ। शैलिंग एवं हीगल के दर्शन के आधार पर फ्रोबेल ने अपना ‘एकता का सिद्धान्त’ का विकास किया। वह ‘एडुकेशन ऑफ मेन’ में लिखता है ‘‘यह एकता का सिद्धान्त बाह्य-प्रकृति एवं आत्म-प्रकृति में एक-सा ही व्यक्त है। जीवन भौतिक एवं आत्मन् के समन्वय का परिणाम है। बिना पदार्थ के आत्मन् आकारहीन है और बिना मनस् के पदार्थ प्राणहीन है।’’
 
फ्रोबेल पर हीगल के द्वन्द्वात्मक विचारों का भी प्रभाव दिखता है। फ्रोबेल कहते हैं ‘‘प्रत्येक सत्ता तभी प्रत्यक्ष होती है जब वह अपने से भिन्न सत्ता के साथ उपस्थित होती है और जब उस तत्व से उसकी समानता-असमानता स्पष्ट हो चुकी होती है।’’ फ्रोबेल पर जर्मन दार्शनिक के0सी0एफ0 क्राउस का भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। जिसने ज्ञान की विभिन्न विधियों एवं क्षेत्रों में समन्वय स्थापित किया। क्राउस प्रकृति एवं तर्क (विचार) दोनों में ही ईश्वर का दर्शन करता है।
 
विकास का सिद्धान्त
फ्रोबेल के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति विकास की पाँच भिन्न-भिन्न अवस्थाओं से गुजरता है। ये हैं-
 
शैशव काल (जन्म से तीन वर्ष की अवधि)- इस काल में बच्चे के इन्द्रिय या संवेदी विकास पर जोर दिया जाना चाहिए। 
बाल्यकाल (तीन से पाँच वर्ष तक की अवधि)- इस काल में भाषा का विकास होता है। शरीर की जगह मस्तिष्क पर ध्यान दिया जाने लगता है। सभी वस्तुओं का सही नाम बच्चों को इस काल में बताया जाना चाहिए। साथ ही सही उच्चारण का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। 
कैशोर्य (छह से चैदह वर्ष तक की अवधि), 
तरूण (चैदह से अठारह वर्ष तक की कालखंड), तथा 
प्रौढ़ (अठारह वर्ष के बाद की अवधि)। प्रत्येक भावी स्तर का विकास बहुत हद तक पिछले स्तर के विकास पर निर्भर करता है।

फ्रेडरिक फ्रोबेल का शिक्षा-दर्शन 
फ्रोबेल इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि सारी संभावनायें, क्षमतायें एवं शक्तियाँ बालक के अन्दर निहित है। शिक्षा व्यवस्था का कार्य विद्यार्थियों को उपयुक्त वातावरण एवं अवसर प्रदान करता है ताकि विद्यार्थी अन्तर्निहित संभावनाओं एवं क्षमताओं के अनुरूप अधिक से अधिक विकास कर सके। विकास वस्तुतः अन्दर से आरम्भ होता है। बाहर से इसे थोपा नहीं जा सकता है। शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में बालक को बाहर से उतना नहीं देना पड़ता है जितना अन्तर्निहित शक्तियों का प्रकाशन करना। बिना आवश्यकता अनुभव किए बालक शायद ही कुछ सीख सके। 
 
शिक्षा का उद्देश्य 
  • एकता या सामन्जस्य का बोध
  • व्यक्ति में आध्यात्मिक प्रकृति को जागृत करना
  • स्वतंत्रता एवं आन्तरिक संकल्प शक्ति का विकास
  • सामाजिक भावना का विकास
  • चरित्र निर्माण

शिक्षा की योजना 
    फ्रोबेल ने बच्चों की शिक्षा के लिए व्यापक योजना बनाई। अपनी शैक्षिक योजना में फ्रोबेल ने बच्चे की आत्म-क्रिया एवं खेल को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना।

शैक्षिक प्रक्रिया में क्रिया का स्थान 
फ्रोबेल ने शिक्षा में तीन प्रकार की क्रियाओं का उल्लेख किया है:-
  • आवश्त्यात्मक या लयात्मक क्रियायें 
  • वस्तुओं पर आधारित क्रियायें 
  • कार्य एवं व्यवसाय 

खेल 
    फ्रोबेल खेल को बालक की शिक्षा का एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। फ्रोबेल ने खेल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा ‘‘खेल मनुष्य के लिए, विशेषतः बालक के लिए उसके अन्तःजगत एवं बाह्य-जगत का दर्पण है और इस दर्पण की भीतर से आवश्यकता है। अतः यह जीवन एवं लगन-शक्ति को व्यक्त करने वाली प्रवृति है।’’ इस प्रकार मानव-शिक्षा के इतिहास में फ्रोबेल पहला व्यक्ति है जिसने खेल के शैक्षिक महत्व को समझा और इसे शिक्षा का माध्यम बना दिया। फ्रोबेल ने खेल को आत्मप्रेरित, आत्मनियन्त्रित एवं स्वचालित क्रिया माना। ‘उपहार’ भी खेल साम्रगी है। 

