सोमवार, 16 जनवरी 2023

प्रश्नों की प्रवाहशीलता का कौशल (SKILL OF FLUENCY OF QUESTIONS)


 प्रश्नों की प्रवाहशीलता का कौशल

               SKILL OF FLUENCY OF QUESTIONS

    शिक्षण की दृष्टि से प्रश्न करने की कला अध्यापक के लिये एक वरदान है और शिक्षा प्रदान करने के लिये यह एक उत्तम साधन माना गया है। प्रश्न कौशल एक ऐसा माध्यम है जों कि बालक को पढ़ने के लिये प्रेरित करता हैं। प्रश्न कौशल के महत्त्व को स्वीकारते हुये कई विद्वान लिखते है-

बाॅसिंग के अनुसार,’’ प्रश्न करने की कला का महत्त्व स्वीकार किये बिना कोई भी शिक्षण विधि सफलतापूर्वक लागू नहीं की जा सकतीे ।’’

पाकेर के अनुसार,’’ प्रश्न आदत कौशल स्तर के बाहर समस्त शैक्षिक -प्रक्रिया की कुंजी है।’’

प्रश्न पूछने के उद्देश्य

1. छात्रों के पूर्व ज्ञान का पता लगाना।

2. छात्रों में पाठ के प्रति रूचि जागृत करना।

3. शिक्षण प्रक्रिया में छात्रों को मानसिक रूप से उपस्थित करने के लियें।

4. शिक्षक स्वयं अपनी शिक्षण की सफलता का मूल्यांकन करने हेतु प्रश्न पूछता है।

5. पाठ का विकास करने के लिये ।

6. छात्रों में आत्मविश्वास लाने के लिये।

प्रश्न कौशल के प्रमुख तत्व

1. प्रश्नों की संरचना - प्रश्नों की बनावट सरल व बोधगम्य तथा स्पष्ट होनी चाहिये तथा प्रश्नों का आकार छोटा होना चाहिये। प्रश्नों की बनावट इस प्रकार की होनी चाहिये कि कमजोर छात्र भी इसका हल ढूढने में समर्थ हो।

2. प्रश्नों का प्रस्तुतीकरण - सर्वप्रथम प्रश्न सम्पूर्ण कक्षा के सम्मुख पूछा जाना चाहिये। प्रश्न न तो तेज गति से पूछना चाहिये और न ही बहुत धीमी गति से , तथा आवाज स्पष्ट सुनाई दे।

3. संकेत द्वारा - जब छात्र आधा उत्तर देकर रूक जाये या उत्तर देने में घबराये या उत्तर पर्णतया सही न हो तो अध्यापक को कुछ दुसरे प्रश्न बनाकर उसे उत्तर का संकेत देते हुये विषय स्पष्ट करने का प्रयत्न करंे।

4. प्रसार - प्रश्नों का प्रसार कक्षा में चारों ओर सभी स्तर के छात्रों  में समान रूप से प्रसारित होना चाहिये। प्रश्नों को अधिकतम छात्रों से पूछना चाहिये जिससें सभी क्रियाशील व चैकन्ने रहे।

5. प्रश्नकत्र्ता की मुद्रा - प्रश्नकत्र्ता को प्रश्न सीधे एवं सरल स्वभाव से पूछे जाने चाहिये। प्रश्न पूछने के बाद कुछ समय रूककर छात्रों से उत्तर देने को कहना चाहिये।

6. पुनःनिर्देशन विधि - किसी एक छात्र द्वारा उत्तर बताने के बाद उसे कई छा़त्रों से मिलान करना चाहिए, जिससे अधिकाधिक छात्र सक्रिय रह सकें व अपनें आत्मविश्वास से उत्तर दे सकें।

प्रश्नों के प्रकार

प्रश्नों को दो आधारों में बाटा गया है- 1. मानसिक आधार पर 2. उत्तरों के आधार पर

1. मानसिक आधार पर - इस आधार पर प्रश्नों को दों भागों में बाटा गया है-

1. स्मृत्ति प्रश्न 2. विचारात्मक प्रश्न

1. स्मृत्ति प्रश्न - ये प्रश्न छात्रों के पूर्व पठित विषय -वस्तु, परिभाषा, प्रक्रिया,संख्या आदि से संबधित होते हैं। इनके उत्तर अपनी स्मृत्ति में उपस्थित ज्ञान से देने होते हैं। जैसे -प्रस्तावना प्रश्न, आवृत्यात्मक प्रश्न

प्रस्तावना प्रश्न - प्रस्तावना प्रश्न पाठ को आरम्भ करते समय किये जाते हैं जो प्रश्न, छात्र के पूर्वज्ञान पर आधारित होते है।

आवृत्ति प्रश्न - ये वे प्रश्न होते है जो पाठ की समाप्ति पर पाठ की सफलता तथा छात्रों की उपलब्धि का ज्ञान तथा शिक्षक की शिक्षण विधियों का पता लगाने हेतु पूछे जाते है।

2. विचारात्मक प्रश्न - ये पाठ के मुख्य शिक्षण पर आधारित तथा जटिल विषयों को स्पष्ट करनें के लिये पूछे जाते है। यंे प्रश्न अधिक कठिन स्तर के माने जाते है।जैसे बोध प्रश्न, विकासात्मक प्रश्न, तुलनात्मक प्रश्न।

बोध प्रश्न - बोध प्रश्न उन्हें कहते है जिनकी सहायता से शिक्षक को बच्चों को पढ़ाई गई विषयवस्तु का ज्ञान का ज्ञान होता है।

विकासात्मक प्रश्न- वे प्रश्न जिनके माध्यम से पाठ का विकास किया जाता हैं।

तुलनात्मक प्रश्न- वे प्रश्न जिनके माध्यम से पाठ के तथ्यों कि तुलना की जाती हैं।

 2 उत्तरों के आधार पर - इस आधार पर प्रश्नों को चार भागों में बाटा गया है-  अ. निबंधात्मक प्रश्न ब. लघुत्तरात्मक प्रश्न स. अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न द. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

अ.  निंबधात्मक प्रश्न- इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर निबंध के रूप में लिखना होता है। इसमें परीक्षक की मनोदशा का भी प्रभाव पड़ता है, इसमें आत्मगत तत्व की प्रधानता है।

ब.  लघुत्तरात्मक प्रश्न - इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर चार या पाच पंक्तियों में देना होता है। ये प्रश्न शिक्षण के लिये प्राण माने जाते है।  

स.  अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न - इनका उत्तर एक पंक्ति या एक -दों शब्दों में दिये जा सकते है। ये प्रश्न पाठ के विकास के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण होते है।

द.  वस्तुनिष्ठ परीक्षण - वस्तुनिष्ठता का अभिप्राय वैयक्तिक तत्वों के निष्कासन से है। मूल्यांकन में अंतर ना हो प्रश्न ऐसे होने चाहिये । इस परीक्षण में अंकन करना सुगम होता है। ये कई प्रकार के होते है-

(अ). सत्य व असत्य या एकांतर प्रत्युत्तर में - इनमें दो विकल्पों में से एक को चयन करने के लिये कहा जाता है। इन प्रश्नों का प्रयोग विद्यालय के प्रत्येक स्तर के लिये किया जा सकता है।

(ब). बहुविकल्प या अपव्रत्य-चयन रूप -इस प्रकार के प्रश्नों के एक प्रश्न के उत्तर के रूप में कई विकल्प दिये रहते है, जिनमें से छात्रों को अधिक उपयुक्त उत्तर छांटने के लिये कहा जाता है।

(स). वर्गीकरण रूप - इसमें प्रश्नों के अंतर्गत कुछ ऐसे शब्दों का समूह छात्रों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, जिनमें से छात्रों से उसी शब्द कों छांटनें के लिये कहा जाता है।

प्रश्न कौशल में सावधानियाँ 

1. अध्यापक को ऐसे प्रश्न नहीं पूछना चाहिये कि प्रश्न की भाषा में ही उत्तर हो।

2. प्रश्न पूछते समय उपयुक्त गति से विराम देते हुये बोलना चाहिये।

3. अध्यापक की मुख मुद्रा प्रसन्न होनी चाहिये।

4. कक्षा का वातावरण सौहार्दपूर्ण होना चाहिये।

5. प्रश्नों को बार-बार नहीं दोहराना चाहिये।

6. प्रश्नों की भाषा स्पष्ट होनी चाहिये।

7. प्रश्न निश्चित उद्देश्य से पूछे जाने चाहियें।

    प्रश्न कौशल के होने से छात्रों में उत्साह पनपता है वे स्वयं का मूल्यांकन कर सकते है। किसी भी कक्षा में कक्षाध्यापक को पाठ के आरम्भ में प्रश्न पूछने से पाठ का उचित विकास होता है, परन्तु सर्व महत्त्वपूर्ण यह है कि अध्यापक को प्रश्न पूछना व किस तरह सरलता से छात्रों से उत्तर निकलवाना है आना चाहिये। 

प्रश्न कौशल को समझने के लिये हम एक प्रकरण उदाहरण में लेकर उसकी सारणी बनाते है-

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Dr. D R BHATNAGAR  

मंगलवार, 10 जनवरी 2023

Practicum and fieldwork Paper 1st (Knowledge and Curriculum}

Knowledge and Curriculum

Paper-1st 

Practicum/Field Work 

(Any one from the following)

1.Analysis of social myths in the light of scientific values Culture.

वैज्ञानिक मूल्यों और संस्कृति के प्रकाश में सामाजिक मिथकों का विश्लेषण।

 1. सैद्धान्तिक कार्य 

  •  प्रस्तावना
  • मूल्यो का अर्थ व परिभाषा 
  •  मूल्यो के प्रकार 
  • वैज्ञानिकता का अर्थ व परिभाषा
  • वैज्ञानिक मूल्य
  •  संस्कृति का अर्थ व परिभाषा 
  • समाज मे फैले हुए मिथको की जानकारी

 2. प्रायोगिक कार्य

  •  सामाजिक मिथक
  •  वैज्ञानिक मूल्यो सन्दर्भ मे मिथको का विश्लेषण 
  • सांस्कृतिक मूल्यो के सन्दर्भ मे मिथको का विश्लेषण
  •  निष्कर्ष 
  • सन्दर्भ साहित्य 

 2.Plan a child centered activity for enhancement of children education and values based on Shri Aurbindo or Giju Bhai thoughts.

बच्चे की शिक्षा और मूल्यों को बढ़ाने के लिए श्री अरविंदो या गिजू भाई के विचारों पर आधारित बाल केंद्रित गतिविधि की योजना बनाये।

                     1. सैद्धान्तिक कार्य 

  •  प्रस्तावना
  • बाल केंद्रित शिक्षा अर्थ व परिभाषा
  • श्री अरविंदो या गिजू भाई  का परिचय 
  • श्री अरविंदो या गिजू भाई के अनुसार बाल केंद्रित शिक्षा
  • श्री अरविंदो या गिजू भाई के अनुसार बाल केंद्रित शिक्षा के उद्देश्य
  •  श्री अरविंदो या गिजू भाई की रचनाए
  • बाल केंद्रित शिक्षा के लिए श्री अरविंदो या गिजू भाई के प्रयोग

 2. प्रायोगिक कार्य

  • श्री अरविंदो या गिजू भाई  के अनुसार बाल केंद्रित शिक्षण हेतु गतिविधि का चयन
  • बाल केंद्रित गतिविधि का विवरण 
  • बाल केंद्रित गतिविधि की योजना
  • गतिविधि संचालन की प्रक्रियाए 
  • गतिविधि का मूल्यांकन 
  • बाल केंद्रित गतिविधि का शिक्षा पर प्रभाव 
  • निष्कर्ष 
  • सन्दर्भ साहित्य 

3.Conduct a survey on feedback of curriculum from learners and teachers. Prepare a report. |

 शिक्षार्थियों और शिक्षकों से पाठ्यचर्या की प्रतिक्रिया पर एक सर्वेक्षण का निर्माण। एक रिपोर्ट तैयार करें।

1. सैद्धान्तिक कार्य 

  • प्रस्तावना
  • पाठ्यचर्या का अर्थ एवं परिभाषा
  • पाठ्यचर्या की आवश्यकता 
  • पाठ्यचर्या के गुण व दोष
  • सर्वेक्षण का अर्थ
  • सर्वेक्षण के प्रकार

 2. प्रायोगिक कार्य

  • अच्छी पाठ्यचर्या की विशेषताएँ

  • पाठ्यचर्या प्रतिक्रिया हेतु चेकलिस्ट का निर्माण
  • छात्र प्रतिक्रिया
  • अध्यापक प्रतिक्रिया
  • पाठ्यचर्या प्रतिक्रिया विश्लेषण
  • रिपोर्ट
  •  निष्कर्ष 
  • सन्दर्भ साहित्य 

04.Critical review of a text book in reference to gender issues social sensitivity and the local contexts/references included in the book.