विद्यालयी पाठ्यक्रम 
    फ्रोबेल पाठ्यक्रम का विभाजन चार प्रमुख भागों में करते हैंः (अ) धर्म एवं धार्मिक शिक्षा (ब) प्राकृतिक विज्ञान एवं गणित (स) भाषा एवं (द) कला एवं कलात्मक वस्तु। इन विषयों के अध्ययन से छात्रों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास संभव हो सकता है। शिक्षा के इतिहास में फ्रोबेल पहला व्यक्ति था जिसने ‘क्रिया’ को पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान दिया।

किण्डरगार्टन
    ‘किण्डरगार्टन’ नाम फ्रोबेल के मस्तिष्क में 1840 ई0 में आया जब वह बसन्त ऋतु में एक दिन अपने मित्रों के साथ किलहाउ से बेन्कनड्रग जा रहा था। उसने एक पहाड़ी से रीने नदी की घाटी को देखा जो उसे एक अतिसुन्दर बगीचे की तरह मनमोहक लगी। वह चिल्ला उठा ‘‘मुझे मिल गया। मेरी संस्था का नाम किण्डरगार्टन होगा।’’ यद्यपि वास्तविक रूप में 1843 ई0 के पहले किण्डरगार्टन की स्थापना नहीं की गई पर उपर्युक्त घटना के आधार पर किण्डरगार्टन की स्थापना का वर्ष 1840 बताया जाता है।

शिक्षण-विधि 
  • खेल विधि 
  • आत्मक्रिया विधि 
  • स्वतंत्र एवं निरन्तर सीखने की विधि 
  • वस्तुओं से सीखने की विधि 

अध्यापक का कार्य  
    फ्रोबेल के अनुसार बालक की खेल प्रवृतियों का ठीक दिशा में संचालन किया जाना चाहिए। समुचित निर्देशन के आभाव में खेल एक उद्देश्यहीन क्रिया बनकर रह जाती है। खेल का उचित दिशा में संचालन में अध्यापकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। 
 
    फ्रोबेल ने आन्तरिक विकास पर बहुत अधिक जोर दिया है। इससे बाह्य विकास की उपेक्षा हुई। वस्तुतः आन्तरिक एवं बाह्य दोनों पक्षों का ही समन्वित विकास होना चाहिए।
    किण्डरगार्टन के गीत, खेल उपहारों के प्रयोग में अनुकरण एवं निर्देश पर काफी जोर है। वस्तुतः बच्चों को स्वतः क्रिया करने का अवसर मिलना चाहिए।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986


  • 1948 में डॉ॰ राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के गठन के साथ ही भारत में शिक्षा-प्रणाली को व्यवस्थित करने का काम शुरू हो गया था।
  • 1952 में लक्षमणस्वामी मुदलियार की अध्यक्षता में गठित माध्यमिक शिक्षा आयोग, तथा 1964 में दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में गठित भारतीय शिक्षा आयोग की अनुशंशाओं के आधार पर 1968 में शिक्षा नीति पर एक प्रस्ताव प्रकाशित किया गया जिसमें ‘राष्ट्रीय विकास के प्रति वचनबद्ध, चरित्रवान तथा कार्यकुशल’ युवक-युवतियों को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया।
  • मई 1986 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गई, जो अब तक चल रही है। इस बीच राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा के लिए 1990 में आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति, तथा 1993 में प्रो. यशपाल समिति का गठन किया गया।
  • नई शिक्षा नीति 2020 भारत की शिक्षा नीति है जिसे भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई 2020 को घोषित किया गया। सन 1986 में जारी हुई नई शिक्षा नीति के बाद भारत की शिक्षा नीति में यह पहला नया परिवर्तन है। यह नीति अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट पर आधारित है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986
National Education Policy 1986 

  • राष्ट्र आर्थिक एवं तकनीकि विकास के दौर में उपलब्ध संसाधनों से अधिकतम लाभ उठाने तथा परिवर्तन का लाभ सभी वर्गाे तक पहुँचने के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए। इस लक्ष्य को प्राप्त करने का एक मार्ग शिक्षा है इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने जनवरी 1985 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण करने की घोषणा की थी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रावधान 
  • भारत सरकार ने 24 जुलाई 1968 को स्वतंत्र भारत की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की तथा इस पर अमल होना प्रारम्भ हो गया।
  • मार्च 1977 में केंद्र में जनता दल की सरकार बनी इस सरकार के बनते ही नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण हुआ तथा 1979 में इसे घोषित कर दिया गया। इस शिक्षा नीति को संसद में पास होने के बाद मई 1986 में इसे प्रकाशित किया गया। तथा इसकी कार्ययोजना को भी प्रकाशित किया गया। भारत  की राष्ट्रीय शिक्षा नीति1986 पहली नीति है जिसमें नीति के साथ साथ उसको पूरा करने की योजना भी प्रस्तुत की गयी।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति निर्माण की प्रक्रिया के दौरान भारत सरकार ने अगस्त 1985 में एक दस्तावेज -शिक्षा की चुनौती: नीति संबंधी परिप्रेक्ष्य जारी किया था। इस दस्तावेज को जारी करने का उद्देश्य शिक्षा नीति के संबंध में देशव्यापी विचार विमर्श को प्रोत्साहित करना था जिससे कि नई शिक्षा नीति के निर्माण के लिए पर्याप्त आधार तैयार हो सके तथा समाज के विभिन्न वर्ग अपने विचारों, माँगों तथा आवश्यकताओं को नई नीति के निर्माणकों के सम्मुख रख सके।
  • आशा के अनुरूप उस दस्तावेज पर संपूर्ण भारत में पर्याप्त विचार विमर्श हुआ तथा विभिन्न वर्गों, बौद्धिक सामाजिक, राजनैतिक, व्यावसायिक, प्रशासकीय आदि ने अपनी अपनी प्रतिक्रियाए व्यक्त की। मई 1986 में भारत सरकार ने शिक्षा नीति - 1986 का प्रारूप तैयार करके जारी कर दिया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 1986 को कुल 12 खंड़ों में बाँटा गया है जिनमें कुल 157 बिंदुओं मे अंतर्गत नई शिक्षा नीति को लिपीबद्ध किया गया है। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का दस्तावेज 

  • राष्ट्रीय शिक्षा 1986 का दस्तावेज कुल 12 भागों में विभाजित है।
खण्ड एक -प्रस्तावना (introduction)
  • राष्ट्र में आर्थिक एवं तकनीकी विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों से अधिक से अधिक लाभ सभी वर्गो तक पहुँचाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए भारतीय शिक्षा आज ऐसी जगह आकर खड़ी है जहाँ पर देश की परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ है। देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही  है जिससे लोकतन्त्र के लक्ष्यों को प्राप्त करने में समस्या आ रही है। इसके अलावा भविष्य में अनेक समस्याओं का सामना करना होगा। नई चुनौतियों तथा सामाजिक आवश्यकताओं ने सरकार के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वह एक नई शिक्षा नीति तैयार करे तथा उसे क्रियान्वित  करे।
खण्ड दो -शिक्षा का सार, भूमिका  (Essence of Education Introduction)
  • शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। शिक्षा के द्वारा मनुष्य के अन्दर मानसिक शारीरिक चारित्रिक, सांस्कृतिक, लोकतन्त्रीय गुणों का विकास होता है शिक्षा मनुष में स्वतन्त्र सोच तथा चिन्तन का विकास करती है। शिक्षा के द्वारा प्रजातन्त्रीय लक्ष्य दृ समानता,  स्वतन्त्रता, भ्रातृत्व, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और न्याय की प्राप्ति कर सकते हैं। यह आर्थिक विकास करने में सहायक है। शिक्षा के द्वारा वर्तमान और भविष्य का निर्माण कर सकते है इसलिए शिक्षा वास्तव में एक उत्तम साधन है।
खण्ड तीन-राष्ट्रीय प्रणाली (National System)
  • शिक्षा के द्वार सभी के लिए जाति, धर्म व लिंग में भेदभाव के बिना समान रूप से खुले हैं। शिक्षा की राष्ट्रीय प्रणाली से तात्पर्य एक समान शिक्षा सरंचना से है सम्पूर्ण देश में 10+2+3 शिक्षा 10 वर्षीय शिक्षा में 5 वर्षीय प्राथमिक शिक्षा तथा 3 वर्षीय उच्च प्राथमिक शिक्षा और उसके बाद 2 वर्षीय हाईस्कूल शिक्षा की व्यवस्था होगी, 2 वर्षीय पर इण्टरमीडिएट शिक्षा तथा, 3 वर्षीय पर स्नातक शिक्षा प्रदान की जाएगी।
खण्ड चार- समानता के लिए शिक्षा (Education for Equality)
  • शिक्षा नीति में असमानताओं को दूर करके सभी के लिए शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराये जाएंगे। महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए शिक्षा का प्रयोग साधन के रूप में किया जाएगा। शिक्षण संस्थाओं में महिला विकास के कार्यक्रम शुरू कराए जाएंगे। जिन कारणों से बालिकायें अशिक्षित रह जाती है, सबसे पहले उन कारणों का समाधान किया जाएगा। निर्धन परिवारों के बच्चों को 14 वर्ष तक की अनिवार्य शिक्षा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। अनुसूचित जातियों के लिए छात्रवृत्ति तथा छात्रावासों की व्यवस्था की जाएगी।अनुसूचित जातियों के लिए शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार करने सम्बन्धी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगारकार्यक्रम तथा रोजगार गारण्टी कार्यक्रमों की व्यवस्था की जाएगी।






















 

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

कोठारी आयोग 1964-66 (Kothari Commission 1964-66)