लैंगिक मुद्दों, सामाजिक संवेदनशीलता के संदर्भ में एक पाठ्य पुस्तक की समालोचनात्मक समीक्षा| पुस्तक में शामिल स्थानीय संदर्भ में ।

 1. सैद्धान्तिक कार्य 

  •  प्रस्तावना
  •  पाठ्‌यपुस्तक का अर्थ
  •  पाठ्यपुस्तक की विशेषताएं 
  • लैंगिकता का अर्थ
  • समाज के लैंगिक मुद्दे
  • संवेदनशिलता का अर्थ 
  • सामाजिक संवेदनशिलता का अर्थ

 2. प्रायोगिक कार्य

  • राजस्थान माध्यमिक बोर्ड से संदर्भित पाठ्‌यपुस्तक विवरण 

  • पाठ्यपुस्तक में लैंगिक मुद्दों के संदर्भ में विषय पाठ्‌यपुस्तक की समीक्षा  

  • सामाजिक संवेदनशिलता के संदर्भ में विषय पाठ्‌यपुस्तक की समीक्षा 
  •  निष्कर्ष 
  • सन्दर्भ साहित्य 

5.Critical review or analysis of the text book at upper primary and | senior secondary level. 

उच्च प्राथमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर पाठ्य पुस्तक की समीक्षा या विश्लेषण करना ।

  1. सैद्धान्तिक कार्य 

  •  प्रस्तावना
  •  पाठ्यपुस्तक का अर्थ
  •  पाठ्यपुस्तक की परिभाषा
  •  पाठ्यपुस्तक की आवश्यकता व महत्व  
  • उच्च प्राथमिक स्तर व माध्यमिक स्तर के समीक्षा के बिन्दु  

 2. प्रायोगिक कार्य

  • पाठ्यपुस्तक का चयन

  • पाठ्यपुस्तक की समीक्षा 

    1. उद्देश्य के आधार
    2.  विषयवस्तु के आधार पर
    3.  पाठ्यक्रम निर्माण  के सिद्धांत के आधार पर

  • विश्लेषण 
  •  निष्कर्ष 
  • सन्दर्भ साहित्य 

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Dr. D R BHATNAGAR 

रविवार, 8 जनवरी 2023

सूक्ष्म-शिक्षण (Micro Teaching)

 सूक्ष्म-शिक्षण (Micro Teaching)

 

    सूक्ष्म-शिक्षण वास्तविक कक्षा शिक्षण का लघु व सरलीकृत रूप है। सूक्ष्म शिक्षण के द्वारा वास्तविक शिक्षण की जटिलताओं को कम करने का प्रयास किया जाता है। 1961 में सर्वप्रथम स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोध छात्र कीथ एचीसन ने डाॅ. राॅबर्ट बुश और डाॅ. ऐलन के निदेर्षन में कार्य करते हुये सूक्ष्म शिक्षण नामक नई शिक्षण पद्धति का विकास किया। वीडियों टेप-रिकार्डर के आविष्कार के बाद उसे पृष्ठ-पोषक के रूप में उपयोग में लाया गया। उसके बाद हैरी गेरीसन ने भी वीडियो-टेप रिकार्डर को अनुकरणीय शिक्षण एवं मानव-उपयोगी शिक्षण में महत्त्वपूर्ण पाया साथ ही कैलन-बैक ने भी सूक्ष्म-शिक्षण को समय की दृष्टि से इसे प्रभावशाली बनाया।

सूक्ष्म-शिक्षण का अर्थ व परिभाषा

सूक्ष्म-शिक्षण के अर्थ व परिभाषा को हम निम्न कथनों से समझ सकते है-

डी ऐलन के अनुसार,’’सूक्ष्म शिक्षण, शिक्षा का एक लघु रूप होता है। जिसमें कक्षा का आकार व समय भी कम होता है।’’

अरविन के अनुसार, ’’सूक्ष्म शिक्षण वास्तविक कक्षा शिक्षण की अपेक्षा एक अनुकरणीय शिक्षण है।’’

किलिफ के अनुसार,’’सूक्ष्म शिक्षण अध्यापक प्रशिक्षण की एक प्रक्रिया है जिसमें कक्षा का आकार/शिक्षण कालां तथा प्रकरण सभी छोटे होते है।’’

प्रो. नरेन्द्र वैधा के अनुसार,’’सूक्ष्म शिक्षण वह सम्पादकीय शिक्षण स्थिति है जहां वास्तविक कक्षा शिक्षण की जटिल स्थितियाँ पर्याप्त कम हो जाती है । इसके साथ ही शिक्षण अभ्यास की तुलना में पृष्ठ-पोषण की मात्रा बढ़ जाती है।’’

ऐलन के अनुसार, ’’ सूक्ष्म शिक्षण वास्तविक शिक्षण है, परन्तु इसका उद्देश्य विद्यार्थियों की योग्यता का विकास न होकर उनमें शिक्षण कौशल का विकास होना होता है। शिक्षण अभ्यास में प्रतिपुष्टि साधनों वीडियों, टेप-रिकाॅर्डर व अन्य साधनों का प्रयोग करके शिक्षण व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाया जाता है।’’

आर.एन.बु के अनुसार,’’सूक्ष्म शिक्षण अध्यापन शिक्षा की वह प्रविधि है जो शिक्षक को स्पष्ट रूप से परिभाषित शिक्षण कौशल के आधार पर निर्मित लघु पाठ को कुछ छात्रों को पढ़ाने का अवसर प्रदान करती हे।’’

मैक कालम के अनुसार, ’’ सूक्ष्म शिक्षण-अध्यापन अभ्यास से पूर्व शिक्षक-प्रशिक्षण के शिक्षण कौशल को प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। यह विधि सेवा पूर्व या सेवारत शिक्षको को शिक्षण कौशल के विकास या सुधार में काम ली जाती है।’’