 कोठारी आयोग 1964-66
Kothari Commission 1964-66


    14 जुलाई 1964 को अपने प्रस्ताव में भारत सरकार ने आयोग की नियुक्ति की इसे भारतीय शिक्षा आयोग(1964-66) कहते है। इस आयोग क अध्यक्ष प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. डी. एस. कोठारी थे (दौलत सिंह कोठारी) उनके नाम पर इस आयोग को कोठारी कमीशन के नाम से भी जाना जाता है।
कोठारी आयोग की नियुक्ति के कारण 
    शिक्षा में प्रगति हेतु 1948 ई. राधाकृष्णन् आयोग व 1952 ई. में मुदालियर आयोग की स्थापना की गयी। इन आयोगों की संस्तुतियाँ आंशिक रूप से क्रियान्वित की जा सकी जिससे शिक्षा क्षेत्र में सुधार कम हुआ और दोष अधिक आ गए, अतः इन दोनो को दूर करने के लिए 1964 ई. मे एक अन्य शिक्षा आयोग की नियुक्ति की गई जिसके अध्यक्ष श्री. दौलतसिंह कोठारी थे और इन्ही के नाम पर इसे कोठारी आयोग के नाम से जाना गया। इस आयोग की नियुक्ति 4 जुलाई 1964 को की गई तथा गाँधी जयन्ती के दिन (2 अक्टूबर) को यह क्रियाशील हुआ। डाॅ. कोठारी उस समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष थे।
कोठारी आयोग के सदस्य
अध्यक्ष:- प्रो डी. एस. कोठारी, विश्वविद्यालय अनुदान, नई दिल्ली।
सचिव:- श्री जे. पी. नायक, अध्यक्ष, शैक्षिक नियोजन प्रशासन एंव वित्त विभाग, गोखले राजनिति एवं अर्थशारूत्र संस्थान पूना।
सहसचिव:- श्री जे. एफ मेन्डूगल, सहायक निदेशक स्कूल और उच्च शिक्षा विभाग यूनेस्कों, पेरिस।
सदस्य:- 
  • श्री ए. आर. दाउद, कार्यावाहक निदेशक माध्यमिक शिक्षा प्रसार कार्यावाहक निदेशालय नई दिल्ली।
  • श्री एच. इलविन निदेशक, शिक्षा संस्थान, लन्दन विश्वविद्यालय लन्दन। 
  • श्री आर. ए. गोपालस्वामी, निदेशक इन्स्टीट्यूट ऑफ एप्लाई मैन-पावर रिसर्च न्यू दिल्ली।
  • प्रो. सतादोसी इहारा स्कूल ऑफ साइस एण्ड इंजीनियरिंग वासेडा यूनिवर्सिटी टोकियों (जापान)
  • डाॅ. वी. एस. झा, डायरेक्टर ऑफ काॅमनवेल्थ एजूकेशन लिया इसन यूनिट लन्दन (इग्लैण्ड)
  • श्री पी. एन कृपाल, शिक्षा सलाहकार एंव सचिव, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।
  • प्रो. एम. वी. माथुर, उप कुलपति राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर।
  • डाॅ. बी. पी. पाल, डायरेक्टर, एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीटयूट, नई दिल्ली।
  • के. एस. पाणणिडकर, हैड ऑफ दि डिपार्टमेन्ट ऑफ एजूकेशन, कर्नाटक यूनिवर्सिटी, धाखाड।
  • प्रो. रोजर रिवेली, डायरेक्टर, सेन्टर फाॅर पापूलेशन स्टडीज, हारवार्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ, हारवार्ड यूनीवर्सिटी, केम्ब्रिज, यू.एस.ए.।
  • डाॅ. के. जी. सेयदेन, डायरेक्टर, एशियन इनस्टीट्यूट ऑफ एजूकेशन प्लानिंग एण्ड एडमिनिस्ट्रेशन, नई दिल्ली।
  • डाॅ. टी. सेन, उपकुलपति, जाधवपुर विश्वविद्यालय, कलकत्ता।
  • प्रो. एस. एस सुमोवस्की, प्रोफसर ऑफ फिजिक्स, मास्को यूनीवर्सिटी, मास्को (रूस)
  • एम. जी. थाॅमस इन्सपेक्टर जनरल ऑफ एजूकेशन, फ्रांस।
कोठारी आयोग की रिपोर्ट
आयोग ने अपने कार्य को पूरा करने के लिए 12 मुख्य कार्य दल तथा 7 सहायक कार्यदल बनाये इन कार्यदलों ने लगभग 100 दिन तक राष्ट्र क विभिन्न राज्यों के स्कूलों, काॅलेजो तथा विश्वविद्यालयों का भ्रमण किया तथा लगभग 9009 व्यक्तियों से साक्षात्कार किया आयोग ने 2400 से अधिक लिखित उत्तरों का विश्लेषण भी किया तथा इन सभी सूचनाओं क आधार पर 673 पृष्ठों का प्रतिवेदन तैयार किया जिसे 20 जून 1966 को भारत सरकार को समर्पित किया (रिपोर्ट पेश की) गया। आयोग ने अपने प्रतिवेदन मे शिक्षा के विभिन्न पक्षो पर सघन प्रकाश डाला तथा राष्ट्रीय उत्थान में शिक्षा के महत्वपूर्ण साधन के रूप में विकसित करने की दृष्टि से अनेक महत्नपूर्ण सुझाव दिये।
’’शिक्षा आयोग’’ को अपना प्रतिवेदन 31 मार्च सन् 1966 तक प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया था। किन्तु कठिनाईयों के कारण, आयोग ने अपने प्रतिवेदन को निर्धारित तिथि से लगभग 3 माह पश्चात् अर्थात् 29 जून 1966 को भारत सरकार के तात्कालीन शिक्षामंत्री श्री एम. सी. छागला के समक्ष प्रस्तुत किया। लगभग 700 पृष्ठों का यह प्रतिवेदन तीन भागों में विभाजित है और इसका नाम है ’’शिक्षा एंव राष्ट्रीय प्रगति’’ (Educational & National Development)
कोठारी आयोग की सुझाव व सिफारिशें
1. पंचम पंचवर्षीय योजना पूर्ण होने तक निम्न माध्यमिक तथा प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क बनाया जाये।
2. प्राथमिक स्तर के बालकों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तके उपलब्ध करायी जाये।
3. उच्च स्तर पर बुक बैंक की व्यवस्था की जाये।
4. प्रतिभा सम्पन्न शिक्षार्थियों को छात्रवृत्तियां दी जाये।
5. शिक्षकों की स्थिति, वेतन, प्रशिक्षण इत्यादि में सुधार किया जाये।
6. आदिवासियोें तथा पिछडंे वर्ग की शिक्षा में सुधार या विस्तार करने हेतु इन्हे छात्रवृत्तियाँ छात्रावास आदि की सुविधाएँ उपलब्ध करवायी जाये।
7. अपंग बालकों  के लिए प्रत्येक जिले में पृथक विद्यालय की स्थापना की जाये।
8. स्त्री व पुरूषों की शिक्षा के अन्तर को दूर किया जाये।
9़. प्रत्येक विद्यालय में राज्य विद्यालय शिक्षा परिषद् की स्थापना की जाये।
10. शिक्षा मंत्रालय में राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा परिषद् की स्थापना की जाये।
11. छात्राध्यापकों के लिए सार्थक और विशेष पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाये।
12. सरकारी विद्यालयों के समान गैर-सरकारी विद्यालयों की स्थिति मे सुधार किया जाये।
13. स्त्रियों के लिए शिक्षा व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारम्भ किए जाये।
14. विद्यालय मेे प्रचलित पाठ्यक्रम क दोषों को समाप्त किया जाये।
15. प्रशिक्षण अवधि दो वर्ष की होंनी चाहिए।
16. शिक्षा के सभी स्तरों पर सामान्य शिक्षा के अनिवार्य अंग के रूप मे समाज सेवा और कार्य अनुभव इत्सादि सम्मिलित होने चाहिए।
17. नैतिक शिक्षा तथा सामाजिक उत्तर दायित्व की भावना उत्पन्न करने पर बल दिए जाए।
18. माध्यमिक शिक्षा को व्यावसायिक बनाया जावे।
19. उन्नत अध्ययन केन्द्र (Center of Adanced studies) को अधिक सुदृढ बनाया जाये और बडे़ विश्वविद्यालयों में एक ऐसी संस्था खोली जाए जो उच्चतम अन्तर्राष्ट्रीय मानको को प्राप्त करने का उद्देश्य रखे।
20. विद्यालय के लिए अध्यापको के प्रशिक्षण तथा श्रेणी पर विशेष बल दिया जाये।
21. शिक्षा के पुननिमार्ण मे कृषि में अनुसंधान तथा इससे सम्बन्धित विज्ञानांे को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
कोठारी आयोग के क्षेत्र 
1. शिक्षा के राष्ट्रीय उद्देश्य/लक्ष्य 
2. शिक्षा की संरचना 
3. अध्यापको की दशा 
4. अध्यापक प्रशिक्षण 
5. नामाकंन तथा मानव शक्ति 
6. शैक्षिक समानता
7. स्कूल शिक्षा का विस्तार
8. स्कूल पाठ्यक्रम
9. स्कूल शिक्षा पद्धति
10. स्कूल निरीक्षण
11. उच्च शिक्षा के उद्देश्य
12. उच्च शिक्षा में प्रवेश व कार्यक्रम
13. विश्वविद्यालयों की व्यवस्थाएँ
14. कृषि शिक्षा
15. व्यवसायिक, तकनीकी तथा इंजनियरिंग शिक्षा
16. विज्ञान शिक्षा तथा अनुसंधान
17. प्रौढ़ शिक्षा
18. शैक्षिक योजना प्रशासन
19. शैक्षिक अर्थव्यवस्था
कोठारी आयोग का मूल्यांकन 
शिक्षा आयोग के मूल्यांकन की दो कसौटियाँ हो सकती है-
1. आयोग के गुणों को परखना
2. आयोग के दोषों का विश्लेषण करना
1. जन-शिक्षा प्रचार व प्रसार के लिए व्यावहारिक शिक्षा का स्वरूप प्रस्तुत करना।
2. वैज्ञानिक प्रयोगों एवं अनुसन्धानों को शिक्षा के क्षेत्र में उपर्युक्त स्थान प्रदान करना।
3. शिक्षा के सर्वागिण पक्षों में सन्तुलित विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करना तथा उसके पुनर्संगठन सम्बन्धी ठोस सुझाव प्रस्तुत करना।
4. शिक्षा पर और अधिक धन व्यय करने की सिफारिश करना।
कोठारी आयोग के गुण