उपरोक्त परिभाषाओं के अनुसार हम निम्न निष्कर्ष निकाल सकते है-

1. शिक्षण-प्रशिक्षण के क्षेत्र में सूक्ष्म-शिक्षण का एक नया प्रयोग है।

2. वास्तविक शिक्षण की जटिलताओं व कठिनता को कम करने का यह सूक्ष्म व सरल साधन है।

3. वास्तविक शिक्षण कई शिक्षण कौशलों का योग होता है।

सूक्ष्म-शिक्षण चक्र का अर्थ व परिभाषा

    चक्र-व्यूह शब्द की उत्पत्ति सेना की गतिविधियों तथा कार्य-प्रणाली के नियोजन व निर्देन की कला तथा विज्ञान से हुआ है। लेकिन अब इस शब्द का उपयोगी दायरा बढ़ गया है। इसका मुख्य लक्ष्य निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति करना हैं।

    व्यूह रचना समय व स्थान के अनुसार परिवर्तनशील है। शिक्षक के शिक्षण कार्य की सफलता कुशल चक्रव्यूहों पर निर्भर करती है।

ई. स्टोन्स तथा एस. मौरिस के अनुसार, ’’शिक्षण व्यूह-रचना पाठ की एक सामान्य योजना है। जिसमें कार्य की सफलता ,संरचना अनुदेशनात्मक लक्ष्यों में छात्रों का अपेक्षित व्यवहार और व्यूह-रचना का प्रयोजन करने के लिये आवश्यक नियोजन युक्तियों की रूपरेखा शामिल है।’’

आई. के . डेविस अनुसार, ’’शिक्षण व्यूह-रचना अनुदेशन की व्यापक विधि है।’’

सूक्ष्म-शिक्षण चक्र की अवधारणा

    कक्षा शिक्षण एक जटिल प्रक्रिया है। शिक्षण कार्य करते हुये शिक्षक को अनेक शिक्षा कौशलों का उपयोग करना होता है। जैसे प्रश्न पूछना, व्याख्यान देना, उदाहरण देना, श्यामपट्ट कार्य करना आदि। यह सभी अलग-अलग विशिष्ट कौशलों पर अभ्यास की आवश्यकता रहती हैं। शिक्षण के विभिन्न पक्षों को लघु रूप देकर सूक्ष्म-शिक्षण, सामान्य शिक्षण की जटिलताओं को कम करता है तथा अलग-अलग विशिष्ट कौशल पर अभ्यास का अवसर भी मिलता है।

    मूलतः सूक्ष्म शिक्षण एक अनुक्रम-अवरोही शिक्षण सम्पर्क सूत्र हैं जिसमें छात्र/छात्राध्यापक पांच से दस छात्रों को छोटे-छोटे समूह के पांच से दस मिनट की लघु समयावधि मेें पढ़ाता हैं। इस तरह की नियमित परिस्थिति अनुभवी और अनुभवहीन अध्यापकों को विशिष्ट शिक्षण कौशल को विकसित करने का अवसर देती है। सूक्ष्म शिक्षण, शिक्षक प्रशिक्षण क्षेत्र में एक नवाचार हैं जों कि छात्राध्यापकों को पाठ समाप्ति के तुरन्त बाद इस बात की सूचना देता हैं कि उनका शिक्षण कैसा रहा। छात्र/छात्राध्यापक के सूक्ष्म शिक्षण पाठ की समाप्ति के बाद परिवेक्षक उसे आवश्यक सुझाव देता है जिससे छात्र अध्यापक अपने पाठ में सुधार करता है और पुनः शिक्षण कौशल पर अभ्यास करता है।

सूक्ष्म-शिक्षण का स्वरूप

सूक्ष्म शिक्षण के नाम से ही इस विधि का स्वरूप ज्ञात होता हैै। जिसके अन्तर्गत शिक्षण पाठ का छोटा रूप, छात्रों की संख्या भी कम, साथ की समय भी कम रखा जाता है। इसलिये हम इसे सूक्ष्म-शिक्षण कहतें है। 

    सूक्ष्म शिक्षण के प्रयोग में सर्वप्रथम प्रकरण की योजना तैयार की जाती है। किसी एक शिक्षण कौशल को विकसित करने के लिए छात्र अध्यापक किसी-किसी छोटे प्रकरण पर कम छात्रों की कक्षा में लघु कालांश के लिए शिक्षण कार्य करता है। पाठ समाप्ति के बाद छात्र अध्यापक परिवेक्षक के विचार विमर्श कर सुझाव तथा पाठ की प्रभावता का पता करता है और आवश्यक होने पर पुनःपाठ योजना बनाकर पुनः शिक्षण करवाता है जब तक की छात्र अध्यापक उस कौशल में निपुण न हो जाये।

 

प्रत्येक अवस्था के लिये पहले से ही समय निर्धारित होता है


सूक्ष्म - शिक्षण चक्र की विशेषताएँ

1. इसमें शिक्षण प्रकरण का रूप छोटा होता है।

2. कक्षा में छात्रों की संख्या पांच से दस ही होती है।

3. एक समय में एक शिक्षण कौशल के बारे में पढ़ाया जाता है।

4. एक कौशल के बाद पांच से 10-12 मिनट का समय दिया जाता है तथा बाद में उस पर वाद/विवाद किया जाता है।

5. यह वैयक्तिक प्रशिक्षण है।

6. यह शिक्षण का लघु तथा सरल रूप है जिसमें शिक्षण की जटिल प्रक्रिया को कम किया जाता है।

7.  शिक्षण की समाप्ति पर अध्यापक को उसके शिक्षण-विषय की तुरन्त सूचना मिल जाती है।

8. इस विधि में शिक्षक व शिक्षण की परिस्थितियों पर अधिक नियन्त्रण रखा जा सकता है।

9. पृष्ठपोषण के आधार पर विद्यार्थियों को अपना पाठ पुनः नियोजन करने तथा उसमें सुधार करने का अवसर मिल जाता है।

सूक्ष्म-शिक्षण के उपयोग

1. व्यक्ति में शिक्षण-सम्बन्धी योग्यताओं का विकास किया जाता है।

2. विभिन्न शिक्षण कौशलों का विकास किया जाता है।

3. शिक्षण कार्य को प्रभावशाली शिक्षण क्रियाओं को तैयार किया जाता है।

4. सभी छात्रों को पूर्ण अवसर प्रदान किये जाते है।

5. इस प्रविधि में अन्य शिक्षण विधियों का उपयोग भी लिया जा सकता है।

सूक्ष्म शिक्षण के गुण

1. सूक्ष्म शिक्षण में अधिक स्पष्ट व तथ्यात्मक पृष्ठ-पोषण का समावेष होता है।

2. शिक्षक प्रशिक्षणार्थी स्पष्ट रूप से निष्चित व्यवहारिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये अपना ध्यान केन्द्रित रखता है।