1. जन-शिक्षा प्रचार व प्रसार के लिए व्यावहारिक शिक्षा का स्वरूप प्रस्तुत करना।
2. वैज्ञानिक प्रयोगों एवं अनुसन्धानों को शिक्षा के क्षेत्र में उपर्युक्त स्थान प्रदान करना।
3. शिक्षा के सर्वागिण पक्षों में सन्तुलित विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करना तथा उसके पुनर्संगठन सम्बन्धी ठोस सुझाव प्रस्तुत करना।
4. शिक्षा पर और अधिक धन व्यय करने की सिफारिश करना।
5. सभी छात्रों को प्रजातान्त्रिक समानता के अवसर प्रदान करने के लिए आवश्यक  सहायता प्रदान करना।
6. संवैधानिक शिक्षा के लक्ष्यों की पूर्ति हेतु ठोस कदम उठाना।
7. माध्यमिक शिक्षा को पूर्ण व्यवसायोन्मुखी बनाकर उच्च शिक्षा की गुणवता में वृद्धि  करना।
8. शिक्षा के सभी स्तरों के लिए अनुकूल, सन्तुलित पाठ्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत करना।

कोठारी आयोग के दोष

1. शिक्षा आयोग के प्रयासों के फलस्वरूप बेसिक, शिक्षा का स्वरूप समाप्त हो गया।
2. अंग्रेजी भाषा पर अतिक्ति बल देने से भारतीय भाषाओं का विकास अवरूद्ध हो गया।
3. संस्कृति अध्ययन की पूर्ण उपेक्षा की गयी।
4. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की शिक्षा पर अनावश्यक बल देने से बालकों का नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास अवरूद्ध हो गया।
5. प्रारम्भिक शिक्षा के आधार को मजबूत बनाने का सार्थक प्रयास नहीं किया गया।
6. शिक्षकों को अपेक्षित सुरक्षा प्रदान करने में शिक्षा आयोग पूर्ण असफल रहा।
7. अनेक महत्वपूर्ण सुझावों को धन के अभाव में क्रियान्वित नहीं किया जा सकती अतः शिक्षा की यथास्थिति बनी रही।
8. इस आयोग के अनेक विदेशी एवं देशी सदस्यों ने आयोग के कार्य मंे उपेक्षा भाव का प्रदर्शन किया था।






गुरुवार, 21 मई 2020

जनगणना 2021 के लिए अनूठा प्रयास

जनगणना 2021 के लिए अनूठा प्रयास
हमारे देश में 2021 में जनगणना होना प्रस्तावित है जिसके लिए पूर्व की भांति लाखों करोड़ों खर्च भी होना है इसी को ध्यान में रखते हुए विभिन्न योजनाओं का एक साथ समायोजन पूर्ण कार्य करवाना ताकि देश के धन का अप व्यय रोका जा सके। 
  1. जनगणना के समय जनगणनाकर्मी देश के नागरिकों से व्यक्तिशः मिलते हैं ऐसे समय कुछ अन्य विभागों हेतु आंकड़ों को भी उसी समय लेकर प्राप्त किया जा सकता है। 
  2.  ये आंकड़े निम्नलिखित से संबंधित हैं-
  •  आधार कार्ड 
  • राशन कार्ड 
  • चुनाव पहचान पत्र 
  • ड्राइविंग लाइसेंस अन्य लाइसेंस 
  • स्वास्थ्य के आंकड़े 
  • जातिगत आंकड़े 
  • पशुधन के आंकड़े 
  • संपत्ति के आंकड़े 
  • पेन व बैंक के आंकड़े 
  • परिलाभ के आंकड़े 
  • पेंशन के आंकड़े 
  • गरीबी रेखा के आंकड़े 
  • व्यवसाय के आंकड़े
  • वाहन के आंकड़े

3. जनगणनाकर्मी साथ एक अन्य टीम बनाकर जिनके निम्नलिखित कार्ड नहीं बने हैं उनको बनवा कर आंकड़ों में शामिल करवाया जा सकता है जैसे - 
    • चुनाव पहचान पत्र 
    • राशन कार्ड पहचान पत्र 
    • मूल निवास व जाति प्रमाण पत्र 
    • बैंक खाता 

4. यह सारा कार्य डिजिटल होना है अतः सॉफ्टवेयर को उसी प्रकार से बना दिया जाए जिसमें यह सारे आंकड़े एकत्रित किए जा सके तथा जो लोग डिजिटल साक्षर हैं उन्हें खुद अपनी डिटेल अपडेट करने को कहा जाए तथा जब जनगणनाकर्मी से मिलने के समय जनगणना अधिकारियों द्वारा इनकी पुष्टि की जा सके। 

5. उपरोक्त सभी कार्य एक ही प्लेटफार्म के सॉफ्टवेयर पर हो तो भविष्य में भी इसको अनवरत जारी रखा जा सकता है तथा नए जन्म लेने वाले और मृत्यु होने वालों की सूचनाएं अपडेट होती रहेगी। 

6. डिजिटल लॉकर वाली व्यवस्था को भी इसी से लिंक किया जा सकता है जिससे नागरिकों के आंकड़े इसमें सुरक्षित रखे जा सकते हैं उनकी शिक्षा से संबंधित आंकड़ों को भी इसमें प्रमाण पत्र के रूप में सहेज के रखा जा सकता है। 
7. ऐसा करने से पूरे देश के नागरिकों का डाटा हमेशा अपडेट रहेगा भविष्य में जनगणना की जगह केवल जनसंख्या प्रमाणीकरण की ही आवश्यकता रहेगी। 

8. जनगणना को भी डिजिटल वेरीफाई के माध्यम से करवाना हमारे देश के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। 

9.  आतंकवादी वह नक्सलवादी लोगों पर इससे नकेल लगेगी क्योंकि बाहर के लोगों का डिजिटली वेरिफिकेशन नहीं हो पाएगा। 
10. भ्रष्टाचार पर नकेल लगेगी
11.  योजना बनाने और लागू करने में आसानी रहेगी क्योंकि सही डाटा हमें मिलेगा। 
12. आय से अधिक संपत्ति के संयोजन होने पर इंडिकेटर वेरीफिकेशन होगा वह इस पर रोक लगेगी। 
13.  संपूर्ण देश का संचालन में केंद्र की भूमिका अहम हो जाएगी। 
14. केंद्र सरकार का जनता से सीधा संवाद रहेगा लोग देश हित में आपसे सीधे जुड़ेंगे। 
15. गलत कार्य करने वालों की हिम्मत टूटेगी। 
16. जनता को सीधे तौर पर केंद्रीय योजनाओं का लाभ मिलेगा। 
17. वास्तविक लोगों को उचित लाभ मिलेगा। 

जनगणना के समय संपूर्ण विभागों को साथ लेते हुए एक संपूर्ण भारत निर्माण सॉफ्टवेयर के माध्यम से ही आंकड़ों का संग्रहण व जनता के प्रमाण पत्र और अन्य कार्ड व प्रमाण पत्रों को बनवाया जाए और इन सभी को एक ही प्लेटफार्म पर लाकर कार्य किया जाए ताकि सभी कुछ देश हित में सर्वोपरि रूप से हो सके। 

भारत देश का जागरूक नागरिक 
 डॉ. डूंगा राम भटनागर
                         रीडर
 शाह गोवर्धन लाल काबरा शिक्षक महाविद्यालय (C. T. E.),
 गीता भवन के पास, जोधपुर। 342003
मो. +91 72220 05216 
Email-dungarambhatnagar@gmail.com 






मंगलवार, 5 मई 2020

ऑर्गेनिक फूड संबंधित व्यापार

BUSINESS PART 1
Organic Food related Business
ऑर्गेनिक फूड संबंधित व्यापार



    वर्तमान समय में किसानों का रुझान प्राकृतिक रूप से खेती की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन थोड़े से फायदे के लिए कुछ किसान यूरिया एवं अन्य रासायनिक खादों का इस्तेमाल करते हुए खेती में उपज को बढ़ाने के लिए काम में ले रहे हैं ऐसी परिस्थिति में अगर किसानों को विश्वास में लेकर उनसे ऑर्गेनिक खेती करवाई जाए हैं तथा उनको संसाधनों को उपलब्ध करवाये जाए तो किसान इसको अपना सकता है। इस खेती को व्यापार के रूप में कैसे विकसीत किया जाए? इस हेतू मेरे कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं-

  1. Food production network बनाना 
    सर्वप्रथम हमें ऐसे किसानों को चुनना होगा जो ऑर्गेनिक खेती करने को तैयार हों तथा इनका संगठन बना इनको संसाधनों को उपलब्ध करवाना होगा। 
इस खेती से संबंधित विभिन्न प्रकार की सूचनाओं का आदान प्रदान करना होगा जिससे उनको उत्पादन करने में आसानी हो। उनको उनकी फसल को उचित दाम पर बेचने की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। 

  1. Direct selling network बनाना 
    भारतीय समाज में ऐसे लोग भी हैं जो अच्छी चीजों को समझते करते हैं तथा उससे प्राप्त भी करना चाहते हैं उनके उपयोग का महत्व समझते हैं ऐसे लोगों तक इस प्रोडक्ट की जानकारी पहुंचाना और उनका एक नेटवर्क बनाना। 
किसानों की फसल उगने से पहले ही यह लोग उसको खरीद सकें और किसान को अपने जेब से बीज खाद के पैसे नहीं देने पडे। 

  1. Storage and paking center बनाना 
    जब किसान की फसल कट कर गोदामों में आ जाती है उस समय उसकी पैकिंग एवं उसके भंडारण की उचित व्यवस्था होनी चाहिए इस हेतु गांव गांव में कोल्ड स्टोरेज बनाना जिससे किसान महीनों तक अपनी फसल संभाल कर रख सकें एवं भाव आने पर दे सके। इससे किसानों को अपनी फसल का उचित दाम प्राप्त करने में काफी मदद मिलेगी। 

  1. Web and app base selling service system बनाना
    इस मॉडल में किसान की फसल पहले ही खरीद ली जाती है एवं भुगतान समय समय पर किया जाता है इस हेतु एक प्रबंधकीय संस्था द्वारा इसका संचालन किया जाता है उसका कार्य होता है कि इसका लेखा-जोखा रखें वेब आधारित आर्डर ले एवं एवं उपज को गंतव्य स्थान पर पहुंचा कर उसकी कीमत प्राप्त करे।

    व्यापार के इस मॉडल में क्योंकि किसान अपने खेत में प्राकृतिक खाद, प्राकृतिक बीज, प्राकृतिक कीटनाशक का उपयोग करता है जिससे उसको केमिकल खाद, केमिकल उपचारित बीज एवं केमिकल कीटनाशक के प्रयोग से उत्पादित फसल की तुलना में कम फसल प्राप्त होती हैं लेकिन यह पूर्णतया शुद्ध होती हैं इसलिए इसकी कीमत ज्यादा होती है और हर व्यक्ति ऐसी फसल को लेने के लिए ज्यादा पैसे देने को तैयार हैं जिससे किसान को फायदा होता है और उचित प्रबंधन द्वारा अत्यधिक मात्रा में लाभ कमाया जा सकता है। 


शुक्रवार, 1 मई 2020

कोरोना महामारी के दौर में अर्थव्यवस्था को उबारना।

Growing the economy during the Corona Epidemic
कोरोना महामारी के दौर में अर्थव्यवस्था को उबारना। 


    कोरोना संक्रमण से वर्तमान में विश्व की अर्थव्यवस्था डगमगा चुकी है ऐसी स्थिति में इससे कैसे उबरना चाहिए? इसे हेतू कुछ सुझाव अपनाए जा सकते हैं-
 