3. सूक्ष्म शिक्षण के दौरान छात्रों की संख्या मात्र पांच से दस होती है। अतः यह कक्षा में अनुषासनहीनता को जन्म नहीं देती है।

4. सूक्ष्म-शिक्षण सरल व भय रहित होता है।

5. सूक्ष्म -शिक्षण में छात्राध्यापक तुरन्त उसी समय पाठ्यवस्तु को पुर्ननियोजित करता हैं।

6. सूक्ष्म-शिक्षण नियन्त्रित प्रयोगषाला एवं वास्तविक शिक्षण परिस्थितियों दोनों ही उत्पन्न करती है।

7. पाठ-समाप्ति के बाद छात्राध्यापक को अपने पाठ की प्रगति के बारे में जानकारी मिल जाती है।

8. यह शिक्षण-पद्धति स्वयं शिक्षण अभ्यास के लिये स्थान प्रदान करती है।

सूक्ष्म शिक्षण के दोष

1. कभी-कभी आवष्यक सामग्री अचानक खराब हो जाने अथवा उपलब्ध ना होने पर भयंकर समस्या उत्पन्न हो जाती है।

2. इस पद्धति द्वारा प्रशिक्षित परिवेक्षक ही आवश्यक होता है।

3. सूक्ष्म शिक्षण द्वारा किसी शिक्षण कौशल पर अभ्यास करने से छात्राध्यापक की सृजनात्मक और मौलिकता समाप्त हो जाता हैैं । इसमें छात्र नकल के लिये अधिक प्रोत्साहित होता है। तो उसकी मौलिकता समाप्त हो जाती है।

4. छात्राध्यापक सूक्ष्म शिक्षण द्वारा जिन शिक्षण-कौशलों का विकास कर लेते है। इन कौशलों का वे वास्तविक कक्षा में सफलता पूर्वक उपयोग नहीं कर पाते है।

5. सूक्ष्म शिक्षण में प्रशिक्षण अभ्यास अलग-अलग टुकड़ों में होता है। इसमें छात्राध्यापक एक बार में केवल एक ही कौशल का अभ्यास करता है।

6.सूक्ष्म शिक्षण के द्वारा छात्राध्यापिका वास्तविक शिक्षण की गहराइयों को नही छू पाता। अतः वह एक बार में केवल एक ही गहराइयों करने के कारण अपने शिक्षण में प्रभावकता नहीं ला पाता है।

    सारांश रूप में देखा जाये तो सूक्ष्म-शिक्षण एक बहुत ही अभ्यासात्मक प्रशिक्षण है जो छात्र/छात्राध्यापिकाओं के लिये अपने शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिये उपयोगी है।

    सूक्ष्म-शिक्षण के प्रशिक्षण द्वारा हम इसकी बारीकियों की जांच-परख करके उन्हें सीखते हैं तथा अपनी गलतियों को सुधारते है। 

    वास्तविक सत्यता की ओर जाये तो सूक्ष्म-शिक्षण द्वारा प्रशिक्षित छात्राध्यापक ही एक भावी व सुयोग्य अध्यापक बन सकता है।

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Dr. D R BHATNAGAR 

 

मंगलवार, 3 जनवरी 2023

आधुनिक शिक्षा या रटन्त प्रणाली का पुनः उद्भव

 आधुनिक शिक्षा या रटन्त प्रणाली का पुनःउद्भव

वर्तमान में शिक्षा अपनी लक्ष्य से भटक रही है। उसका सबसे बड़ा कारण परीक्षा प्रणाली व मूल्यांकन प्रणाली मे अंको को देखना है न की व्यवहार मे तथ्य का स्पष्टीकरण होना है। 

बच्चें को बाल कविता सावधान की मुद्रा मे बोलने को कहना मुझे तो बड़ा ही विचित्र लगता है। 

गिनती व जोड, बाकी, गुणा, भाग को केवल एक विधा से 'समझाना मुझे तो व्यवहारिक जीवन से दूर लगता है।

किसी तथ्य को हम क्यों पढ़ रहे हैं? उसके उद्देश्य के बारे मे बच्चे को अनभिज्ञ रखना तो समझ से परे लगता है। 

कहानी को तो रोचकता व सही से पढ़ना तो ठीक है पर उसके शिक्षा को बताने मे निरसता रखना हजम नही होता।

अंग्रेजी विषय को कक्षा 3 से पढ़ना लेकिन दैनिक जीवन मे हजारो अंग्रेजी के शब्द बोल-चाल मे काम में लेना क्या उचित हैं। 

निजी शिक्षण संस्थान के विद्यार्थी व अध्यापक तो शायद सरकार तंत्र व देश का हिस्सा ही नही हे उनके बारे मे निर्णय नहीं लेना सरकार द्वारा क्या यह सही है?......... 

 

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रविवार, 18 दिसंबर 2022

डॉ. मारिया मोंटेसरी

 डॉ. मारिया मोंटेसरी

मारिया का जन्म 31 अगस्त 1870 को प्रयानात्मक इतालवी शहर चीआरावलल में हुआ था।

मोंटेसरी परिवार काफी धनी था, और जब से मारिया परिवार में एकमात्र बच्चा था, उसके माता-पिता ने उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए हर संभव प्रयास किया।

युवा लड़की का सपना एक व्यवसाय था बच्चों के डॉक्टर, और व्यायामशाला के अंत में, मारिया, रोम विश्वविद्यालय के मेडिकल संकाय में प्रवेश करती है, दो साल बाद उन्हें न केवल प्राकृतिक विज्ञान, भौतिकी और गणित का अध्ययन करने का अधिकार मिलता है, 

लेकिन यहां तक ​​कि ऐसा प्रतीत होता है कि दुर्गम बाधाएं मारिया को सपने के रास्ते पर नहीं रोक सकती थीं।

मोंटेसरी 24 वर्ष की अवस्था में रोम विश्वविद्यालय के चिकित्सा शास्त्र में डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की उपाधि प्राप्त करने वाली प्रथम महिला थी। उसके पश्चात उन्होंने रोम विश्वविद्यालय में चिकित्सा विभाग के सहायक शिक्षक पद पर कार्य करने लगी।

चिकित्सा जगत में आने पर उन्होंने अपना कार्य मन, बुद्धि एवं विकलांग बालकों की चिकित्सा से प्रारंभ किया। 

यहां उन्हें एक अनुभव हुआ कि विकलांगों और मंदबुद्धि बालकों की मानसिक योग्यता का मूल कारण चिकित्सा का अभाव नहीं अपितु उचित शिक्षा व्यवस्था का अभाव है।

उनका विचार था कि यदि मंदबुद्धि बालकों को उचित अवसर और शिक्षण विधि के साथ प्रशिक्षित किया जाए तो वे सामान्य बुद्धि के बालकों के स्तर पर लाए जा सकते हैं।

जिस समय मोंटेसरी अपना प्रयोग कर रही थी उसी समय कुछ अन्य मानव शास्त्री भी मंदबुद्धि एवं पिछड़े बालकों की समस्याओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर रहे थे। यह थे एडवर्ड सेविंग और डॉ. इटार्ड तथा सर्गी अपने अनुभव तथा सोग्विन द्वारा लिखित “पेडगॉजिकल ट्रीटमेंट”, सर्गी द्वारा लिखित ‘साइंटिफिक पेडागोजी’ और डॉ. इटार्ड द्वारा लिखित मंदबुद्धि बालकों से संबंधित साहित्य के आधार पर एक नई शिक्षण पद्धति का प्रतिपादन किया जिसे मोंटेसरी शिक्षा पद्धति कहा गया।

इटली सरकार ने मोंटेसरी की कुशलता एवं रुचि को देखकर उन्हें विकलांग बालकों के एक स्कूल की निर्देशिका, अध्यक्ष नियुक्त किया। यहां पर उन्होंने अपने शिक्षण पद्धति का प्रयोग करके यह निष्कर्ष निकाला कि-

यदि विकलांग और मंदबुद्धि बालकों को इस नई विधि से शिक्षा दी जाए तो वे भी सामान्य बालकों की भांति शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

1907 में इटली सरकार ने मोंटेसरी को बाल गृह नामक संस्था का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। यहीं पर मोंटेसरी ने यह निष्कर्ष निकाला कि-

3 वर्ष का सामान्य बालक 6 वर्ष के मंदबुद्धि बालक के बराबर होता है। यदि इस पद्धति का प्रयोग सामान्य बालकों के लिए किया जाए तो वह अपने स्तर से आगे जा सकते हैं। 

अल्प समय में ही इस पद्धति को इतनी सफलता मिली कि वह संपूर्ण विश्व के लिए उदाहरण बन गई। अपनी शिक्षण विधि की सफलता के कारण विश्व के कोने कोने में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित की जाने लगी । 1913 में मोंटेसरी की प्रथम अंतरराष्ट्रीय व्याख्यानमाला तैयार हुई। सन 1919 में लंदन में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर का उद्घाटन किया। सन 1940 में भारत आए और यहां कश्मीर अहमदाबाद तथा प्रशिक्षण शिविर के संगठन में सराहनीय भूमिका निभाई। उन्होंने 10 वर्ष के अमूल्य समय का योगदान किया। यहां से विदेश जाकर सन 1952 में उन्होंने हमेशा के लिए संसार को विदा ले लिया।

शैक्षिक विचार

    डॉ. मारिया मोंटेसरी चिकित्सक होते हुए भी एक  शिक्षाशास्त्री के रूप में असाधारण ख्याति प्राप्त कि वह अपने समकालीन विद्वानों के विचारों एवं  स्वयं के प्रयोग एवं अनुभवों के आधार पर शिक्षा के प्राचीन सिद्धांतों को नया रूप देने में सफल हुई मारिया मोंटेसरी पर रूसो, पेस्टोलॉजी, फ्रोबेल आदि विद्वानों का विशेष प्रभाव पड़ा इसीलिए उन्हीं की तरह मोंटेसरी ने भी शिक्षा को विकास की प्रक्रिया माना है।

शिक्षा का अर्थ

    साधारण लोग शिक्षा का अर्थ शिक्षण से लगाते हैं जिससे एक शिक्षक अपनी अर्जित ज्ञान को छात्रों को देने का प्रयास करता है और छात्र उसे उसी रूप में लेने हेतु बाध्य होता है। मोंटेसरी इस को शिक्षा नहीं मानती है बल्कि इसके विपरीत व शिक्षा को सहयोग का रूप देना चाहती हैं जो बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास में योगदान करता हूं। यहां मनोवैज्ञानिक विकास का तात्पर्य बालकों के मानसिक स्तर उसकी रूचि और अवस्था संबंधी व्यवहार में हैं।

शिक्षा के संबंध में मोंटेसरी ने लिखा है कि- 

बालकों के जीवन के सामान्य विकास के लिए दी जाने वाली सक्रिय सहायता को ही शिक्षा समझना चाहिए। 

मोंटेसरी के विचारों से स्पष्ट होता है कि-

शिक्षा द्वारा ही बालकों का शारीरिक मानसिक एवं सामाजिक विकास संभव है। यह गुण प्रत्येक प्राणी के लिए सामान्य है इसलिए इसका विकास करने वाली प्रक्रिया ही शिक्षा कही जा सकती हैं।

शिक्षा के उद्देश्य

जन्मजात शक्तियों का विकास-

    अपनी पुस्तक द डिस्कवरी ऑफ दी चाइल्ड में कहा है कि शिक्षा का उद्देश्य बालक की अंतर्निहित शक्तियों का विकास करना है।

सम विकास का उद्देश्य- मोंटेसरी ने शिक्षा का उद्देश्य बालक की शारीरिक, बौद्धिक भावात्मक, सामाजिक, नैतिक एवं चरित्र का विकास करना माना है।

जीवन उपयोगी कुशलता का विकास- मोंटेसरी शिक्षा द्वारा बालक का शारीरिक, बौद्धिक, भावात्मक, सामाजिक, नैतिक, आदि विकास इसलिए करना चाहती थी ताकि बालक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके और कुशलता के साथ जीवन यापन करें। इससे वह अपना एवं समाज दोनों का कल्याण करने में समर्थ हो जाएगा।