1- भारतीय अर्थव्यवस्था शुरू से ही कृषि आधारित रही है हमारे पास खेती की जमीन तो बहुत ज्यादा है लेकिन कुछ लोग केवल जमीन प्रॉपर्टी बनाने के लिए लेते हैं और वहां फसल नहीं बोते है तथा सरकारी आंकड़ों में वहां फसल की खाना पूर्ती मिलती है अतः सबसे पहले ऐसी जमीन को चिन्हित किया जाए  तथा वहां खेती हो इसकी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। इससे कई लोगों को रोजगार मिलेगा। 
 
2- वर्तमान में राजस्थान के गांव में बहुत सी ऐसी जमीन है जैसे पड़त व गोचर  जो कई एकड़ हो सकती हैं घास वाली गोचर जमीन को छोड़ दें तो बाकी ऐसी जमीन जहां खेती हो सकती है के लिए सरकार को चाहिए की ऐसी जमीन का हर गांव में पता किया जाए। तथा उसी गांव के ऐसे लोगों को यह जमीन 1-2 साल के लिए उन परिवारों को लीज पर दी जाए जो स्वयं अपने हाथों से खेती करते हैं और जिनके पास खेत नहीं है इससे उन लोगों को रोजगार मिलेगा। सरकार चाहे तो इन लोगों को इस हेतु संसाधन व बीज भी उपलब्ध करा सकती हैं। 
 
3- पिछले कुछ सालों की तरफ गौर से देखें तो राजस्थान में पशुधन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। जिसका सबसे बड़ा कारण चारे की कम उपलब्धता, पशुधन उत्पाद का उचित मूल्य ना मिलना तथा बाजार में मिलावटी उत्पाद की अधिकता है अतः ऐसी परिस्थिति में अगर किसानों को खेती के साथ-साथ पशुपालन को प्रोत्साहित किया जाए तो प्राकृतिक खाद प्राप्त होगी तथा पशुधन उत्पाद भी। साथ ही पशु उत्पादन के परिरक्षण, परिवहन और उनके उचित मूल्य पर विक्रय व्यवस्था हो तो लोग इस ओर आकर्षित होंगे। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। 
 
4- राजस्थान का क्षेत्र हमेशा से ही खोज एवं प्राकृतिक संसाधनों के उचित उपयोग में अग्रसर रहा है हमारे यहां सूर्य देवता की अनुपम कृपा है। जिससे हम खिचिया, पापड़ी, राबोड़ी, केर-सांगरी एवं अन्य सूखी सब्जियों का परिरक्षण करते रहे हैं लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे गांव में फसलों की उपज के रखरखाव के लिए कोल्ड स्टोरेज का अभाव है जिससे किसान को अपनी उपज को ओने पौने दाम पर बेचना पड़ता है जिससे किसान हमेशा गरीब बना रहता है क्योंकि उपज आते ही उसे बेचना उसकी मजबूरी है अतः सरकार को हर गांव में कोल्ड स्टोरेज खोलकर फसल की उपज को रखने की व्यवस्था हेतु किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए और इन कोल्ड स्टोरेज में बिजली की व्यवस्था हेतु सौर ऊर्जा के माध्यम से बिजली उत्पादन करने की व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि किसान अपनी उपज को संभाल कर रख सकें और जब उसको पैसे की जरूरत महसूस हो उस समय वह अपनी उपज बेच सकें मजबूरी में ना बेचे। इससे भी रोजगार का सृजन होगा और गांव के लोगों को रोजगार मिलेगा। 
 
5- महामारी के कारण राजस्थान के प्रवासी, कामगार, मजदूर, श्रमिक आदि जो कि देश और विदेश में रह रहे हैं वे अपने प्रदेश आ रहे हैं।  महामारी की स्थिति को देखते हुए अगले कुछ महीनों तक स्थिति सामान्य होने के आसार कम नजर आ रहा है प्रदेश में एक साथ उनके लिए काम मजदूरी एवं रोजगार की व्यवस्था नहीं की जा सकती अतः विभिन्न उपायों के माध्यम से सभी को खेती से जोड़ा जा सकता है जिससे स्वरोजगार के अवसर भी बढ़ जाएंगे तथा इन लोगों को काम मिलेगा। 
 
    समस्त उपायों से खेती उत्पादन बढ़ेगा, कोल्ड स्टोरेज से निर्माण क्षेत्र विकसित होगा एवं किसानों को उसकी उपज का उचित दाम मिलेगा। पशुपालन से भी लोगों को फायदा होगा तथा इससे बाजार में रूपए पैसे का चलन बढ़ेगा जिससे बाजार में अर्थव्यवस्था ज्यादा मजबूत होगी। कारखानों को कच्चा माल भी आसानी से उपलब्ध होगा जिससे कल कारखानों मैं भी रोजगार बढ़ेगा। 
 
    सरकार चाहे तो इनको विभिन्न योजनाओं के माध्यम से संसाधन उपलब्ध करा सकती हैं जिससे राजस्थान बहुत जल्द आत्मनिर्भर बन जाएगा। 


सम्मेलन / कॉन्फ़्रेंस (Conference)

  सम्मेलन / कॉन्फ़्रेंस ( Conference) 1. परिभाषा ( Definition):      कॉन्फ़्रेंस एक औपचारिक और संगठित सभा होती है , जिसमें किसी विशेष वि...