कर्मेंद्रियों एवं ज्ञानेंद्रियों का प्रशिक्षण- मोंटेसरी के अनुसार सभी उद्देश्यों की पूर्ति तभी हो सकती है। जब बालक अपनी कर्मेंद्रियों एवं ज्ञानेंद्रियों का ठीक प्रकार से कार्य करें। इस दृष्टि से शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बालक की कर्मेंद्रियों एवं ज्ञानेंद्रियों का विकास करना है।

पाठ्यक्रम

1 बालक की नैसर्गिक योग्यता और उच्च एवं आवश्यकताओं के अनुसार हो।

2 बालक की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला हो।

3 पाठ्यक्रम में वातावरण की प्रधानता हो।

4 पाठ्यक्रम ऐसा हो जिससे बालक को संपूर्ण जगत का ज्ञान प्राप्त हो।

5 बालकों पर किसी निश्चित पाठ्यक्रम का बंधन ना हो।

मोंटेसरी विधि

    मोंटेसरी द्वारा प्रस्तावित शैक्षिक पद्धति आत्म-दिशा, अन्वेषण, खोज, अभ्यास, सहयोग, खेल, गहरी एकाग्रता, कल्पना या संचार के माध्यम से छात्रों के दृष्टिकोण के प्राकृतिक विकास का पक्ष लेने की आवश्यकता पर जोर देता हैl

    यह शैक्षणिक दर्शन पारंपरिक शैक्षिक तरीकों से तेजी से दूर जाता है क्योंकि कठोर प्रणाली के बजाय सहजता और छात्रों की पसंद पर आधारित है और कुछ अकादमिक मूल्यांकन मानदंडों की पूर्ति पर आधारित है। मोंटेसरी के लिए, बच्चे की स्वतंत्रता का सम्मान और संवर्धन महत्वपूर्ण हैl

    मोंटेसरी प्रस्ताव को मानव विकास पर एक सैद्धांतिक मॉडल माना जाता है। हम पर्यावरण के साथ बातचीत के माध्यम से मनोवैज्ञानिक रूप से खुद का निर्माण करते हैं, और हमारे पास व्यक्तिगत विकास की एक सहज प्रवृत्ति हैl

मूलभूत सिद्धांत

मोंटेसरी पद्धति को इसकी लोकप्रियता के कारण अलग-अलग तरीकों से लागू किया गया है, यह संभव है कि इस शैक्षणिक शैली के कम से कम 8 मूलभूत सिद्धांतों को मोंटेसरी के काम के आधार पर और बाद में लोकप्रिय विकास के रूप में पाया।

1. खोज द्वारा सीखना

2. शैक्षिक वातावरण तैयार करना

3. विशिष्ट सामग्री का उपयोग

4. छात्र की व्यक्तिगत पसंद

5. आयु समूहों के लिए कक्षाएं

6. सहयोगात्मक शिक्षा और खेल

7. बिना किसी रुकावट के कक्षाएं

8. शिक्षक एक मार्गदर्शक और पर्यवेक्षक के रूप में 

 मोंटेसरी पद्धति 

मोंटेसरी की अध्यापन में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है "मुझे यह स्वयं करने में सहायता करें"। यही है, एक वयस्क को यह समझना चाहिए कि बच्चा किस चीज में दिलचस्पी है, उसे कक्षाओं के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करें और बच्चे को इसका उपयोग करने के लिए सिखाएं। वयस्क बच्चे को प्रकृति के द्वारा निहित क्षमताओं को प्रकट करने में मदद करता है, और विकास के अपने तरीके से भी जाना जाता है। ध्यान दें कि मोंटेसरी प्रणाली के छात्र ऐसे बच्चे हैं जो ज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्सुक हैं। 

  • बच्चे की गतिविधि एक बच्चे के प्रशिक्षण में, वयस्क एक माध्यमिक भूमिका निभाता है, ट्यूटर नहीं, बल्कि एक सहायक।
  • कार्रवाई की स्वतंत्रता और बच्चे की पसंद
  • बड़े बच्चे छोटे बच्चों को पढ़ते हैं इस मामले में, वे स्वयं युवाओं की देखभाल करना सीखते हैं यह संभव है, क्योंकि, मोंटेसरी के अध्यापन के अनुसार, विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों से समूह बनते हैं।
  • बच्चे खुद ही निर्णय लेते हैं।
  • कक्षाएं एक विशेष रूप से तैयार वातावरण में आयोजित की जाती हैं।
  • एक वयस्क का काम करने के लिए बच्चे को नाज है इसके अलावा बच्चा खुद को विकसित करता है
  • एक बच्चे को पूरी तरह से विकसित करने के लिए, उसे सोच, क्रिया और भावनाओं की स्वतंत्रता देने के लिए आवश्यक है।
  • प्रकृति के निर्देशों के खिलाफ मत जाओ, आपको इन निर्देशों का पालन करना होगा, फिर बच्चे खुद होंगे
  • अप्रासंगिक आलोचना, निषेध अस्वीकार्य हैं।
  • बच्चे को गलती करने का अधिकार है वह सब कुछ खुद तक पहुंचने में काफी सक्षम है।

  • मोंटेसरी पद्धति में विकासशील वातावरण की भूमिका
  • विकासशील वातावरण कड़ाई से परिभाषित तर्क के अनुसार बनाया गया है। परंपरागत रूप से, इसमें 5 ज़ोन हैं:
  • रोज़मर्रा के जीवन का क्षेत्र यहां बच्चे अपने कामों को सीखता है।
  • क्षेत्र मातृभाषा- आपको शब्दावली का विस्तार करने, अक्षरों, ध्वन्यात्मकता से परिचित करने, शब्दों की संरचना और वर्तनी को समझने की अनुमति देता है
  • संवेदी शिक्षा का क्षेत्र- भावनाओं का विकास, आकार, आकार, वस्तुओं के आकार का अध्ययन करने का अवसर प्रदान करता है।
  • कॉसमॉस का क्षेत्र- शरीर विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, जूलॉजी, भूगोल, खगोल विज्ञान, भौतिकी के मूलभूत विषयों के साथ आसपास के विश्व से परिचित।
  • गणितीय क्षेत्र संख्याओं की समझ, गणना में क्रम, संख्याओं की संरचना, साथ ही बुनियादी गणितीय क्रियाओं - अतिरिक्त, घटाव, गुणन और विभाजन को सीखना सीखता है।

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                Dr. D R BHATNAGAR   

गिजुभाई बधेका

गिजुभाई बधेका


  • गिजुभाई का जन्म 15 नवम्बर, 1885 को सौराष्ट्र के चित्तल नामक स्थान में हुआ था।
  • उनका असली नाम 'गिरिजा शंकर बधेका' था, लेकिन वे गीजू के नाम से ही प्रसिद्ध हुए।
  • बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण लोग उन्हें 'मोछाई माँ' अर्थात् मूछों वाली माँ भी कहते थे। 
  • छोटे बच्चों की शिक्षा को नई दिशा देने ने इनका अत्याधिक योगदान रहा है।
  • बारदोली सत्याग्रह के समय लोगों की सहायता के लिए बच्चों की 'वानर सेना' संगठित की।
  • गीजू भाई को कॉलेज की शिक्षा बीच में छोड़ कर आजीविका के लिए 1907 में पूर्वी अफ्रीका जाना पड़ा। 
  • वहाँ से वापस आने पर उन्होंने कानून की शिक्षा पूरी की और वकालत करने लगे थे।

दक्षिणमूर्ति छात्रावास की स्थापना

गिजुभाई अपने पुत्र की शिक्षा के सिलसिले में जब छोटे बच्चों के विद्यालय में गए तो उन्हें मांटेसरी पद्धति की एक पुस्तक मिली। उसका गिजुभाई पर बड़ा प्रभाव पड़ा। उस पद्धति को तथा पश्चिम की कुछ अन्य शिक्षा पद्धतियों को मिलाकर भारतीय परिस्थितियों के अनुसार बच्चों की आरंभिक शिक्षा को नया रूप देने का काम उन्होंने हाथ में लिया। 

सर्वप्रथम भावनगर में 'दक्षिणमूर्ति' नाम से एक छात्रावास की स्थापना हुई। अपनी वकालत छोड़कर गिजूभाई इसी काम में जुट गए। नाना भाई भट्ट इसमें उनके सहयोगी थे। शिक्षा की नई पद्धति के प्रयोग के लिए शिक्षकों का प्रशिक्षण आवश्यक समझ कर गीजू भाई के आचार्यत्व में 'दक्षिणमूर्ति' को अध्यापक प्रशिक्षण केन्द्र का रूप दे दिया गया।

1920 में एक बाल मंदिर की स्थापना हुई। साथ ही यह भी आवश्यक था कि बच्चों के लिए रोचक ढंग की उपयुक्त पाठ्य-सामग्री तैयार की जाए। गिजुभाई ने यह काम भी अपने हाथ में ले लिया। इसके लिए उन्होंने विभिन्न शैलियों में एक सौ से अधिक पुस्तकों की रचना की। उनकी इन पुस्तकों में से अनेक आज भी काम में आ रही हैं।

गिजुभाई बालकों के गांधी माने जाते थे। गांधी जी ने जो काम  अहिंसक नीति से देश के लिए किया। बाल शिक्षा के क्षेत्र में वही काम गिजुभाई ने उस समय में कर दिखाया। बालकों के सर्वांगीण विकास हेतु गिजुभाई ने अपने जीवन काल में जो कार्य किया उसका उदाहरण ढूंढना कठिन है।

शिक्षा साहित्य
गिजुभाई की शिक्षा संबंधी 15 मौलिक रचनाएं हैं। इसके अतिरिक्त अपने अन्य साथियों के सहयोग से उन्होंने लगभग 223 पुस्तके लिखी थी। उनका साहित्य गुजराती में है उनका अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। उनका साहित्य बाल मनोविज्ञान, शिक्षा शास्त्र एवं किशोर साहित्य से संबंधित है।



शिक्षण पत्रिका 
माता-पिता और शिक्षक-शिक्षिका का सही मानस जानने के लिए गिजुभाई ने गुजराती में एक छोटी शिक्षण पत्रिका निकाली थी। इस पत्रिका ने बाल-संगोपन, बाल-शिक्षण, बाल-संस्कार और बाल-जीवन के मर्म की जो शिक्षा दी, उससे हजारों परिवारों में प्रकाश फैला। इस साहित्य में जो मौलिकता, मर्मस्पर्शी, सरलता, प्रेरणा और प्राण है, उसी से गिजुभाई अविस्मरणीय रहेंगे। गुजराती की भांति इस पत्रिका के मराठी और हिंदी संस्करण भी निकलते रहे।

दिवास्वप्न 
बाल शिक्षा के जगत में गिजुभाई की एक अनुपमकृति ‘दिवास्वप्न’ 
दिवास्वप्न की चर्चा करते हुए गिजुभाई ने एक समकालीन साथी और सहयोगी स्वर्गीय श्री हरि भाई द्विवेदी ने लिखा था- 
दिवास्वप्न क्या है? 
यह प्राथमिक शाला की एक स्वल्प समालोचना है और भविष्य की नवीन प्राथमिक पाठशाला के मनोहर और स्पष्ट रूप की एक सुंदर झांकी हैं। 
इसकी विशेषता यह है कि यह सारी पुस्तक कहानी की शैली में लिखी गई हैl

 

शिक्षण विधि
गिजुभाई की एक अनुपम कृति है। “प्राथमिक शाला में भाषा शिक्षा” इस पुस्तक में एक शिक्षक और बालक के बीच उस प्रक्रिया की चर्चा है। जिससे बालक की भाषा शिक्षा की बुनियाद तैयार होती है। इस पुस्तक के चार खंड हैं। प्रथम खंड में माइकल वेस्ट सन 1920 की भांति सबसे पहले वाचन पर बल दिया गया है। इसके पश्चात वे रेखा चित्रण से लेखन को प्रारंभ करते हैं।

        बालकों का उद्धार कर कर गिजुभाई ने अनगिनत माता-पिता ओं को बाल स्वातंत्र्य की बाल भक्ति की और बाल पूजा की दीक्षा दी हैं। गुजरात में बाल भक्ति के पागलपन को फैलाने वाले इंदु मिशनरियों ने समाज के मध्यम वर्ग के समुचित शुरू को ही बदल डाला है और गुजरात में असम के बाल मंदिरों की स्थापना करके इन्होंने पनपाया और परिपुष्ट किया है।

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                Dr. D R BHATNAGAR   

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